संपादकीय: साहित्य के 'शिखर' और सादगी के 'शंकर' — पंडित हरिशंकर शर्मा। वेब पत्रिका 'मीमांसा'।
पंडित हरिशंकर शर्मा जी की पुण्यतिथि (9 मार्च) के अवसर पर, वेब पत्रिका 'मीमांसा' श्रद्धांजलि आलेख प्रस्तुत कर रही है:
आज की आपाधापी और आत्म-प्रशंसा के युग में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो साहित्य आकाश पर एक ऐसा नक्षत्र दिखाई देता है जिसने अपनी चमक से न केवल हिंदी साहित्य को आलोकित किया, बल्कि पत्रकारिता के मूल्यों को भी नई ऊँचाई प्रदान की। वे थे— पंडित हरिशंकर शर्मा। आज उनकी पुण्यतिथि पर 'मीमांसा' परिवार उन्हें शत-शत नमन करता है।
स्वाभिमान और सादगी का संगम
पंडित जी का व्यक्तित्व उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में से था, जहाँ पांडित्य और विनम्रता एक साथ निवास करते थे। बाबू गुलाबराय ने ठीक ही कहा था कि पंडित जी का 'अहम्' स्वयं के लिए नहीं, बल्कि साहित्य-सृजक वर्ग के सम्मान के लिए था। एक ऐसा साहित्यकार, जिसने विधिवत विद्यालयी शिक्षा न पाकर भी अपनी साधना से उर्दू, फ़ारसी, गुजराती और मराठी जैसी भाषाओं पर अधिकार प्राप्त किया, हम सभी शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का पुंज है।
पत्रकारिता के स्वाभिमानी हस्ताक्षर
'आर्यमित्र', 'निराला', 'ज्ञानगंगा' और 'दैनिक दिग्विजय' जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने जो संपादकीय मानदंड स्थापित किए, वे आज की पत्रकारिता के लिए एक मार्गदर्शिका हैं। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में, पंडित जी के हाथ में आते ही पत्रों के लेखों में एक "विचित्र स्फूर्ति" आ जाती थी। उन्होंने पत्रकारिता को केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की कुरीतियों और रूढ़ियों पर प्रहार करने वाला एक 'शस्त्र' बनाया।
हास्य-व्यंग्य की स्वस्थ परंपरा
आज जब हास्य के नाम पर फूहड़ता परोसी जा रही है, तब पंडित हरिशंकर शर्मा की रचनाएँ याद आती हैं। उनकी 'घास-पात', 'पिंजरा पोल' और 'मटकाराम मिश्र' जैसी कृतियों में जो हास्य है, वह शुद्ध और परिष्कृत है। उनका व्यंग्य किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि समाज को आइना दिखाकर उसे सुधारने के लिए था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने उन्हें 'साधुमना और संत साहित्यकार' की संज्ञा यूँ ही नहीं दी थी।
क्रांति और राष्ट्रप्रेम
बहुत कम लोग जानते हैं कि पंडित जी केवल कलम के ही सिपाही नहीं थे, बल्कि स्वाधीनता संग्राम के एक मौन बलिदानी भी थे। 1930 के आंदोलन के दौरान एक डिप्टी कलेक्टर के दमनकारी चक्र को रोकने के प्रयास में वे स्वयं गंभीर रूप से घायल हुए। उनका घर बलिदानियों का अड्डा और आश्रय-स्थल रहा। 'पद्मश्री' और 'डी.लिट.' जैसे सम्मान उनके विराट व्यक्तित्व के सामने छोटे प्रतीत होते हैं।
'मीमांसा' के इस अंक के माध्यम से हम पंडित हरिशंकर शर्मा के उन आदर्शों को पुनर्जीवित करने का संकल्प लेते हैं, जहाँ साहित्य समाज का केवल दर्पण नहीं, बल्कि उसका मार्गदर्शक भी बने। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
"उनकी रचनाएँ देखकर उनकी सौम्य मूर्ति सम्मुख पाता हूँ।"
— मैथिलीशरण गुप्त
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