व्यवस्था की विसंगतियों का दरबारी चितेरा : श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी की शाश्वत गूँज
हिंदी साहित्य के आकाश में श्रीलाल शुक्ल एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से व्यवस्था के उस चेहरे को बेनकाब किया जिसे हम अक्सर देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। उनकी जयंती के सुअवसर पर वेब पत्रिका 'मीमांसा' की उनकी कालजयी कृति 'रागदरबारी' का समाजशास्त्रीय विश्लेषण और उनकी रचनाधर्मिता पर यह विशेष प्रस्तुति ।
श्रीलाल शुक्ल की रचनाधर्मिता : हँसी के पीछे छिपा हुआ अट्टहास
श्रीलाल शुक्ल केवल एक कथाकार नहीं थे, वे व्यवस्था के एक्स-रे विशेषज्ञ थे। उनकी रचनाधर्मिता का सबसे प्रखर पक्ष उनका व्यंग्य है। उनका व्यंग्य किसी को केवल गुदगुदाने के लिए नहीं है, बल्कि वह उस घाव पर उंगली रखता है जहाँ से सत्ता की सड़ांध शुरू होती है। शुक्ल जी ने व्यंग्य को हिंदी साहित्य में केवल एक 'विधा' से उठाकर एक दृष्टि बना दिया।
उनकी रचनाधर्मिता की पहली विशेषता है तटस्थता। एक प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते उन्होंने सत्ता के गलियारों को बहुत करीब से देखा था, लेकिन जब वे लिखने बैठे, तो उन्होंने किसी दल या विचारधारा का चश्मा नहीं पहना। उन्होंने 'शिवपालगंज' के माध्यम से भारत के उस ग्रामीण यथार्थ को पकड़ा, जो विकास के नारों के बीच अपनी धूर्तता और लाचारी में फंसा हुआ था।
उनकी भाषा में एक विशेष प्रकार का 'साहित्यिक कौतुक' है। वे जटिल से जटिल दार्शनिक या राजनीतिक विसंगतियों को ग्रामीण मुहावरों और चुटीले अंदाज में कहने की कला जानते थे। 'सूनी घाटी का सूरज' से लेकर 'पहला पड़ाव' और 'बिसाती' तक, उनकी लेखनी में निरंतर विकास मिलता है, लेकिन 'रागदरबारी' में यह अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती है।
श्रीलाल शुक्ल की रचनाधर्मिता का केंद्र 'नैतिकता का पतन' है। वे यह नहीं दिखाते कि व्यवस्था बुरी है, बल्कि वे यह दिखाते हैं कि कैसे व्यवस्था ने मनुष्य को इतना प्रैक्टिकल बना दिया है कि वह अपनी अनैतिकता में भी गौरव का अनुभव करता है। उनके यहाँ व्यंग्य करुणा से उपजा है। जब वे किसी विसंगति पर प्रहार करते हैं, तो पाठक को हँसी तो आती है, लेकिन वह हँसी अंततः एक गहरी बेचैनी में बदल जाती है। यही एक महान रचनाकार की पहचान है कि वह आपको अपनी हँसी पर शर्मिंदा होने के लिए मजबूर कर दे।
रागदरबारी की समाजशास्त्रीय समीक्षा : एक खोखले होते लोकतंत्र का दस्तावेज़
सन् 1968 में प्रकाशित 'रागदरबारी' आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी पाँच दशक पहले थी। इसका कारण यह है कि यह केवल एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के 'संस्थानिक पतन' का समाजशास्त्रीय अध्ययन है।
सत्ता का विकेंद्रीकरण या विकृति का विस्तार?
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो 'शिवपालगंज' भारतीय लोकतंत्र की वह इकाई है जहाँ 'लोक' और 'तंत्र' का मिलन तो होता है, लेकिन जनहित के लिए नहीं, बल्कि निजी स्वार्थों के पोषण के लिए। वैद्य जी का चरित्र सत्ता के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है जो नैतिकता की चादर ओढ़कर अनैतिकता का नंगा नाच नाचता है। वह धर्म, राजनीति और शिक्षा तीनों को अपनी मुट्ठी में रखते हैं। यह दर्शाता है कि ग्रामीण समाज में सत्ता आज भी 'हित' पर नहीं, बल्कि 'दबदबे' (Dominance) पर आधारित है।
शिक्षा व्यवस्था का ढांचागत बिखराव
छंगामल इंटर कॉलेज मात्र एक स्कूल नहीं, बल्कि हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है। शुक्ल जी दिखाते हैं कि शिक्षा संस्थान अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि राजनीति के अखाड़े और भ्रष्टाचार की नर्सरी बन चुके हैं। जब खन्ना मास्टर और मालवीय जैसे लोग व्यवस्था के चक्के में पिसते हैं, तो समाजशास्त्रीय रूप से यह 'बौद्धिक पतन' का संकेत है।
न्याय और पुलिस : रक्षक ही भक्षक
रागदरबारी में न्याय की अवधारणा अत्यंत हास्यास्पद है। लंगड़ का मामला हो या पुलिस द्वारा मुकदमों की हेराफेरी, यह समाज के उस तबके की बेबसी को दर्शाता है जिसे 'न्याय' शब्द से ही डर लगता है। पुलिस का चरित्र यहाँ दमनकारी शक्ति के रूप में उभरा है, जो सत्ता के 'दरबारियों' की सेवा में रत है।
समकालीनता : क्या हम आज भी शिवपालगंज में जी रहे हैं?
आज के दौर में जब हम 'स्मार्ट सिटी' और 'डिजिटल इंडिया' की बात करते हैं, तब 'रागदरबारी' का शिवपालगंज और भी डरावना लगने लगता है। आज की समकालीनता में 'रागदरबारी' के सूत्र निम्नलिखित बिंदुओं में देखे जा सकते हैं:
संस्थानों का क्षरण : आज भी स्वायत्त संस्थानों पर राजनीतिक हस्तक्षेप वैसा ही है जैसा वैद्य जी के समय में था। 'शिवपालगंज' अब केवल गाँव नहीं रहा, वह हमारे शहरों और महानगरों के सरकारी दफ्तरों तक फैल चुका है।
अवसरवादिता : रंगनाथ, जो शहर से शोध करने आया है, वह आधुनिकता और नैतिकता का प्रतीक है। लेकिन अंत में उसकी हार और पलायन यह सिद्ध करता है कि आज का 'बौद्धिक' वर्ग या तो व्यवस्था के सामने घुटने टेक चुका है या फिर चुपचाप तटस्थ होकर भाग खड़ा होता है।
मीडिया और सूचना : शुक्ल जी ने जिस तरह से सूचनाओं के तोड़ने-मरोड़ने का चित्रण किया है, वह आज के 'फेक न्यूज' और 'गोदी मीडिया' के दौर में अत्यंत सटीक बैठता है।
वैचारिक प्रवीणता और निष्कर्ष
'रागदरबारी' केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय समाज का वह 'डायग्नोस्टिक रिपोर्ट' है जो हमें बताती है कि हमारी बीमारियाँ कितनी पुरानी और गहरी हैं। श्रीलाल शुक्ल ने अपनी प्रवाहमय भाषा और मर्मभेदी दृष्टि से उस 'राग' को पकड़ा है जिसे सत्ता के गलियारों में बड़ी बेशर्मी से गाया जाता है।
उनकी जयंती मनाना तभी सार्थक है जब हम शिवपालगंज की उन दीवारों को ढहाने का साहस जुटा सकें, जिन्हें वैद्य जी जैसे पात्रों ने खड़ा किया है। शुक्ल जी का साहित्य हमें सचेत करता है कि यदि लोकतंत्र में 'लोक' निष्क्रिय हो जाए, तो 'तंत्र' केवल 'दरबारी' बनकर रह जाता है।
श्रीलाल शुक्ल की कीर्ति का मुख्य आधार उनके 9 उपन्यास, 9 व्यंग्य संग्रह, 4 कहानी संग्रह और आलोचनात्मक विनिबंध हैं। उनका साहित्य आज भी शोधार्थियों और सामान्य पाठकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है।
नीचे श्रीलाल शुक्ल जी का बृहद रचना संसार
श्रीलाल शुक्ल जी को उनकी जयंती पर सादर नमन।
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