नामवर सिंह : आलोचना एवं वैचारिकता। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। शब्द यज्ञ स्तंभ। अभिषेक यादव।
हिंदी साहित्य के आलोचनात्मक परिदृश्य में डॉ. नामवर सिंह का उदय केवल एक व्यक्ति का अकादमिक उत्कर्ष नहीं था, बल्कि यह एक पूरी वैचारिक परंपरा, आलोचनात्मक प्रविधि और जनवादी चेतना का प्रस्फुटन था। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर इक्कीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों तक, हिंदी आलोचना पर उनका प्रभाव इतना गहरा, व्यापक और स्थायी रहा है कि उन्हें सर्वसम्मति से हिंदी साहित्य का 'अमिताभ बच्चन' या एक 'युगसृष्टा' आलोचक स्वीकार किया गया है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ. रामविलास शर्मा की सुदीर्घ, गंभीर और समृद्ध आलोचनात्मक विरासत के मध्य अपनी एक स्वतंत्र, तार्किक और प्रगतिशील राह निर्मित करना उनकी सबसे बड़ी बौद्धिक उपलब्धि रही है । उनका जीवनकाल (1927-2019) भारतीय इतिहास के उस संक्रमण काल का गवाह रहा है जहाँ राष्ट्रवाद, उपनिवेशवाद-विरोध, मार्क्सवाद और उत्तर-आधुनिक विमर्शों ने साहित्य की दिशा तय की।
नामवर सिंह की वैचारिकता मूलतः मार्क्सवादी दर्शन से अनुप्राणित रही है, किंतु उन्होंने मार्क्सवाद को किसी जड़ सिद्धांत, पार्टी के घोषणापत्र या 'यांत्रिक समाजशास्त्रीयता' (mechanical sociology) के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं किया । इसके विपरीत, उन्होंने प्रगतिशील आलोचना को 'रूपवादी-प्रभाववादी' (formalist-impressionist) दृष्टियों के सकारात्मक और सार्थक तत्वों के साथ जोड़कर एक नई सर्जनात्मक और लचीली दिशा प्रदान की । उनका सबसे बड़ा और दूरगामी योगदान यह रहा कि उन्होंने आलोचना को केवल अकादमिक परिसरों, विश्वविद्यालयों के सेमिनार कक्षों और शोध-प्रबंधों की बंद कोठरियों से निकालकर उसे आम पाठकों के बीच, 'वाचिक परंपरा' (oral tradition) के माध्यम से एक जीवंत, स्पंदित और लोकतांत्रिक संवाद का रूप दिया ।
यह शोध रिपोर्ट डॉ. नामवर सिंह की वैचारिकता, उनकी आलोचना पद्धति के सूक्ष्म उपकरणों, उनकी प्रमुख कृतियों के अंतर्निहित दर्शन, समकालीन मार्क्सवादी विचारकों (विशेषकर डॉ. रामविलास शर्मा) के साथ उनके वैचारिक मतभेदों, वि-उपनिवेशीकरण (decolonization) में उनके योगदान और समकालीन विमर्शों के प्रति उनके दृष्टिकोण का विस्तृत, समग्र और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करती है।
जीवन-यात्रा, अकादमिक अवदान और बहुआयामी व्यक्तित्व
डॉ. नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1927 (विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और अकादमिक अभिलेखों के अनुसार 1 मई 1927 भी उल्लिखित) को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले (वर्तमान चंदौली) के जीयनपुर नामक छोटे से गाँव में हुआ था । उनका प्रारंभिक जीवन गांधी-नेहरू युग के आदर्शों और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की अनुगूंजों के बीच बीता । उनकी अकादमिक यात्रा अत्यंत समृद्ध और विविधताओं से परिपूर्ण रही है। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की और वहीं से अपने अध्यापन करियर की शुरुआत की । इसके पश्चात उन्होंने सागर विश्वविद्यालय, जोधपुर विश्वविद्यालय और अंततः जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) जैसे देश के शीर्षस्थ संस्थानों में अध्यापन कार्य किया । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषाओं के केंद्र (Centre of Indian Languages) की स्थापना, उसके विकास और वहाँ के पाठ्यक्रम के आधुनिकीकरण में उनकी भूमिका एक संस्था-निर्माता (institution builder) के रूप में ऐतिहासिक रही है ।
नामवर सिंह केवल एक प्राध्यापक या आलोचक नहीं थे; वे एक 'पब्लिक इंटेलेक्चुअल' (public intellectual) थे जिनकी बौद्धिक पहुँच चार प्रमुख भाषाओं—हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और उर्दू—पर समान रूप से थी । प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य पर भी वे अंतिम प्रामाणिक स्वर माने जाते थे और संस्कृत के दिग्गज विद्वान भी उनके निर्णयों को चुनौती देने से बचते थे । उनकी इस बहुभाषी क्षमता ने उन्हें एक ऐसे विशिष्ट वार्ताकार (interlocutor) के रूप में स्थापित किया जो अंग्रेजी माध्यम के अकादमिक जगत और हिंदी भाषी पाठकों के बीच एक सुदृढ़ बौद्धिक सेतु का निर्माण कर रहा था । एक ओर वे भारतीय समाज विज्ञान के नवीनतम विमर्शों से जुड़े हुए थे, तो दूसरी ओर वे हिंदी की ठेठ लोक परंपरा से संवाद कर रहे थे ।
उनके साहित्यिक योगदान को मुख्यतः उनकी आलोचनात्मक कृतियों, संपादन कर्म, शोध कार्यों और वाचिक व्याख्यानों के माध्यम से समझा जा सकता है। उनके अवदानों के मूल्यांकन के लिए उनके द्वारा रचित साहित्य को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। नीचे दी गई तालिका उनके प्रमुख ग्रंथों और उनके वैचारिक केंद्र को स्पष्ट करती है:
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विधा / श्रेणी |
प्रमुख कृतियाँ एवं प्रकाशन |
वैचारिक विषय-वस्तु और अकादमिक महत्व |
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काव्य शास्त्रीय आलोचना |
'छायावाद' (1954), 'आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ' (1954), 'कविता के नए प्रतिमान' (1968) |
छायावादी काव्यवस्तु का सापेक्ष विश्लेषण, नई कविता में व्याप्त 'मूल्यान्ध वातावरण' का परीक्षण और रस-सिद्धांत की आधुनिक प्रासंगिकता । |
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कथा आलोचना |
'कहानी: नयी कहानी' (1964) |
कहानी की प्राध्यापकीय आलोचना को तोड़कर, कहानी के भीतर निहित 'अंतर्विरोध' और 'द्वंद्व' का समाजशास्त्रीय अध्ययन । |
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इतिहास एवं सांस्कृतिक विमर्श |
'इतिहास और आलोचना' (1957), 'दूसरी परंपरा की खोज' (1982) |
इतिहास दर्शन और आलोचनात्मक प्रतिमानों के संबंध, 'लोक' बनाम 'शास्त्र' का द्वंद्व और भारतीय परंपरा की बहुलता का अन्वेषण । |
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शोध ग्रंथ |
'हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग', 'पृथ्वीराज रासो की भाषा' |
हिंदी भाषा की जड़ों की वैज्ञानिक पड़ताल और अपभ्रंश साहित्य का ऐतिहासिक-भाषाई मूल्यांकन । |
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संवाद, निबंध एवं अन्य |
'वाद विवाद संवाद', 'कहना न होगा', 'बकलम खुद', 'आलोचक के मुख से' |
मार्क्सवादी साहित्य-चिंतन, आलोचना के विभिन्न आयामों, वैचारिक बहसों का संकलन और वाचिक साक्षात्कारों का दस्तावेजीकरण । |
साहित्य के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (कविता के नए प्रतिमान के लिए), दिल्ली हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, शब्दसाधक शिखर सम्मान और महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान सहित अनेक सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कारों से विभूषित किया गया । 19 फरवरी 2019 को नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में उनका निधन हुआ, जिसने हिंदी साहित्य में एक संपूर्ण युग और आलोचना के एक स्वर्णकाल का अंत कर दिया ।
मार्क्सवादी दृष्टि और 'लोकवादी' वैचारिकता का विकास
नामवर सिंह की वैचारिकता कोई स्थिर, एकआयामी या जड़ इकाई नहीं थी; यह समय, समाज और साहित्य के बदलते यथार्थ के साथ निरंतर एक द्वंद्वात्मक प्रक्रिया में विकसित होती रही। भारतीय मन के वि-उपनिवेशीकरण (decolonizing the Indian mind) की प्रक्रिया में उन्होंने आलोचना को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उपनिवेशवाद-मुक्ति (decolonization) को वे 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानते थे। उनके अनुसार वि-उपनिवेशीकरण केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि यह उन छिपी हुई संस्थाओं और सांस्कृतिक ताकतों (hegemony) को ध्वस्त करने की प्रक्रिया है जिन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी औपनिवेशिक सत्ता को बौद्धिक रूप में बनाए रखा है ।
अंग्रेजी साहित्य के वर्चस्ववादी (hegemonic) प्रभाव, राष्ट्रवाद और 'थर्ड वर्ल्ड' साहित्य के बीच के अंतर्संबंधों को समझते हुए उन्होंने हिंदी पाठकों को बदलती सामाजिक वास्तविकताओं को पकड़ने के लिए तैयार किया । उनके वैचारिक और आलोचनात्मक विकास को तीन प्रमुख और सुस्पष्ट चरणों में विभाजित किया जा सकता है, जो उनके चिंतन की प्रौढ़ता को दर्शाते हैं :
1. प्रारंभिक चरण: नव-स्वच्छंदतावाद (छायावाद) का मूल्यांकन और काव्यात्मक संवेदना
अपने आलोचनात्मक जीवन के आरंभ में, नामवर सिंह ने मुख्य रूप से छायावाद और छायावादोत्तर प्रवृत्तियों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इस दौर में उनका प्राथमिक उद्देश्य कविता की साहित्यिकता, उसके रूप विधान और सौंदर्यशास्त्रीय विशेषताओं को समझना था। उनकी पुस्तक 'छायावाद' (1954) इसी आरंभिक बौद्धिक अन्वेषण की उपज है । पूर्ववर्ती कई आलोचकों ने छायावाद को केवल एक वायवीय, रहस्यवादी या जीवन-यथार्थ से पलायन करने वाली प्रवृत्ति मानकर खारिज करने का प्रयास किया था। नामवर सिंह ने इस एकांगी दृष्टिकोण का तर्कपूर्ण प्रतिवाद किया। उन्होंने छायावादी काव्यवस्तु और काव्यरूप दोनों का सापेक्ष रूप में पूर्णतर विश्लेषण किया और उसका एक ठोस सामाजिक मूल्यांकन प्रस्तुत किया । उन्होंने यह स्थापित किया कि छायावाद केवल एक कोरी भावुकता नहीं था, बल्कि यह अपने समय के सामंती और औपनिवेशिक बंधनों के विरुद्ध एक वैयक्तिक विद्रोह और राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति था । हालांकि कुछ विद्वानों (जैसे सुधीश पचौरी) का मानना है कि इस विश्लेषण के बावजूद इस पुस्तक से 'छायावाद युग की संपूर्णता' का बोध नहीं हो पाता, फिर भी यह कृति छायावाद के पुनर्मूल्यांकन में मील का पत्थर मानी जाती है । यह उल्लेखनीय है कि आलोचक होने से पूर्व नामवर सिंह स्वयं एक कवि थे। उनकी कविता 'फागुनी शाम' ("फागुनी शाम अंगूरी उजास बतास में जंगली गंध का डूबना...") इस बात का प्रमाण है कि उनके भीतर एक गहरी काव्यात्मक संवेदना थी, जिसने उन्हें कविता के आंतरिक मर्म को समझने वाला एक सहृदय आलोचक बनाया और इस भ्रांति को तोड़ा कि 'असफल कवि ही आलोचक बनता है' ।
2. मार्क्सवादी प्रभाव, राजनीतिक चरित्र और वर्ग-संघर्ष का साहित्य
1950 के दशक के मध्य के बाद, भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथी आंदोलनों के उभार के साथ, नामवर सिंह दृढ़ता से प्रगतिशील आलोचना के प्रति आकृष्ट हुए। इस द्वितीय चरण में उन्होंने साहित्य को वर्ग-संघर्ष, सामाजिक यथार्थ और जन-पक्षधरता (pro-people stance) से जोड़ा । परंतु उनका मार्क्सवाद कभी भी किताबी, यांत्रिक या सोवियत रूस से आयातित कोई अंधानुकरण नहीं था। भारत में वामपंथी बौद्धिक परंपरा अक्सर विदेशी मॉडलों की नकल या अति-सरलीकरण का शिकार रही है। डॉ. सिंह ने इस अति-सरलीकरण का कड़ा और मुखर विरोध किया। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के वैचारिक और राजनीतिक निर्देशनों को सीधे-सीधे साहित्य पर थोपे जाने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाई । इसके लिए उन्हें अपने ही वामपंथी खेमे में कभी-कभी 'रूपवादी' (formalist) होने के आक्षेप भी झेलने पड़े ।
साहित्य और राजनीति के संबंध में उनका मत अत्यंत स्पष्ट था। उनका मानना था कि जनवादी साहित्य का एक राजनीतिक चरित्र अवश्य होता है, और जो लोग साहित्य से राजनीति के पूर्ण बहिष्कार की बात करते हैं, वे भी जाने-अनजाने यथास्थितिवाद की एक विशेष प्रकार की राजनीति का ही समर्थन कर रहे होते हैं । गजानन माधव मुक्तिबोध का संदर्भ देते हुए उन्होंने स्थापित किया कि हर साहित्यिक सिद्धांत के पीछे एक विशेष जीवन-दृष्टि और जीवन-दर्शन होता है । तथापि, नामवर सिंह यह भी पूरी तरह समझते थे कि साहित्य कोई राजनीतिक घोषणा-पत्र (manifesto) नहीं है। सामाजिक यथार्थ की रिपोर्टिंग की प्रक्रिया साहित्य में सीधी, सपाट और सरल नहीं होती । काव्य-सत्य को सामाजिक सत्य का सीधा अनुवाद या उसकी अविकल छाया समझने वाली आलोचना अंततः 'यांत्रिक समाजशास्त्रीयता' का शिकार हो जाती है, जबकि सामाजिक संदर्भों को पूरी तरह नकारने वाली आलोचना 'रूपवादी आलोचना' में बदल जाती है । साहित्य के सर्जनात्मक स्वरूप और उसकी कलात्मक स्वायत्तता की रक्षा करते हुए उसकी मार्क्सवादी व्याख्या करना, उनके इस चरण की सबसे बड़ी वैचारिक विजय थी ।
3. लोकवादी दृष्टि (Folkloric Integration) का चरम विकास
तीसरे और सबसे परिपक्व चरण में, नामवर सिंह ने मार्क्सवाद को भारत की देशी जड़ों, विशेषकर 'लोक' (Folk/People) की अवधारणा के साथ गहराई से संश्लेषित किया । आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी से गहरे स्तर पर प्रभावित होकर उन्होंने 'लोक' की एक अत्यंत व्यापक और आधुनिक परिभाषा गढ़ी। उनके लिए 'लोक' का अर्थ केवल ग्रामीण जीवन, देहाती संस्कृति या पारंपरिक लोकगीत नहीं था, बल्कि यह समाज के बहुसंख्यक शोषित, वंचित, किसान, मजदूर और आम आदमी की सामूहिक चेतना और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता था ।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी आलोचना में 'लोकमंगल' की जो विशुद्ध शास्त्रीय अवधारणा स्थापित की थी, नामवर सिंह ने उसे प्रगतिशील जनवाद के साथ जोड़कर एक नया वैचारिक स्वरूप प्रदान किया। उनके आलोचना-कर्म ने यह स्थापित किया कि साहित्य का अंतिम उद्देश्य लोकमंगल है और किसी भी कृति की असली प्रामाणिकता इस बात में निहित है कि वह आम जनता की आवाज़, उनके संघर्षों और उनकी आकांक्षाओं का कितना सच्चा प्रतिनिधित्व करती है । उन्होंने साहित्य को अभिजात्य (aristocratic/elite) परंपराओं की कैद और रूढ़िबद्धताओं से मुक्त कर उसे एक लोकतांत्रिक दिशा प्रदान की। उनकी दृष्टि में लोक जीवन में सामाजिक और साहित्यिक दोनों प्रकार की जड़ताओं को तोड़ने की एक अभूतपूर्व क्रांतिकारी क्षमता विद्यमान है । उनकी यही 'लोकवादी' दृष्टि हिंदी आलोचना को आज भी प्रासंगिक बनाए हुए है ।
प्रमुख आलोचनात्मक कृतियों का अंतर्भेदी विश्लेषण
नामवर सिंह का वैचारिक वितान और उनकी आलोचनात्मक प्रविधि उनकी पुस्तकों के माध्यम से ही पूर्णतः उद्घाटित होती है। उनकी प्रत्येक पुस्तक ने हिंदी साहित्य की एक विशेष विधा, एक विशेष युग या एक विशिष्ट आंदोलन के अध्ययन के लिए नए मानक तय किए।
1. कविता के नए प्रतिमान (1968)
यह पुस्तक डॉ. नामवर सिंह की आलोचनात्मक प्रतिभा का सर्वोच्च शिखर मानी जाती है, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया । इस कृति का मूल उद्देश्य समकालीन हिंदी आलोचना में व्याप्त उस 'मूल्यान्ध वातावरण' (value-blind environment) का निर्मम और तार्किक विश्लेषण करना था जिसमें पुरानी कसौटियों से नई कविता को नापा जा रहा था ।
पुस्तक को दो प्रमुख खंडों में विभाजित किया गया है। प्रथम खंड में उन्होंने विशेषतः 'तारसप्तक', 'कामायनी', 'उर्वशी' आदि युगांतरकारी कृतियों और सामान्यतः छायावादोत्तर कविता की उपलब्धियों को लेकर पिछले दो दशकों में हुए विवादों और उनमें टकराने वाले मूल्यों की गहरी पड़ताल की है। इसी खंड में उन्होंने नए दावे के साथ प्रस्तुत किए जा रहे 'रस सिद्धांत' (Theory of Sentiment/Rasa) की आधुनिक युग में प्रसंगानुकूलता और उसकी सीमाओं पर भी विस्तार से विचार किया है ।
दूसरे खंड में नामवर सिंह ने नई कविता के मूल्यांकन के लिए इस्तेमाल होने वाले कई आलोचनात्मक पदों की सार्थकता का तीखा और वस्तुनिष्ठ परीक्षण किया। आधुनिक कविता की समीक्षा में अनुभूति की 'प्रामाणिकता' (authenticity), 'ईमानदारी' (honesty), 'जटिलता' (complexity), 'द्वंद्व' (conflict), 'तनाव' (tension), 'विसंगति' (anomaly/incongruity), 'विडंबना' (irony), 'सर्जनात्मक भाषा' (creative language), 'बिम्बात्मकता' (imagery), 'सपाटबयानी' (straightforwardness), 'फ़ैंटेसी' (fantasy), और 'नाटकीयता' (dramaticity) जैसे पदों को उन्होंने मात्र पश्चिमी आयातित शब्दकोश नहीं माना, बल्कि हिंदी कविता के अर्थ-ग्रहण की प्रक्रिया में उन्हें व्यावहारिक कसौटी पर कसा ।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. सिंह ने इन 'नए प्रतिमानों' को किसी रूढ़ या बंद फार्मूले के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उनका स्पष्ट मानना था कि आलोचना में इस प्रकार का 'रूढ़ि-निर्माण' (codifying strict rules) अनुपयोगी ही नहीं, बल्कि साहित्य के स्वतंत्र विकास के लिए अत्यंत घातक होता है । निष्कर्ष स्वरूप, वे इस बात पर बल देते हैं कि मुख्य उद्देश्य काव्यार्थ ग्रहण की उस खुली प्रक्रिया को समझना है, जो सही अर्थमीमांसा (semantic analysis) के द्वारा पाठक के 'मूल्यबोध' (value-consciousness) का विकास कर सके ।
2. कहानी: नयी कहानी (1964)
कविता के प्रतिमानों को स्थापित करने के बाद, जिस विधा में नामवर सिंह ने सबसे गहरा और निर्णायक वैचारिक हस्तक्षेप किया, वह थी 'कहानी'। वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय के अनुसार, इस पुस्तक के माध्यम से नामवर सिंह ने हिंदी में कहानी की शास्त्रीय और प्राध्यापकीय (academic) आलोचना की जड़ता को तोड़ा और पहली बार एक गंभीर, विश्लेषणात्मक वैचारिक आलोचना की शुरुआत की ।
नामवर सिंह ने कहानी को केवल "जीवन का एक टुकड़ा" (fragment of life) मानकर उसकी उपेक्षा करने की सरलीकृत धारणा को चुनौती दी। उनका तर्क था कि कहानी जीवन के उस छोटे से टुकड़े में निहित 'अंतर्विरोध' (contradiction), 'द्वंद्व' (conflict), 'संक्रांति' (transition), और 'क्राइसिस' (crisis) को पकड़ने की कोशिश करती है । जब एक कथाकार उस खंडगत अंतर्विरोध को पूरी ईमानदारी और कलात्मकता के साथ पकड़ लेता है, तो वह छोटा सा टुकड़ा भी समाज के वृहद अंतर्विरोधों और विसंगतियों के किसी न किसी बड़े पहलू का प्रामाणिक आभास दे जाता है । समाज के संपूर्ण 'सामाजिक सत्य' को जानने के लिए उसके इन विविध कथा-रूपों का अध्ययन नितांत आवश्यक है ।
उन्होंने पात्रों को सपाट (flat characters) बनाने से बचने की सलाह दी और इस बात पर जोर दिया कि वास्तविक जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं और उनके भीतरी अंतर्विरोधों का उल्लेख कहानी को जीवंत बनाता है । ऐतिहासिक दृष्टि से यह कृति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उन्होंने नई कहानी आंदोलन की तत्कालीन प्रतिष्ठित तिकड़ी (मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव) के बरक्स निर्मल वर्मा की कहानी 'परिंदे' को नई कहानी की प्रथम कृति के रूप में स्थापित किया और कथा-आलोचना में एक सर्वथा नए विमर्श को जन्म दिया ।
3. दूसरी परंपरा की खोज (1982)
आलोचना के क्षेत्र में यह पुस्तक एक 'पैराडाइम शिफ्ट' (paradigm shift) साबित हुई। इस कृति के माध्यम से नामवर सिंह ने न केवल अपने गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के आलोचनात्मक और सर्जनात्मक कर्म की नई व्याख्या प्रस्तुत की, बल्कि भारतीय साहित्य और इतिहास को देखने की एक बिल्कुल नई और वैकल्पिक दृष्टि का निर्माण भी किया । यह पुस्तक प्रकारांतर से उनके गुरु को एक बौद्धिक श्रद्धांजलि (tribute) भी है ।
नामवर सिंह का यह दृढ़ मत था कि कोई भी परंपरा कभी 'एकल' या अखंड (singular) नहीं हो सकती; ज्ञान और समाज की प्रकृति के अनुसार उसे 'बहुल' (plural) होना ही चाहिए । भारतीय साहित्य के इतिहास लेखन में अक्सर आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा निर्मित परंपरा को ही 'मुख्य धारा' मान लिया जाता था। 'दूसरी परंपरा की खोज' इस एकांगी वर्चस्व और स्थापित प्रतिमानों को चुनौती देती है। डॉ. सिंह तार्किक रूप से स्थापित करते हैं कि मध्ययुग के भारतीय इतिहास का मुख्य अंतर्विरोध 'मुसलमान और हिंदू धर्म' का संघर्ष नहीं था, जैसा कि कुछ इतिहासकार मानते रहे हैं, बल्कि यह 'शास्त्र' (संभ्रांत शास्त्रीय ज्ञान) और 'लोक' (आम जन की सहज चेतना) के बीच का निरंतर चलने वाला द्वंद्व था ।
आचार्य द्विवेदी के निबंधों (जैसे 'प्रेमचंद का महत्त्व' में गोदान के पात्र मेहता पर उनके विचार) का हवाला देते हुए नामवर सिंह फक्कड़पन, मस्ती और लोक-चेतना को कबीर की 'दूसरी परंपरा' से जोड़ते हैं । इस पुस्तक ने हिंदी जगत में यह भारी बहस भी खड़ी कर दी कि क्या नामवर सिंह इस 'दूसरी परंपरा' के बहाने आचार्य शुक्ल के महत्व को कमतर आँकने का सुनियोजित प्रयास कर रहे थे? । विवादों के बावजूद, इस कृति ने यह सिद्ध कर दिया कि परंपरा कोई पवित्र, अछूती या पूजनीय जड़ वस्तु नहीं है, बल्कि यह आलोचना की आग में तपाकर परखी जाने वाली एक सतत प्रक्रिया है । इस पुस्तक का प्रभाव अन्य भारतीय भाषाओं पर भी पड़ा। उदाहरणस्वरूप, मध्यकालीन गुजराती साहित्य के इतिहास लेखन और उसके स्वरूप-निर्धारण की चर्चाओं में भी नामवर सिंह की इस कृति को एक महत्वपूर्ण वैचारिक संदर्भ के रूप में उद्धृत किया जाता है ।
4. इतिहास और आलोचना (1957)
इस पुस्तक में नामवर सिंह साहित्य के इतिहास-दर्शन और आलोचना के आपसी द्वंद्व का विश्लेषण करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि कोई भी समाज या जाति इतिहास लिखने की ओर तभी प्रवृत्त होती है जब वह अपने वर्तमान के निर्माण के प्रति सचेत होती है । स्वतंत्रता के पश्चात हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने का जो उत्साह दिखा, वह वास्तव में नव-निर्माण की ऐतिहासिक जिम्मेदारी का ही एक हिस्सा था ।
नामवर सिंह इतिहास और 'ऐतिहासिक सामग्री' (Historical Material) के बीच एक स्पष्ट भेद करते हैं। उनके अनुसार, बड़ी संस्थाओं द्वारा तैयार किए गए भारी-भरकम संदर्भ ग्रंथ केवल सूचना-धर्मी सामग्री हैं, वे स्वयं 'इतिहास' नहीं हैं। इतिहास केवल तथ्यों का एकत्रीकरण या काल-विभाजन (periodization) जैसी तकनीकी समस्या नहीं है; इतिहास अपने आप में एक 'नवीन व्याख्या' (new interpretation) है ।
परंपरा के संदर्भ में वे कहते हैं कि परंपरा का बोध होने के लिए केवल पोथियाँ बांचने वाले 'पांडित्य' की नहीं, बल्कि "वर्तमान के तीखे बोध" (sharp sense of the present) की आवश्यकता होती है । 'ऐतिहासिक चेतना' का अर्थ है अतीत और वर्तमान के दोहरे अस्तित्व—उनका अलग-अलग होना और फिर भी एक होना—का निरंतर अहसास । एक समर्थ इतिहासकार वही है जो अतीत के साहित्य-भंडार में से उस हिस्से को पहचान सके जो वर्तमान के लिए 'जीवंत' (alive) और 'जीविष्णु' (viable) है। उनका मानना था कि यदि किसी समाज में परंपरा की जीवंत चेतना हो, तो शायद अलग से लिखित इतिहास की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए ।
डॉ. रामविलास शर्मा के साथ वैचारिक द्वंद्व: नवजागरण, अस्मिता और भक्तिकाल
हिंदी मार्क्सवादी आलोचना के भीतर डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह के वैचारिक मतभेद हिंदी साहित्य के इतिहास का सबसे उर्वर, तीखा और जटिल अध्याय माने जाते हैं। यद्यपि दोनों ही शीर्ष विचारक मार्क्सवादी दर्शन से जुड़े हुए थे, तथापि 'परंपरा', 'अस्मिता' (Identity), 'जातीयता' (National/Ethno-linguistic character) और भारतीय नवजागरण के मूल्यांकन को लेकर उनकी दृष्टियां और प्रस्थान-बिंदु एक-दूसरे से एकदम भिन्न थे ।
इन गहरे वैचारिक मतभेदों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. अस्मिता (Identity) और 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम का मूल्यांकन
रामविलास शर्मा और नामवर सिंह दोनों के बीच 'अस्मिता' की मूल अवधारणा को लेकर कोई बुनियादी सैद्धांतिक विरोध नहीं था, बल्कि यह मतभेद 'प्राथमिकता' और इतिहास-दृष्टि का था । डॉ. रामविलास शर्मा के लिए भारतीय नवजागरण और जातीय अस्मिता का मुख्य प्रस्थान-बिंदु 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम था । शर्मा जी मानते थे कि भारतीय अस्मिता का वास्तविक निर्माण अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध किए गए इस व्यापक राजनीतिक और सैन्य संघर्ष के गर्भ से हुआ है।
इसके सर्वथा विपरीत, नामवर सिंह नवजागरण के संदर्भ में भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रसिद्ध सूत्र "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल" के आधार पर 'भाषायी अस्मिता' (Linguistic identity) और 'स्वत्व' को अधिक प्रमुखता देते हैं । नामवर सिंह की दृष्टि में यह सांस्कृतिक और भाषायी जागरण ही आधुनिकता का मुख्य प्रवेश द्वार है।
आलोचक जगदीशवर चतुर्वेदी और कई अन्य इतिहासकार यह गंभीर प्रश्न उठाते हैं कि नामवर सिंह की इस 'भाषायी अस्मिता' केंद्रित दृष्टि में 1857 के युद्ध के भीषण आर्थिक और सामाजिक परिणामों पर एक रहस्यमयी चुप्पी छाई हुई है । युद्ध के उपरांत भारत में जो व्यापक तबाही मची, भारतीय सामंती राजतंत्र की कमर टूट गई, अकाल पड़े, महामारियां फैलीं और 19वीं सदी के कोलकाता में गरीबी और वेश्यावृत्ति में भारी वृद्धि हुई—उन यथार्थपरक सामाजिक विद्रूपताओं को नवजागरण विमर्श में नामवर सिंह द्वारा वह स्थान नहीं मिला जो रामविलास शर्मा की आलोचना में मुखरता से मिलता है ।
2. भक्तिकाल का मूल्यांकन: कबीर बनाम तुलसीदास
भक्ति आंदोलन, जो हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल माना जाता है, उसके कवियों के मूल्यांकन को लेकर भी दोनों मार्क्सवादी आलोचकों के मार्ग बिल्कुल अलग-अलग हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, रामविलास शर्मा ने तुलसीदास को भक्ति आंदोलन में सबसे बड़े 'जनवादी' (Democratic/Pro-people) कवि के रूप में स्थापित किया । डॉ. शर्मा ने तुलसी की भक्ति के दार्शनिक और धार्मिक पहलुओं का वायवीय मूल्यांकन करने के बजाय, उन्हें लौकिक (worldly) स्तर पर विश्लेषित किया। उन्होंने तुलसी के काव्य में अंतर्निहित सामंत-विरोधी (anti-feudal) मूल्यों और तत्कालीन समाज के आर्थिक-सामाजिक सरोकारों को प्रखरता से उजागर किया ।
दूसरी ओर, नामवर सिंह ने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की मानववादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपना संपूर्ण ध्यान कबीर पर केंद्रित किया । नामवर सिंह ने अपनी प्रगतिशील आलोचना दृष्टि से कबीर को मध्यकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में रखकर उनके विद्रोही, फक्कड़ और क्रांतिकारी चरित्र को अधिक प्रासंगिक माना । यह 'कबीर बनाम तुलसीदास' का विमर्श केवल दो कवियों की तुलना नहीं था, बल्कि यह वास्तव में भारतीय समाज के अंतर्निहित वर्गों—शहरी मध्यवर्ग बनाम दलित/शोषित लोक—की प्राथमिकताओं का एक तीखा बौद्धिक टकराव था।
3. भाषा की 'जातीयता' का प्रश्न
डॉ. रामविलास शर्मा ने 'जातीयता' (Jatiya/Ethno-linguistic nationalism) की अवधारणा को मार्क्सवादी ढांचे में ढालकर भारतीय संदर्भों में दृढ़ता से लागू किया। उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं के विकास को एक जातीय चेतना के विकास के रूप में देखा। नामवर सिंह भाषायी अस्मिता की बात अवश्य करते हैं, लेकिन आलोचकों के अनुसार उन्होंने भाषा को परम तत्व मान लेने या 'सामुदायिक अस्मिता' को साहित्य चर्चा का एकमात्र आधार बनाने के अंतर्निहित खतरों को कम करके आँका । नामवर सिंह पर यह बौद्धिक आरोप भी लगता है कि उनके 'निज भाषा' के विमर्श में मुख्य रूप से खड़ीबोली हिंदी पर ही ज़ोर दिया गया, जबकि हिंदी भाषी क्षेत्र की अन्य समृद्ध लोकभाषाओं और बोलियों का साहित्य उस विमर्श के हाशिए पर ही रह गया ।
तुलनात्मक रूप में नीचे दी गई तालिका दोनों दिग्गज मार्क्सवादी विचारकों के मध्य वैचारिक भेद को स्पष्ट करती है:
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वैचारिक आधार |
डॉ. रामविलास शर्मा का दृष्टिकोण |
डॉ. नामवर सिंह का दृष्टिकोण |
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नवजागरण का प्रस्थान-बिंदु |
1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम, साम्राज्यवाद विरोध और राजनीतिक संघर्ष । |
भारतेंदु युग, सांस्कृतिक नवजागरण और 'स्वत्व' अर्थात भाषायी अस्मिता । |
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भक्तिकाल का केंद्र-कवि |
तुलसीदास (उनकी लौकिक, समन्वयक और जनवादी चेतना के कारण) । |
कबीर (उनके विद्रोही, लोकधर्मी, फक्कड़पन और शास्त्र-विरोधी चरित्र के कारण) । |
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आलोचना की पद्धति |
कठोर समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक-भौतिकवादी और जातीय (Jatiya) पद्धति । |
रूपवादी और सौंदर्यशास्त्रीय तत्वों से पुष्ट लचीला मार्क्सवाद; विशुद्ध लोकवादी दृष्टि । |
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परंपरा के प्रति दृष्टिकोण |
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की सुदृढ़ परंपरा का तार्किक विकास और विस्तार। |
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'दूसरी परंपरा' की खोज और शुक्ल जी के वर्चस्व को चुनौती । |
वाचिक परंपरा का आचार्यत्व और संपादकीय प्रविधि
नामवर सिंह की सबसे बड़ी विशिष्टताओं में से एक यह थी कि उन्होंने हिंदी आलोचना को लिखित शब्द की जड़ सीमाओं और पांडित्य-प्रदर्शन से बाहर निकालकर उसे 'वाचिक परंपरा' (oral tradition) के रूप में एक सार्वजनिक और लोकतांत्रिक बौद्धिक अनुष्ठान बना दिया । भारत के अकादमिक और साहित्यिक हलकों में यह आम धारणा स्थापित हो चुकी थी कि यदि नामवर सिंह किसी नई कृति या विचार पर बोल दें, तो उसे साहित्यिक जगत की अंतिम मुहर मान लिया जाता था।
वाचिक आलोचना: साहित्य को मुख्यधारा में लाना
एक समय ऐसा था जब विद्वान हरीश त्रिवेदी के शब्दों में, हिंदी में दो ही तरह के साहित्यिक सेमिनार होते थे—"एक वे जिनमें नामवर सिंह उपस्थित होते थे, और दूसरे वे जिनमें नामवर सिंह उपस्थित नहीं होते थे" । कुछ कटु आलोचक उन्हें 'वाचिक परंपरा' का प्रतिनिधि कहकर उन पर यह व्यंग्य भी करते थे कि उन्होंने लिखना कम कर दिया है और केवल बोलने तक सीमित हो गए हैं । परंतु प्रो. सुधीश पचौरी जैसे प्रख्यात विद्वानों का दृढ़ मत है कि नामवर सिंह ने अपने वाचिक व्याख्यानों के माध्यम से आलोचना को पहली बार साहित्य की मुख्यधारा (mainstream) में ला खड़ा किया। उनसे पहले हिंदी में मुख्य विधाएं केवल कविता और कहानी मानी जाती थीं; नामवर सिंह ने आलोचना को एक स्वतंत्र, प्रभावशाली और लोकप्रिय विधा का दर्जा दिलाया ।
सुधीश पचौरी के अनुसार, "नामवर सिंह जैसा पढ़ने-लिखने वाला और ज्ञान की पिपासा रखने वाला व्यक्ति कोई नहीं था। वे हिंदी साहित्य के अमिताभ बच्चन हैं, उन जैसा कोई नहीं बन सका" । उनका वाचिक रूप अत्यंत मारक, नपा-तुला और संवादात्मक होता था। उनकी मुस्कान और उनके 'पॉज़' (ठहराव) भी अनलिखी आलोचना का काम करते थे । मंचों से बोलते हुए वे पुरानी मान्यताओं को ध्वस्त करते थे। इस वाचिक शैली का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि आलोचना विश्वविद्यालयों के सेमिनार कक्षों से निकलकर सामान्य पाठकों, युवा शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के बीच पहुँच गई और इसने हिंदी साहित्य को एक जीवंत 'पब्लिक स्फीयर' (public sphere) प्रदान किया ।
'आलोचना' पत्रिका का संपादन और वैचारिक संघर्ष
नामवर सिंह का दूसरा सबसे सशक्त अस्त्र उनका विलक्षण संपादन कर्म था। यद्यपि उन्होंने 'जनयुग' (1965-1967) का भी संपादन किया, परंतु 1967 से 1990 तक प्रतिष्ठित त्रैमासिक पत्रिका 'आलोचना' का संपादन कर उन्होंने इसे हिंदी में वैचारिक विमर्श का सर्वोच्च मंच बना दिया ।
उन्होंने इस पत्रिका के संपादन में अपने संपादकीय विवेक का परिचय देते हुए दो सर्वथा नई पद्धतियाँ विकसित कीं:
1. एक ही साहित्यिक कृति पर दो या तीन अलग-अलग समीक्षकों की समीक्षाएं एक साथ प्रस्तुत करना, ताकि एक ही पुस्तक के विभिन्न वैचारिक पहलू पाठकों के सामने आ सकें।
2. एक ही समीक्षक द्वारा तीन-चार पुस्तकों की एक साथ समीक्षा प्रकाशित करना, जिससे उस समीक्षक की समग्र प्रतिभा और वैचारिक संभावनाओं का आकलन किया जा सके ।
इन नवोन्मेषी पद्धतियों ने हिंदी में पुस्तक समीक्षा को 'पुस्तक परिचय' के रूढ़ अर्थ से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया और उसे 'वैचारिक संघर्ष' की चेतना में बदल दिया। इससे लेखक और समीक्षक के बीच एक स्वस्थ, तीखी और लोकतांत्रिक बहस की गुंजाइश पैदा हुई ।
आलोचना की सीमाएं, समकालीन विमर्श और अंतर्विरोध
किसी भी महान विचारक की तरह डॉ. नामवर सिंह का कृतित्व भी आलोचनाओं, सीमाओं और विवादों से अछूता नहीं रहा। उनके सुदीर्घ साहित्यिक जीवन के उत्तरार्ध में कई नए विमर्शों का उदय हुआ, जिनके प्रति उनके दृष्टिकोण को लेकर समकालीन बुद्धिजीवियों ने कड़े और चुभते हुए प्रश्न उठाए।
1. दलित और स्त्री विमर्श के प्रति उदासीनता और सामंती सोच का आरोप
बीसवीं सदी के अंतिम और इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हिंदी साहित्य में 'दलित विमर्श' और 'स्त्री विमर्श' ने हाशिए से उठकर केंद्र में अपनी जगह बनाई। वरिष्ठ आलोचक प्रो. विजय कुमार भारती, सुधीश पचौरी और जगदीशवर चतुर्वेदी जैसों ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि डॉ. नामवर सिंह इन नए और ज्वलंत विमर्शों के प्रति प्रायः उदासीन बने रहे ।
यह बौद्धिक जगत के लिए आश्चर्यजनक था कि मार्क्सवाद और बहुसंख्यक 'लोक' की वकालत करने वाले नामवर सिंह ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया के वैचारिक दर्शन पर गंभीरता से कोई सैद्धांतिक विमर्श नहीं किया । आलोचकों के अनुसार, उनकी यह रहस्यमयी उदासीनता उन्हें कटघरे में खड़ी करती है और कहीं न कहीं उन पर 'सामंती सोच' (feudal mindset) या सवर्ण-अभिजात्य पूर्वाग्रहों के आरोप भी लगाए जाते हैं । 'सामुदायिक अस्मिता' और भाषायी वर्चस्व की राजनीति में दलितों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों के हाशियाकृत अनुभवों को उनके आलोचनात्मक कैनवस पर वह विस्तार और स्वीकृति नहीं मिली, जिसकी अपेक्षा एक युगदृष्टा प्रगतिशील आलोचक से की जाती थी ।
2. प्रोपेगैंडिस्ट होने का आरोप और वैचारिक चंचलता (लुकाच से तुलना)
कुछ धुर-विरोधी आलोचकों ने नामवर सिंह को "आलोचक कम और साहित्य के प्रोपेगैंडिस्ट ज्यादा" करार दिया । एक लंबे दौर में उन पर यह भी आरोप लगा कि वे सफल रचनाकारों को स्थापित या खारिज करने की एक 'सत्ता' (power center) बन गए थे, जो लगभग 60 वर्षों तक हिंदी साहित्य की दिशा को अपने मन-मुताबिक डिक्टेट (dictate) करते रहे ।
प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय ने नामवर सिंह की वैचारिक यात्रा की तुलना हंगरी के प्रसिद्ध मार्क्सवादी दार्शनिक और साहित्यिक आलोचक 'जॉर्ज लुकाच' (György Lukács) से की है । जिस प्रकार लुकाच ने अपने जीवनकाल में अपनी ही कई पूर्व-मान्यताओं और पुस्तकों को खारिज (disown) किया था, ठीक वैसे ही नामवर सिंह ने भी 'इतिहास और आलोचना' तथा 'कविता के नए प्रतिमान' की अपनी कई प्रारंभिक स्थापनाओं को बाद के वर्षों में छोड़ दिया या उन पर पुनर्विचार किया । हालांकि, मैनेजर पांडेय इसे कोई वैचारिक विचलन या अवसरवादिता नहीं मानते, बल्कि साहित्य के प्रति उनकी 'अटूट प्रतिबद्धता' (unwavering commitment) का साक्ष्य मानते हैं। वे कहते हैं कि नामवर जी के लिए मार्क्सवादी सिद्धांत से अधिक महत्वपूर्ण स्वयं 'साहित्य' था, और वे हर उस सिद्धांत या रूढ़ि को छोड़ने को तैयार रहते थे जो साहित्य के रसास्वादन, उसके विकास और यथार्थ-बोध में बाधक बनता हो ।
3. इतिहास-लेखन में नवीनता का अभाव और दार्शनिक बचाव
नामवर सिंह ने 'इतिहास और आलोचना' में यह माना था कि इतिहास केवल नई सूचनाओं का संकलन नहीं, बल्कि 'नवीन व्याख्या' (new interpretation) है । उन्होंने 'परंपरा' के जीवित और मरे हुए हिस्सों को पहचानने की गहन बात कही। परंतु, आलोचकों का यह मानना है कि स्वयं नामवर सिंह ने अपने पूरे जीवनकाल में कभी कोई मुकम्मल इतिहास ग्रंथ नहीं लिखा; वे केवल इतिहास-दृष्टि के सैद्धांतिक पहलुओं पर विमर्श करते रहे । उनका यह तर्क कि "परंपरा की जीवंत चेतना होने पर शायद लिखित इतिहास की आवश्यकता ही न रहे", एक तरह से उनके स्वयं इतिहास न लिखने का एक दार्शनिक बचाव (philosophical defense) प्रतीत होता है ।
निष्कर्ष
डॉ. नामवर सिंह हिंदी आलोचना के एक ऐसे प्रखर, अद्वितीय और बहुआयामी प्रकाश-स्तंभ हैं, जिनका समग्र आकलन किसी एक विचारधारा, एक विधा या एक युग की संकीर्ण सीमाओं में बांधकर नहीं किया जा सकता। वे भारतीय नवजागरण की परंपरा के सच्चे संवाहक और एक ऐसे 'पब्लिक इंटेलेक्चुअल' (public intellectual) थे, जिन्होंने भाषा, साहित्य, समाज और संस्कृति के जटिल अंतर्संबंधों को बंद कमरों से निकालकर एक लोकतांत्रिक और विस्तृत संवाद का रूप दिया ।
मार्क्सवादी दृष्टि से लैस होकर भी उन्होंने साहित्य की सौंदर्यशास्त्रीय स्वायत्तता की आजीवन रक्षा की और हिंदी आलोचना को रूपवादी और कलावादी अंधकूपों में गिरने से बचाया । 'दूसरी परंपरा की खोज' के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज में शास्त्र के ऊपर लोक की विजय को सैद्धांतिक रूप से स्थापित किया, तो 'कविता के नए प्रतिमान' के जरिए उन्होंने आधुनिक संवेदनाओं और जीवन के अंतर्विरोधों को आलोचना के बिल्कुल केंद्र में ला बिठाया। डॉ. रामविलास शर्मा जैसे समकालीन दिग्गजों के साथ उनके ऐतिहासिक और तीखे मतभेदों ने हिंदी विमर्श को वैचारिक शून्यता और एकरसता से बचाते हुए एक सतत द्वंद्वात्मक ऊर्जा प्रदान की।
यद्यपि समकालीन दलित और स्त्री विमर्शों के संदर्भ में उनकी दृष्टियों की सीमाएं स्पष्ट रूप से उजागर हुई हैं, और उनकी वाचिक-शैली के वर्चस्व को लेकर विवाद भी निरंतर रहे हैं, तथापि इस अकाट्य सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक हिंदी आलोचना की कोई भी सार्थक चर्चा डॉ. नामवर सिंह के विस्तृत उल्लेख और उनके द्वारा स्थापित प्रतिमानों के बिना न तो आरंभ हो सकती है और न ही पूर्णता को प्राप्त कर सकती है। उन्होंने आलोचना को 'समालोचना' (सम्यक आलोचना) में बदला और जीवन पर्यंत वैचारिक जंजीरों को तोड़ने का साहसिक कार्य किया । हिंदी साहित्य को एक प्रतिरोध (protest) और लोकमंगल का साहित्य बनाने में उनके द्वारा गढ़ी गई वैचारिक पीठिकाएं आने वाली पीढ़ियों और शोधार्थियों के लिए सदैव एक अमोघ 'संजीवनी' का कार्य करती रहेंगी ।
अभिषेक यादव, स्तंभकार (पूर्व छात्र काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)
इन स्रोतों से जानकारी ली गई
1. Namvar Singh | हिन्दी आलोचक | जीवन और लेखन - YouTube, https://www.youtube.com/watch?v=J_sLmDb05Yg 2. नामवर सिंह आलोचना को साहित्य की मुख्यधारा में लेकर आए: सुधीश पचौरी - डीडी न्यूज़, https://ddnews.gov.in/namvar-singh-brought-criticism-into-the-mainstream-of-literature-sudhish-pachauri/?news_type=All&tid=12840&tid_1=12876 3. Namvar Singh Defined the Contours of Hindu Literary Culture - LOKAYAT, https://lokayat.org.in/2019/namvar-singh-defined-the-contours-of-hindu-literary-culture/ 4. आधुनिक हिन्दी आलोचना के विकास में नामवर सिंह का योगदान, https://files01.core.ac.uk/download/144516682.pdf 5. Namvar Singh ka Alochana Karm -Part 1, M. A.4th Sem by Dr. Sameer Kumar Pathak (Hindi), https://www.youtube.com/watch?v=30ElA8ogLHo 6. Imparting creative dimension to Marxist criticism: The role of Namvar Singh - Academia.edu, https://www.academia.edu/38544020/Imparting_creative_dimension_to_Marxist_criticism_The_role_of_Namvar_Singh 7. हिंदी आलोचना के विकास में नामवर सिंह संपादित 'आलोचना' पत्रिका ... - CORE, https://files01.core.ac.uk/download/144527628.pdf 8. हिन्दी आलोचना की वाचिक परम्परा के आचार्य हैं नामवर सिंह - YourStory.com, https://yourstory.com/hindi/779cfc552c-namveer-singh-the-tea 9. नामवर सिंह - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर, https://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9 10. नामवर सिंह - विकिपीडिया, https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9 11. नामवर सिंह हिंदी-साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार आलोचना, https://www.hindisamay.com/content/3388/1/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9-%E0%A4%86%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0.cspx 12. Tribute: Namvar Singh was the most powerful critic and influencer of modern Hindi literature, https://scroll.in/article/914129/namvar-singh-1927-2019-was-the-most-powerful-critic-and-influencer-of-modern-hindi-literature 13. Decolonizing The Indian Mind | PDF - Scribd, https://www.scribd.com/presentation/808389754/Decolonizing-the-Indian-Mind 14. Kavita Ke Naye Pratiman - Rajkamal Prakashan, https://rajkamalprakashan.com/kavita-ke-naye-pratiman.html 15. Hindi writer Namvar Singh dies - The Tribune, https://www.tribuneindia.com/news/archive/nation/hindi-writer-namvar-singh-dies-732179/ 16. नामवर सिंह और हिंदी आलोचना में लोकवादी विचारधारा - IJCRT.org, https://www.ijcrt.org/papers/IJCRT2512911.pdf 17. End of an era: on literary critic Namvar Singh - The Hindu, https://www.thehindu.com/books/books-authors/end-of-an-era/article26331948.ece 18. 144517968.pdf - CORE, https://files01.core.ac.uk/download/pdf/144517968.pdf 19. नामवर के होने न होने के बीच | समालोचन, https://samalochan.com/namvar-singh-4/ 20. हिंदी आलोचना में नामवर सिंह का योगदान - IJTSRD, https://www.ijtsrd.com/papers/ijtsrd49965.pdf 21. हिंदी आलोचना और नामवर सिंह की आलोचकीय दृष्टि विशेष तौर पर कहानी के संदर्भ में परिंदे का मूल्यांकन - YouTube, https://www.youtube.com/watch?v=x05FaE5nzqY 22. आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में नामवर सिंह और रामस्वरुप चतुर्वेदी द्वारा 'दूसरी परंपरा की खोज' का मूल्यांकन- अनामिका दास | VISHWAHINDIJAN, https://www.vishwahindijan.in/ramswarup-chaturvedi-hajari-prasad-dwidewdi-namwar-singh/ 23. सबद भेद : दूसरी परंपरा की खोज : अमरेन्द्र कुमार शर्मा - समालोचन, https://samalochan.blogspot.com/2017/03/blog-post_29.html 24. Madhyakalin Gujarati Sahityana Itihas Lekhannu Swarup - Book Summary - JainGPT, https://jaingpt.org/knowledge/madhyakalin_gujarati_sahityana_itihas_lekhannu_swarup_229704_229704 25. नामवर सिंह और अस्मिता विमर्श - नया जमाना, http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.com/2015/01/blog-post_34.html 26. 'kks/&lkj, https://jmi.ac.in/upload/Research/ab_2018_hindi_premvati.pdf 27. अक्तूबर 2016 - आजकल, https://www.publicationsdivision.nic.in/journals/Journalarchives/Ajkal/Ajkal-Hindi/2016/October/Ajkal_2016_October_pdf.pdf 28. 'दलित और नारी विमर्श के प्रति उदासीन थे नामवर ' - Patrika News, https://www.patrika.com/kolkata-news/namwar-was-depressed-towards-dalit-and-women-s-discussions-4364907 29. 'नामवर सिंह आलोचक कम और साहित्य के प्रौपेगैण्डिस्ट ज्यादा नजर आते ..., https://www.pravakta.com/the-decline-of-critic-and-namvar-singh/ 30. रामविलास शर्मा और नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि |-Dr.Rajneesh - YouTube, https://www.youtube.com/watch?v=5cepdidvGBs
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