गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक, सनातन संस्कृति के अकिंचन साधक और शब्दों के शिल्पी। हनुमान प्रसाद पोद्दार। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। पुण्यतिथि विशेषांक।

इतिहास अक्सर उन लोगों को याद रखता है जो मंचों पर गर्जना करते हैं, लेकिन काल के कपाल पर अपनी अमिट छाप वे छोड़ जाते हैं जो नेपथ्य में रहकर चुपचाप सृजन की मशाल जलाते हैं। आज से करीब एक सदी पहले, जब भारतीय जनमानस गुलामी की बेड़ियों और सांस्कृतिक हीनग्रंथि से जूझ रहा था, तब क्षितिज पर एक ऐसे व्यक्तित्व का उदय हुआ जिसने न केवल धर्म को घर-घर पहुँचाया, बल्कि उसे 'सस्ता और सुलभ' बनाकर लोक-कल्याण का माध्यम बना दिया। वे थे हनुमान प्रसाद पोद्दार, जिन्हें दुनिया प्रेम और श्रद्धा से 'भाईजी' कहती है। आज उनकी पुण्यतिथि पर, 'मीमांसा' उस निष्काम कर्मयोगी के चरणों में अपनी भावांजलि अर्पित करती है।

 संस्कारों की नींव और क्रांतिकारी चेतना

1892 में राजस्थान की मरुधरा (रतनगढ़) में जन्में बालक हनुमान के भीतर भक्ति के बीज उनकी दादी ने बोए थे। लेकिन यह भक्ति केवल माला जपने तक सीमित नहीं थी। युवावस्था में कदम रखते ही भाईजी के भीतर राष्ट्रभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित हुई। कलकत्ता के क्रांतिकारी वातावरण में अरविंद घोष और देशबंधु चितरंजन दास जैसे महापुरुषों के संपर्क ने उन्हें स्वाधीनता संग्राम का सिपाही बना दिया।

अत्यंत रोचक तथ्य है कि आध्यात्मिक शिखर पर पहुँचने से पहले वे एक 'राजद्रोही' के रूप में अलीपुर जेल की काल कोठरी देख चुके थे। अंग्रेजों के खिलाफ गाय की चर्बी के विरोध से लेकर विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार तक, भाईजी का प्रारंभिक जीवन संघर्ष और साहस की मिसाल था। सावरकर के '1857 के स्वातंत्र्य समर' से प्रभावित होकर उन्होंने राष्ट्र की वेदी पर सर्वस्व अर्पण करने का संकल्प लिया था।

गीताप्रेस: एक त्रुटिहीन संकल्प की परिणति

भाईजी के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता के एक संस्करण में ढेरों अशुद्धियाँ देखीं। उस समय के छपाई तंत्र की लापरवाही ने उनके भीतर एक टीस पैदा की "क्या भगवान की वाणी इतनी अशुद्ध रूप में भक्तों तक पहुँचेगी?" इसी एक विचार ने 'गीताप्रेस गोरखपुर' की नींव रखी।
अप्रैल 1923 में शुरू हुआ यह अभियान आज विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक प्रकाशन संस्थान है। भाईजी ने तय किया कि यहाँ पुस्तकें मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि मुक्ति के मार्ग के लिए छपेंगी। आज दुनिया के कोने-कोने में जो रामचरितमानस, गीता और पुराण कम से कम मूल्य पर उपलब्ध हैं, उसके पीछे भाईजी का वह 'अकिंचन सेवा भाव' ही है। उन्होंने तकनीक को धर्म से जोड़ा ताकि ज्ञान का लोकतंत्रीकरण हो सके।

 'कल्याण': भक्ति और पत्रकारिता का अद्भुत समन्वय

1926 में जब 'कल्याण' पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ, तो हिंदी पत्रकारिता को एक नया आयाम मिला। भाईजी इसके संपादक थे, लेकिन उन्होंने कभी अपना नाम संपादक के रूप में प्रकाशित नहीं होने दिया। 'कल्याण' केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्संग बन गई।

एक संपादक के रूप में भाईजी की 'पाठक वत्सलता' (पाठकों के प्रति प्रेम) अद्वितीय थी। वे प्रतिदिन 15-16 घंटे कार्य करते थे। देश भर के संतों, विद्वानों और यहाँ तक कि अन्य मतों के आचार्यों के विचारों को उन्होंने 'कल्याण' में स्थान दिया। उनके लिए धर्म संकीर्णता नहीं, बल्कि व्यापक मानवीय संवेदना थी। उन्होंने चित्रकारों से कहकर देवी-देवताओं के सात्विक चित्र बनवाए, ताकि साधारण मनुष्य भी ईश्वरीय रूप का दर्शन कर सके।

त्याग की प्रतिमूर्ति: जब 'भारत रत्न' को भी ठुकरा दिया

आज के युग में जहाँ लोग छोटे से सम्मान के लिए लालायित रहते हैं, भाईजी का व्यक्तित्व हिमालय की तरह ऊँचा नज़र आता है। अंग्रेज सरकार ने उन्हें 'राय साहब' और 'राय बहादुर' की उपाधियाँ देनी चाहीं, पर उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। स्वतंत्रता के बाद जब तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' के लिए प्रस्तावित किया, तब भी भाईजी का उत्तर था "मैं एक साधारण सेवक हूँ, मुझे सम्मान की भूख नहीं।" उनका जीवन महात्मा बुद्ध की उस करुणा और गांधीजी के उस सादगी का संगम था, जहाँ व्यक्ति स्वयं को शून्य कर देता है ताकि प्रभु का कार्य पूर्ण हो सके। 1936 की गोरखपुर की बाढ़ हो या 1938 का राजस्थान का अकाल, भाईजी ने अपनी कार नेहरू जी को देने से लेकर पीड़ितों की सेवा तक में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

साहित्यिक अवदान और आध्यात्मिक विरासत

भाईजी ने अपने जीवनकाल में 25 हजार से अधिक पृष्ठों का साहित्य सृजन किया। उनकी लेखनी में वह 'शिल्प शैली' थी जो जटिल से जटिल उपनिषदीय ज्ञान को एक साधारण ग्रामीण तक पहुँचा देती थी। उनके पद-रत्नाकर के पद आज भी भक्तों की आँखों में प्रेमाश्रु ला देते हैं। उन्होंने धर्म को कर्मकांड के घेरे से निकालकर सेवा के धरातल पर ला खड़ा किया।

उपसंहार: 'मीमांसा' का संकल्प

22 मार्च 1971 को भाईजी का भौतिक शरीर शांत हुआ, परंतु उनके द्वारा जलाई गई ज्योति आज भी करोड़ों घरों के पूजा-स्थलों में 'कल्याण' और 'गीता' के रूप में जल रही है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए यह संकल्प लेती है कि हम भी साहित्य और संवाद के माध्यम से समाज में उन्हीं नैतिक मूल्यों और शुचिता को जीवित रखेंगे जिनका स्वप्न भाईजी ने देखा था।

वे सचमुच एक 'सूरज' थे, जिन्होंने स्वयं जलकर भारतीय संस्कृति के आंगन को प्रकाशित किया।
— संपादकीय टीम, 'मीमांसा'

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