जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्य चेतना के शिखर पुरुष।
जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्य चेतना के शिखर पुरुष माना जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी प्रसाद जी के शिखर पुरुष होने का मतलब यह नहीं है कि वे हमसे बहुत ऊँचे या हमसे अलग हैं। बल्कि इसका मतलब यह है कि उन्होंने हमारी भाषा, हमारे दुख, हमारे भ्रम और हमारी उम्मीदों को हमसे भी ज्यादा स्पष्टता के साथ व्यक्त किया। जहाँ बाकी कवि अपनी भावनाओं के बहाव में बह गए, वहीं प्रसाद अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए उन्हें एक फ्रेमवर्क में ढालने में सफल रहे। वे एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने ज्ञान और भावना का जो संतुलन बनाया, वह आज के दौर के लिए सबसे बड़ी जरूरत है। हम लोग या तो बहुत ज्यादा इमोशनल हो जाते हैं या फिर बहुत ज्यादा मशीनी। प्रसाद इन दोनों के बीच का रास्ता दिखाते हैं—एक ऐसा रास्ता जहाँ आप दिमाग से तर्कपूर्ण रहें और दिल से उतने ही कोमल। वे साहित्य, विशेषकर छायावाद के इतिहास में एक प्रकाश-स्तंभ के समान है। जैसे ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं वैसे हीं छायावादी प्रवृत्तियों का वास्तविक सूत्रपात उन्हीं के चिंतन और रचनाओं के प्रादुर्भूत होने से मानी जाती है अतैव वे छायावाद के ब्रह्मा ऐसे हीं बन जाते हैं, क्योंकि ...