कलम और बारूद का साहित्यकार रेणु। वेब पत्रिका 'मीमांसा'।

4 मार्च को फणीश्वर नाथ रेणु जी की जयंती है । आज मीमांसा के पाठकों के लिए हम एक श्रद्धांजलि आलेख पाठकों को समर्पित कर रहे हैं। जो उस 'मैला आँचल' के बुनकर की दास्तान है, जिसके एक हाथ में जादुई कलम थी और दूसरे में लोहे की पिस्तौल। आइए, रेणु के उस विराट व्यक्तित्व को एक नए शिल्प के गद्य में पिरोते हैं, जहाँ इतिहास, कल्पना और क्रांति का संगम है।

"लाल कलगी वाले मुर्गे की बाँग" रेणु का वह चेहरा जो स्याही से नहीं, पसीने और बारूद से लिखा गया।
तारीख की गर्द झाड़िए। साल 1951-52 का है। हिमालय की तराई में हवाएँ कुछ ज्यादा ही सर्द हैं, लेकिन नेपाल की वादियों में खून खौल रहा है। राणाशाही के जुल्म के खिलाफ एक क्रांति की आग भड़की है। उस आग के बीचो-बीच खड़ा है एक दुबला-पतला शख्स, जिसकी आँखों में गजब की चमक है और जिसके कंधे पर एक झोला लटका है। लोग उसे 'रेणु' कहते हैं।

उस दौर की एक दुर्लभ तस्वीर आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। रेणु, जो पूर्णिया के गाँवों की गंध को कागजों पर उतारने के लिए मशहूर थे, उस वक्त नेपाल के मुक्ति-संग्राम में 'रेडियो' का संचालन कर रहे थे। पर क्या वह सिर्फ शब्दों के जादूगर थे? नहीं।
कहा जाता है कि जब वे इस खतरनाक सफर पर निकल रहे थे, तो उनकी जीवनसंगिनी लतिका जी ने उन्हें एक पिस्तौल सौंपी थी। वह पिस्तौल महज एक हथियार नहीं थी, वह एक लेखक के उस संकल्प का प्रतीक थी कि जब अन्याय की सीमा पार हो जाए, तो कलम को म्यान में रखकर बारूद को बोलना पड़ता है। लेकिन इस पिस्तौल के पीछे की एक और परत है—राष्ट्रकवि दिनकर। दिनकर जानते थे कि इस कोमल हृदय कथाकार के दुश्मन कम नहीं हैं। वे नेहरू जी के पास गए, सिफारिश की और रेणु को आत्मरक्षार्थ लाइसेंस मिला। सोचिए, वह दृश्य कैसा रहा होगा! एक तरफ विश्व-साहित्य को 'मैला आँचल' जैसा महाकाव्य देने वाला लेखक और दूसरी तरफ उसकी कमर में लटकी हुई वह पिस्तौल। यह रेणु का वह 'एक्शन' अवतार था, जिसने उन्हें महज़ एक किताबी लेखक से ऊपर उठाकर एक 'योद्धा-रचनाकार' बना दिया।

'मैला आँचल' का वह गठीला बदन वाला युवा, कालीचरण। जो अखाड़े में कुश्ती लड़ता है और समाज की सड़ांध को अपनी लाठी से साफ करना चाहता है। कालीचरण कोई काल्पनिक पात्र नहीं था, वह स्वयं रेणु के भीतर का वह बागी था जो 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में भागलपुर की जेल की सलाखों के पीछे तपा था।
रेणु के भीतर एक 'लाल कलगी वाला मुर्गा' छिपा था। यह मुर्गा तब बाँग देता था जब व्यवस्था अंधी हो जाती थी। जब उन्हें लगा कि आजादी के बाद का 'स्वराज' केवल सफेदपोशों की जागीर बन गया है, तो उनके भीतर का कालीचरण जाग उठा। उन्होंने केवल लिखा नहीं, उन्होंने जिया। 1942 में अपने गुरु सतीनाथ भादुड़ी के साथ जब वे निकले थे, तब उन्होंने देखा कि असली दुश्मन केवल गोरे नहीं हैं, बल्कि वे काले अंग्रेज भी हैं जो अपनों का ही लहू पी रहे हैं।
यही कारण था कि मैला आँचल के जुलूस का वर्णन करते समय उनके शब्द कड़वे हो गए "यह आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है।" आज के दौर में, जहाँ नारों से लोगों को घुटन होने लगती है, रेणु का यह 'कालीचरण अवतार' याद दिलाता है कि प्रतिरोध ही लोकतंत्र की पहली शर्त है।

लेकिन रेणु केवल कालीचरण नहीं थे। उनके भीतर एक 'बावनदास' भी रहता था। वह छोटा सा आदमी, जिसका शरीर भले ही बौना था, लेकिन जिसकी नैतिकता हिमालय से भी ऊँची थी। बावनदास यानी वह गांधीवादी करुणा, जो भारत और पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) की सीमा पर नफरत और तस्करी के खिलाफ खड़ी हो गई और अंततः उसी नफरत की भेंट चढ़ गई।
रेणु का बावनदास वाला रूप तब दिखता है, जब वे पूर्णिया से पटना तक 350 किलोमीटर की पदयात्रा पर निकल पड़ते हैं। शरीर बीमार है, हड्डियाँ जवाब दे रही हैं, लेकिन किसानों की समस्या और अकाल की विभीषिका उन्हें चैन से बैठने नहीं देती। वह दृश्य कितना मार्मिक रहा होगा—एक महान लेखक, धूल भरे रास्तों पर, फटी हुई चप्पलें पहने, किसानों के हक के लिए पैदल चल रहा है।
बावनदास की शहादत रेणु की निजी शहादत जैसी थी। वे जानते थे कि सत्ता के गलियारों में बावनदास जैसों की जगह नहीं है, इसलिए वे खुद भी अक्सर 'अन्यमनस्क' हो जाते थे। जब इलाके में बाढ़ आती, तो वे कलम छोड़कर नाव लेकर निकल पड़ते। बाद में उन्होंने उसी 'नाव' को अपना चुनाव चिह्न बनाया। वे सदन में पहुँचना चाहते थे ताकि उन लोगों की आवाज़ बन सकें जिनके पास आवाज़ नहीं थी। हालांकि, राजनीति की गंदी गलियों ने उन्हें जल्द ही निराश कर दिया, लेकिन बावनदास की वह नैतिक लौ उनके भीतर कभी नहीं बुझी।

रेणु का जीवन विरोधाभासों का सुंदर संगीत था। वे नेहरू के प्रशंसक थे, उनके उपन्यासों में नेहरूवादी विकास के सपने थे, लेकिन जब नेहरू का मॉडल नाकाम हुआ, तो उन्होंने 'उत्तर नेहरूचरित' जैसा तीखा व्यंग्य लिखने में देर नहीं लगाई।
मगध के भीषण अकाल के समय जब वे टूटने लगे थे, तब अज्ञेय उन्हें खींचकर बाहर ले गए। उस अकाल का जो रिपोर्ताज रेणु ने 'दिनमान' के लिए लिखा, वह महज़ पत्रकारिता नहीं थी, वह एक डूबती हुई आत्मा की पुकार थी। और फिर आया वह साल, जब जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंका।
रेणु की रगों में फिर से क्रांति का वह पुराना बारूद सुलगा। जब पुलिस ने जेपी पर लाठियाँ बरसाईं, तो रेणु के भीतर का योद्धा तिलमिला उठा। उन्होंने भारत सरकार द्वारा दिए गए 'पद्मश्री' के सम्मान को 'पापश्री' कहकर लौटा दिया। यह एक लेखक का सबसे बड़ा बयान था। उन्होंने बता दिया कि सम्मान जनता की पीड़ा से बड़ा नहीं हो सकता।

इमरजेंसी का दौर आया। रेणु फिर जेल गए। जिस लेखक ने आज़ाद भारत का सबसे सुंदर सपना बुना था, उसे उसी आज़ाद भारत की जेलों में यातनाएँ मिलीं। जेल की सीलन और खराब खाने ने उनके भीतर पेप्टिक अल्सर को जन्म दिया। उनके अपनों का कहना है कि अगर जेल में सही इलाज मिलता, तो वे हमें इतनी जल्दी छोड़कर नहीं जाते।1977 में महज 57 वर्ष की आयु में वह 'लाल कलगी वाला मुर्गा' हमेशा के लिए खामोश हो गया। लेकिन क्या वह वाकई खामोश हुआ?

आज जब हम 'लिट फेस्ट' के चकाचौंध वाले लेखकों को देखते हैं, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर 'क्रांति' पर विमर्श करते हैं, तब रेणु की वह तस्वीर जिसमें वे 'अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह' परमेश्वर धानुक से संवाद कर रहे हैं, हमें झकझोर देती है।
रेणु ने सिखाया कि लेखक वह नहीं है जो केवल शब्दों के साथ खेलता है, लेखक वह है जो अपने समय के सबसे खूंखार सच के सामने खड़ा होने का हौसला रखता है। वे 'जुलूस' उपन्यास में शरणार्थियों की पीड़ा लिखते हैं, तो आज के सीएए-एनआरसी के दौर में वे फिर से जीवित हो उठते हैं।

रेणु के भीतर कालीचरण का विद्रोह था और बावनदास की करुणा। वे कभी नाव पर थे, कभी पैदल पगडंडियों पर, तो कभी हाथ में पिस्तौल लिए क्रांति के मैदान में। उनका साहित्य महज़ 'गाँव की चुहलबाजी' नहीं है, वह सत्ता से टकराने का एक घोषणापत्र है।

आज अगर रेणु होते, तो शायद फिर से किसी नाव पर सवार होते या किसी नए आंदोलन में अपनी कलम को तलवार बना रहे होते। उनका जीवन एक संदेश है कि लेखक का काम केवल कागज़ काले करना नहीं, बल्कि समय के कालेपन से लड़ना भी है।
फणीश्वरनाथ रेणु एक ऐसे योद्धा-कवि थे, जिन्होंने न केवल 'मैला आँचल' लिखा, बल्कि उस आँचल की रक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा दी। आज के बागी लेखक समाज को रेणु से यही सीखना है कि कलम जब कम पड़ जाए, तो कदम सड़कों पर होने चाहिए।

यह कहानी अधूरी रह जाएगी, अगर हम उस पिस्तौलधारी योद्धा के सीने के भीतर धड़कते एक बेहद कोमल, मासूम और सिसकते हुए दिल की बात न करें। रेणु सिर्फ गर्जना नहीं थे, वे कोसी की लहरों पर तैरती एक मद्धम बांसुरी भी थे।

हीरामन की बाँसुरी और वह निश्छल चुहलबाज़ी
कल्पना कीजिए, वही रेणु जो नेपाल की पहाड़ियों में बंदूक लिए फिर रहे थे, जब अपने गाँव 'औराही हिंगना' की पगडंडियों पर लौटते थे, तो उनका चोला पूरी तरह बदल जाता था। तब वे क्रांतिकारी नहीं, बल्कि 'मारे गए गुलफाम' के उस हीरामन की तरह हो जाते थे, जिसे दुनिया की चालाकियों की एबीसीडी भी नहीं पता थी।
रेणु के भीतर एक ऐसी चुहलबाज़ी थी, जो शुद्ध देहाती माटी की उपज थी। जैसे हीरामन अपनी बैलगाड़ी के बैलों से बतियाता है, उन्हें पुचकारता है, वैसे ही रेणु शब्दों को पुचकारते थे। उनके ठहाकों में वह खनक थी जो किसी मेले के शोर में भी अलग से पहचानी जा सकती थी। वे जीवन को एक 'बिसुध' प्रेमी की तरह देखते थे। उनके लिए राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं थी, वह भी एक तरह की 'तीसरी कसम' थी एक ऐसा वादा जिसे निभाते हुए हार जाना भी गौरव की बात थी।
हीरामन की तरह रेणु भी अक्सर 'बिसुध' (सुध-बुध खो देना) हो जाते थे। जब वे किसी लोकगीत की तान सुनते या किसी ग्रामीण उत्सव की ढोलक की थाप, तो उनके भीतर का योद्धा चुपचाप एक कोने में बैठ जाता और एक मुग्ध बच्चा जाग उठता। यह वही भोलापन था जिसने उन्हें फरेबी राजनीति के मैदान में भी 'नाव' जैसा मासूम चुनाव चिह्न लेकर उतरने का हौसला दिया।

लेकिन इस भोलापन और चुहलबाज़ी के पीछे एक गहरा, काला कुआं भी था वह था संवादिया हरगोबिन की करुणा।
रेणु का जीवन वास्तव में एक 'संवादिया' का जीवन था। संवादिया, जो दूसरों के दुख की चिट्ठी अपनी याददाश्त में दर्ज करता है और उसे सुनाते वक्त खुद भी रो पड़ता है। जब बिहार में भीषण अकाल पड़ा, तो रेणु के भीतर का 'हरगोबिन' जाग उठा। वे महज़ एक रिपोर्टर बनकर अकाल की खबरें नहीं लिख रहे थे, वे उस 'बड़ी बहुरिया' की सिसकी बन गए थे जिसके पास अपनी पीड़ा कहने को शब्द नहीं बचे थे।
हरगोबिन की तरह रेणु के गले में भी अक्सर एक आँसू अटका रहता था। वे जब रिपोर्ताज लिखते, तो ऐसा लगता मानो कोई मर्माहत आदमी सरेआम विलाप कर रहा हो। वह विलाप कमजोरी का नहीं, बल्कि गहरी संवेदनशीलता का था। जिस आदमी ने हाथ में पिस्तौल पकड़ी हो, उसकी आँखों में 'संवादिया' जैसी नमी होना ही उसे दुनिया का सबसे महान लेखक बनाता है।
जैसे हरगोबिन अंततः संदेश नहीं कह पाता क्योंकि वह गाँव की 'लाज' रखना चाहता है, रेणु भी कई बार व्यवस्था की नग्नता देखकर इतने व्यथित हो जाते कि मौन हो जाते। उनका वह 'अन्यमनस्क' हो जाना, उनका वह एकांत में चले जाना, दरअसल हरगोबिन की वही पीड़ा थी जो शब्दों के माध्यम से बाहर नहीं आ पा रही थी। तो, यह है फणीश्वरनाथ रेणु का वह विराट कोलाज:
एक तरफ कालीचरण का बागी तेवर और पिस्तौल की ठंडी नाल, दूसरी तरफ बावनदास की नैतिक शहादत। एक तरफ हीरामन की बैलगाड़ी पर बजती हुई प्रेम की बाँसुरी, तो दूसरी तरफ हरगोबिन की आँखों में तैरता हुआ मानवता का करुण संवाद।
वे किसी एक सांचे में नहीं बंधे। उन्होंने दिखाया कि एक लेखक 'योद्धा' भी हो सकता है और 'संवादिया' भी। वे कलम की मार से सत्ता को हिला भी सकते थे और शब्दों के लेप से गरीब के घावों को सहला भी सकते थे।
आज जब  उन्हें याद करते हैं, तो उनकी वह तस्वीर हमें चिढ़ाती भी है और प्रेरणा भी देती है। वह तस्वीर कहती है -"अरे भाई, लेखक होना है तो पूरा इन्सान बनो। पिस्तौल की हिम्मत भी रखो और संवादिया का कलेजा भी।" रेणु आज भी कोसी की लहरों में, धान के खेतों की गंध में और हर उस नौजवान की मुट्ठी में जिंदा हैं जो नाइंसाफी के खिलाफ तनकर खड़ा हो जाता है।

अमन कुमार होली 
संपादक, मीमांसा 


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