संपादकीय : साहित्यिक शुचिता की मीमांसा और 'दिनकर' के नाम पर "ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं" के छद्म प्रसार का सत्य

प्रिय पाठकों, 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' अपने आदर्श 'सर्वेषां हितम् एव साहित्यम्' (सबका हित ही साहित्य है) के प्रति समर्पित रहते हुए, साहित्यिक शुचिता बनाम वायरल संस्कृति का मूल्यांकन व भ्रामक तथ्यों का खंडन करने और सत्य को स्थापित करने के लिए  एक संपादकीय विश्लेषण  'प्रकाश-स्तंभ' काॅलम में कर रही है।

अंकुर आनंद (बाएं) राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर (दाएं)

डिजिटल युग में खंडित होती साहित्यिक मर्यादा

भूमिका :

हिंदी साहित्य के आकाश में सूर्य के समान दैदीप्यमान राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की ओजस्वी वाणी और उनके शब्द आज भी करोड़ों भारतीयों की चेतना को जगाते हैं। किंतु, पिछले कुछ वर्षों से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर एक विचित्र और चिंताजनक प्रवृत्ति देखी जा रही है समकालीन कवियों की रचनाओं को दिनकर जी के नाम से वायरल करना। इसका सबसे ताज़ा और ज्वलंत उदाहरण है कविता: "ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं"। वह न केवल साहित्यिक चोरी है, बल्कि हिंदी साहित्य के सूर्य 'दिनकर' के गौरव के साथ भी एक बड़ा खिलवाड़ है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' यह स्पष्ट करती है कि यह कविता अंकुर आनंद (रोहतक, हरियाणा) की मौलिक रचना है, जो उनके संग्रह 'कलम जब ठान लेती है' में संकलित है। आज का समय 'सूचना विस्फोट' का समय है, जहाँ सत्य और असत्य के बीच की रेखा अत्यंत धुंधली हो गई है।

जब हम साहित्य की बात करते हैं, तो रचनाकार की 'थाती' (विरासत) ही उसकी पहचान होती है। आइए, काव्य-शास्त्रीय मानकों, भाव पक्ष और कला पक्ष के आधार पर इसका विश्लेषण करें और समझें कि यह रचना दिनकर की शैली से पूर्णतः भिन्न क्यों है ?

1. भाव पक्ष का विश्लेषण: दिनकर बनाम समकालीन परिवेश

दिनकर की भाव-भूमि:
रामधारी सिंह 'दिनकर' राष्ट्रीय चेतना और उर्वरशी, रेणुका, हुंकार जैसी ओजस्वी कृतियों के कवि हैं। उनकी रचनाओं में यदि नववर्ष या संस्कृति का विरोध होता, तो वह केवल 'रीत' या 'व्यवहार' तक सीमित नहीं रहता। दिनकर जब परंपरा की बात करते हैं, तो उसमें ऐतिहासिक दर्शन और उपनिषदों की गहराई होती है।

प्रस्तुत कविता का भाव :

"ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं" का मुख्य भाव प्रतिक्रियावादी है। इसमें अँग्रेजी कैलेंडर (1 जनवरी) के प्रति एक तात्कालिक विरोध और भारतीय विक्रम संवत (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई है। इसमें प्रकृति के 'ठिठुरने' और 'कोहरे' को नकारात्मक मानकर वसंत की प्रतीक्षा की गई है।

भिन्नता: दिनकर ने 'कुरुक्षेत्र' या 'रश्मिरथी' में प्रकृति का चित्रण किया है, तो वह मनुष्य के संघर्ष और पुरुषार्थ का प्रतीक बनकर आई है। वे ठंड या कोहरे के कारण किसी समय का तिरस्कार करने वाले 'निषेधात्मक' कवि नहीं, बल्कि 'विधायक' कवि थे।

2. कला पक्ष और शिल्पगत भिन्नता

यही वह बिंदु है जहाँ साहित्य के मर्मज्ञ तुरंत पहचान लेते हैं कि यह रचना दिनकर की नहीं हो सकती।

क. शब्द-चयन (Vocabulary) :

दिनकर की भाषा तत्सम प्रधान, ओजपूर्ण और गरिमामयी होती है। प्रस्तुत कविता में अक्ल, इंतज़ार, नकल, ढंग जैसे उर्दू और आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग हुआ है। दिनकर ने अपनी कविताओं में जनभाषा का प्रयोग किया है, लेकिन उनके शब्दों के चयन में एक विशिष्ट 'अनुशासन' और 'सांस्कृतिक गौरव' झलकता है।

ख. छंद और लय (Meter and Rhythm) :

दिनकर के शिल्प में एक अदृश्य संगीत होता है। यदि आप 'रश्मिरथी' की पंक्तियाँ पढ़ें:

 "वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,"

यहाँ गति और यति का जो सामंजस्य है, वह इस वायरल कविता में अनुपस्थित है। अंकुर आनंद जी ने स्वयं स्वीकार किया है कि इस कविता में कई स्थानों पर लयबद्धता टूटती है (जैसे: "क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही" और "आयी है अभी बहार नहीं")। दिनकर जैसे सिद्धहस्त कवि के यहाँ ऐसी शिल्पगत शिथिलता असंभव है।

ग. अलंकार और बिम्ब विधान :

दिनकर 'बिम्बों' के सम्राट थे। वे जब 'हुंकार' भरते थे, तो पहाड़ डोलने लगते थे। प्रस्तुत कविता के बिम्ब (जैसे- प्रकृति दुल्हन का रूप धार, कोहरे का पहरा) बहुत ही सरल और प्राथमिक स्तर के हैं, जो किशोरावस्था के कवियों या नव-लेखकों में अधिक पाए जाते हैं।

3. भेड़चाल और विद्वत वर्ग का आलस्य 

मीमांसा का यह विश्लेषण इस कड़वे सत्य को उजागर करता है कि आज के 'चोटी के साहित्यकार' और 'प्रोफेसर' भी बिना शोध किए 'फॉरवर्ड' संस्कृति का हिस्सा बन गए हैं।

साहित्यिक शुचिता की बलि : 

किसी भी रचना को साझा करने से पहले उसकी शैली का मिलान करना एक अनिवार्य शैक्षणिक धर्म है। यदि कोई दिनकर का पाठक है, तो वह मात्र पहली चार पंक्तियाँ पढ़कर समझ जाएगा कि यह दिनकर की कलम नहीं है।

प्रचार का मोह : अपनी विचारधारा की पुष्टि के लिए महान कवियों के कंधों का सहारा लेना एक बौद्धिक बेईमानी है।

4. वास्तविक रचनाकार : अंकुर 'आनंद' का न्याय

अंकुर आनंद ने यह कविता दिसंबर 2012 में उधमपुर में अपनी पोस्टिंग के दौरान लिखी थी। उन्होंने अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए जिस ईमानदारी से यह बताया कि यह रचना उनकी है, वह सराहनीय है।
 
रचना का संदर्भ : यह कविता एक हिमाचल के कर्मचारी की सेवानिवृत्ति पर पढ़ी गई थी। यह एक जन-संवाद की कविता है, 'महाकाव्य' की श्रेणी की नहीं।

बौद्धिक संपदा का हनन : 2017 के बाद इसे दिनकर के नाम से जोड़कर वायरल करना अंकुर आनंद के मौलिक अधिकार का हनन है। जब एक रचनाकार की कृति को उससे छीनकर किसी 'विशाल व्यक्तित्व' को दे दिया जाता है, तो उस छोटे रचनाकार का अस्तित्व मिट जाता है।

5. मीमांसा की उद्घोषणा और निष्कर्ष

वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह स्पष्ट मत है कि :
साहित्यिक शुचिता सर्वोपरि है। किसी भी रचना को उसके वास्तविक जनक के नाम से ही पहचाना जाना चाहिए।

दिनकर की थाती का संरक्षण हमारा दायित्व है। उनके नाम पर स्तरहीन या भिन्न शैली की रचनाएं फैलाना उनकी विरासत को दूषित करना है।
पाठक और रचनाकार का संवाद तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि सुनी-सुनाई बातों पर।
हम इस लेख के माध्यम से समस्त हिंदी जगत से आह्वान करते हैं कि वे इस 'भेड़चाल' का त्याग करें। "ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं" अंकुर आनंद की सुंदर भावना है, इसे उनके नाम से ही सम्मान दें। दिनकर जी के विराट व्यक्तित्व को मिथ्या प्रचार का माध्यम न बनने दें।
'मीमांसा' तथ्यों की इस मशाल को जलाए रखेगी, ताकि हिंदी साहित्य का प्रांगण भ्रामक सूचनाओं के अंधेरे से मुक्त हो सके।


© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा'


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