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राम की शक्ति पूजा : एक दृष्टि। वेब पत्रिका 'मीमांसा'।

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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित 'राम की शक्ति पूजा' (1936) आधुनिक हिंदी काव्य (छायावाद) की एक ऐसी कालजयी रचना है, जो न केवल निराला के काव्य-उत्कर्ष का शिखर है, बल्कि यह भारतीय साहित्य की महानतम कृतियों में से एक गिनी जाती है। यह कविता मात्र एक पौराणिक आख्यान नहीं है, बल्कि मानव के आंतरिक संघर्ष, हताशा और अंततः संकल्प की विजय का महाकाव्यात्मक दस्तावेज़ है। राम की शक्ति पूजा: एक युगांतकारी कृति 'राम की शक्ति पूजा' का कथानक कृत्तिवास रामायण पर आधारित है, किंतु निराला ने इसमें अपनी मौलिक दृष्टि और समकालीन जीवन की छटपटाहट को पिरो दिया है। यह कविता उस समय लिखी गई जब भारत पराधीन था और निराशा के बादल गहरे थे। निराला ने राम के माध्यम से एक ऐसे नायक को गढ़ा है, जो 'ईश्वर' होने के बावजूद 'मानव' की तरह टूटता है, संशय करता है और फिर अपनी शक्ति को संचित कर विजय प्राप्त करता है।   महाकाव्यात्मक उदात्तता और शिल्प यद्यपि यह एक लंबी कविता (Long Poem) है, लेकिन इसके तेवर महाकाव्यात्मक हैं। कविता की शुरुआत ही अत्यंत भव्य और ओजपूर्ण है: "रवि ह...

दादी

सुबह चार साढ़े चार बजे हीं मैं उठ जाया करता था और जल्दी से भाग कर दरवाज़े पर से हीं अखबार वाले की बाट जोहता। सड़क पर भागने वाले हर साइकिल को गौर से देखता, कहीं उसके कैरियर या झोले में अखबार का पुलिंदा है कि नहीं। नहीं होता तो मन निराश हो जाता और यदि कोई अखबार लाता दिखता तो उस दयामयी के आगे अपनी नन्ही-सी हथेली फैला देता। वह अपनी आंचल की गांठ में से दो रूपए निकाल कर अपने वयोवृद्ध हाथों से मुझे सौंप दिया करती। मैं खुशी-खुशी अखबार लेकर उसके आकर्षक चित्र निहारा करता। खेल वाले पेज पर से अपने पसंदीदा क्रिकेटरों को ढूंढता। रोजाना का यही मेरा कार्यक्रम था। परंतु किसी दिन मैं सवेरा चढ़ते तक सोया रहता, तो अखबार वालों से भेंट न होती। उस दिन मन खिन्न-सा रहता। मैं भुनभुनाता हुआ उसी दयामयी के पास जाता। सामने दरवाजे के बाहर बरामदे पर एक चौकी लगी रहती थी; वही उसका स्थायी पता था। मैंने कहा, "हा दादी, आज पेपर वाला नहीं आया।" वो कहती, "अभी त नाय ऐलो छौ नुनू। हम्मऽ कहां देखलऽ छियौ।" (अभी तो नहीं आया है, मैंने भी कहां देखा है।) मैं निराश हो जाता। तब मेरे मुरझाए चेहरे को देखकर वह प्यार से...

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' कृत राम की शक्ति पूजा। विशेष व्याख्या। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। अमन कुमार होली।

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सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" » राम की शक्ति पूजा » महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी की कालजयी रचना 'राम की शक्ति पूजा' अपनी तत्सम प्रधान शब्दावली, ओजपूर्ण शैली और मनोवैज्ञानिक गहराई के लिए विश्व साहित्य में अद्वितीय है। बांग्ला के कृतिवास रामायण पर आधारित हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों और सुधी पाठकों के लिए यह कविता जितनी प्रेरणादायी है, अपनी क्लिष्टता के कारण उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी।  आज के डिजिटल युग में जहाँ यूट्यूब और इंटरनेट पर सूचनाओं की बाढ़ है, वहाँ 'राम की शक्ति पूजा' की एक क्रमबद्ध, स्पष्ट और परीक्षा-उपयोगी व्याख्या का अभाव खलता है। वेब पत्रिका 'मीमांसा'  के माध्यम से मेरा यह प्रयास है कि   कठिन तत्सम शब्दों के भाव को सुरक्षित रखते हुए उन्हें सुबोध बनाया जाए। परीक्षाओं और गहन अध्ययन की दृष्टि से एक ठोस आधार प्रदान किया। एक ही मंच पर संपूर्ण व्याख्या का ऐसा संकलन हो जो पाठक को भटकने न दे। पाठकों और साहित्य के विद्यार्थियों के लिए संपूर्ण काव्य  पंक्तियों का सरल, प्रवाहमय और भावानुवाद नीचे प्रस्तुत है : राम की शक...

गंग नीति 1

बाल से ख्याल बड़े से विरोध अगोचर नार से ना हँसिये। अन्न से लाज अगिन्न से ज़ोर अजानत नीर में ना धँसिये। बैल को नाथ घोड़े को लगाम मतंग को अंकुश में कसिये। गंग कहै सुन शाह अकब्बर कूर तें दूर सदा बसिये ॥ यह पंक्तियाँ रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि गंग द्वारा रचित हैं, जो मुगल सम्राट अकबर के दरबारी कवि थे। इन पंक्तियों में कवि ने जीवन जीने की व्यवहारिक समझ और सावधानी बरतने की सलाह दी है। यहाँ इसका सरल हिंदी अर्थ दिया गया है: काव्य का अर्थ 1. बाल से ख्याल बड़े से विरोध अगोचर नार से ना हँसिये।  * बाल से ख्याल: बच्चों की बातों को दिल से नहीं लगाना चाहिए या उनके साथ ज्यादा चालाकी नहीं करनी चाहिए।  * बड़े से विरोध: अपने से बड़ों या शक्तिशाली व्यक्तियों से व्यर्थ में दुश्मनी या विरोध नहीं मोल लेना चाहिए।  * अगोचर नार: ऐसी स्त्री जिसे आप जानते न हों या जिसका स्वभाव अज्ञात (अगोचर) हो, उसके साथ हँसी-मजाक नहीं करना चाहिए। 2. अन्न से लाज अगिन्न से ज़ोर अजानत नीर में ना धँसिये।  * अन्न से लाज: भोजन करने में कभी शर्म नहीं करनी चाहिए (क्योंकि यह जीवन का आधार है)।  * अगिन्न से ज़ोर: आग के...

समाजीकरण : जैविक अस्तित्व से सामाजिक व्यक्तित्व तक की यात्रा। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। ऑंचल कुमारी।

प्रस्तावना मनुष्य को प्रायः “सामाजिक प्राणी” कहा जाता है, परंतु यह सामाजिकता उसे जन्म के साथ स्वतः प्राप्त नहीं होती। जन्म के समय बालक न तो सामाजिक नियमों से परिचित होता है, न नैतिक मूल्यों से, न ही सांस्कृतिक परंपराओं से। वह केवल संभावनाओं से युक्त एक जैविक इकाई होता है। परिवार, पड़ोस, विद्यालय और व्यापक समाज के संपर्क में रहकर वह धीरे-धीरे भाषा, व्यवहार, रीति-रिवाज, मान्यताएँ, आदर्श और सामाजिक भूमिकाएँ सीखता है। यही निरंतर सीखने और आत्मसात करने की प्रक्रिया समाजीकरण (Socialization) कहलाती है। समाजीकरण केवल व्यवहार का बाहरी अनुकरण नहीं, बल्कि व्यक्ति के ‘स्व’ (Self) के निर्माण की प्रक्रिया है। यह व्यक्ति को समाज का सक्रिय, उत्तरदायी और समन्वित सदस्य बनाती है। यदि समाजीकरण न हो, तो मनुष्य में सामाजिक चेतना, सहानुभूति, नैतिकता और उत्तरदायित्व का विकास संभव नहीं हो सकता। इस दृष्टि से समाजीकरण मानव सभ्यता की निरंतरता का मूल आधार है। समाजीकरण का अर्थ एवं परिभाषा समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति समाज की संस्कृति, मूल्य, मानदंड और व्यवहार-पद्धतियों को आत्मसात करता है त...

वृद्धि एवं विकास : मानव व्यक्तित्व के निर्माण की समग्र प्रक्रिया। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। ऑंंचल कुमारी।

प्रस्तावना मानव जीवन की यात्रा एक सूक्ष्म कोशिका से प्रारम्भ होकर एक पूर्ण विकसित व्यक्तित्व तक पहुँचती है। यह यात्रा केवल शरीर के आकार में वृद्धि की कहानी नहीं है, बल्कि यह बहुआयामी परिवर्तन की एक जटिल, निरंतर और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। मनोविज्ञान की दृष्टि से इन परिवर्तनों को दो मुख्य अवधारणाओं वृद्धि (Growth) और विकास (Development) के अंतर्गत समझा जाता है। सामान्य बोलचाल में इन दोनों शब्दों का प्रयोग प्रायः समानार्थी रूप में किया जाता है, परंतु शैक्षिक और मनोवैज्ञानिक संदर्भ में इनका पृथक्‌ अर्थ और महत्त्व है। वृद्धि जहाँ शरीर की लंबाई, भार, आकार और संरचना में होने वाले मात्रात्मक परिवर्तनों को सूचित करती है, वहीं विकास एक व्यापक और गुणात्मक प्रक्रिया है, जिसमें शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक तथा नैतिक आयामों का समावेश होता है। इस प्रकार वृद्धि विकास का एक अंग है, जबकि विकास संपूर्ण व्यक्तित्व के परिष्कार और परिपक्वता की दिशा में अग्रसर प्रक्रिया है। वृद्धि का अर्थ और स्वरूप वृद्धि मूलतः जैविक परिवर्तन है। यह शरीर के विभिन्न अंगों के आकार, लंबाई, भार तथा संरचनात्मक परिवर्त...

संज्ञानात्मक विकास : ज्ञान-निर्माण की सक्रिय और सृजनात्मक प्रक्रिया। ऑंचल कुमारी।

प्रस्तावना मानव जीवन की समस्त प्रगति का मूल उसकी बौद्धिक क्षमता में निहित है। मनुष्य केवल जैविक अस्तित्व नहीं है; वह विचारशील, विश्लेषणात्मक और सृजनात्मक प्राणी है। बालक जन्म के समय एक संभावनाओं से भरा व्यक्तित्व होता है, जो अनुभव, भाषा, सामाजिक अंतःक्रिया और परिपक्वता के माध्यम से धीरे-धीरे ज्ञान का निर्माण करता है। इसी क्रमिक बौद्धिक परिपक्वता को संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) कहा जाता है। संज्ञानात्मक विकास केवल तथ्यों का संचय नहीं, बल्कि समझने, सोचने, तर्क करने, स्मरण रखने, कल्पना करने और समस्या-समाधान की क्षमता का विकास है। शिक्षक-प्रशिक्षण (B.Ed./D.El.Ed.) तथा मनोविज्ञान के विद्यार्थियों के लिए यह विषय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि शिक्षण की संपूर्ण प्रक्रिया बालक की संज्ञानात्मक अवस्था पर आधारित होती है। यदि शिक्षक बालक की मानसिक संरचना, उसकी सोच की सीमाओं और संभावनाओं को समझे बिना शिक्षण करेगा, तो शिक्षा प्रभावी नहीं हो सकेगी। संज्ञान का अर्थ एवं स्वरूप ‘संज्ञान’ (Cognition) शब्द लैटिन भाषा के Cognoscere से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘जानना’, ‘समझना’ या ‘पहचानना’।...