संज्ञानात्मक विकास : ज्ञान-निर्माण की सक्रिय और सृजनात्मक प्रक्रिया। ऑंचल कुमारी।



प्रस्तावना

मानव जीवन की समस्त प्रगति का मूल उसकी बौद्धिक क्षमता में निहित है। मनुष्य केवल जैविक अस्तित्व नहीं है; वह विचारशील, विश्लेषणात्मक और सृजनात्मक प्राणी है। बालक जन्म के समय एक संभावनाओं से भरा व्यक्तित्व होता है, जो अनुभव, भाषा, सामाजिक अंतःक्रिया और परिपक्वता के माध्यम से धीरे-धीरे ज्ञान का निर्माण करता है। इसी क्रमिक बौद्धिक परिपक्वता को संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) कहा जाता है।

संज्ञानात्मक विकास केवल तथ्यों का संचय नहीं, बल्कि समझने, सोचने, तर्क करने, स्मरण रखने, कल्पना करने और समस्या-समाधान की क्षमता का विकास है। शिक्षक-प्रशिक्षण (B.Ed./D.El.Ed.) तथा मनोविज्ञान के विद्यार्थियों के लिए यह विषय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि शिक्षण की संपूर्ण प्रक्रिया बालक की संज्ञानात्मक अवस्था पर आधारित होती है। यदि शिक्षक बालक की मानसिक संरचना, उसकी सोच की सीमाओं और संभावनाओं को समझे बिना शिक्षण करेगा, तो शिक्षा प्रभावी नहीं हो सकेगी।

संज्ञान का अर्थ एवं स्वरूप

‘संज्ञान’ (Cognition) शब्द लैटिन भाषा के Cognoscere से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘जानना’, ‘समझना’ या ‘पहचानना’। संज्ञान उन समस्त मानसिक प्रक्रियाओं का समुच्चय है, जिनके माध्यम से व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है, उसका संगठन करता है और उपयुक्त परिस्थिति में उसका उपयोग करता है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट स्टर्नबर्ग के अनुसार, “संज्ञान वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम ज्ञान अर्जित करते हैं, उसका भंडारण करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग करते हैं।”

संज्ञान में निम्नलिखित प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं—

प्रत्यक्षीकरण (Perception)
ध्यान (Attention)
स्मृति (Memory)
कल्पना (Imagination)
चिंतन एवं तर्क (Thinking and Reasoning)
समस्या-समाधान (Problem Solving)
निर्णय-निर्माण (Decision Making)

इस प्रकार संज्ञानात्मक विकास उस मानसिक संरचना के विस्तार और परिष्कार का द्योतक है, जिसके माध्यम से बालक अपने वातावरण को समझता और उसके साथ अनुकूलन करता है।

संज्ञानात्मक विकास के निर्धारक तत्व

संज्ञानात्मक विकास एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जो कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से आगे बढ़ती है।

1. परिपक्वता (Maturation)

मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र का जैविक विकास संज्ञानात्मक क्षमताओं की आधारशिला है। जब तक तंत्रिका तंत्र परिपक्व नहीं होता, तब तक उच्च स्तरीय चिंतन संभव नहीं है।

2. अनुभव (Experience)

बालक अपने परिवेश के साथ अंतःक्रिया करते हुए सीखता है। वस्तुओं को छूना, देखना, सुनना और प्रयोग करना उसके ज्ञान का आधार बनता है।

3. सामाजिक अंतःक्रिया (Social Interaction)

परिवार, विद्यालय और समाज के माध्यम से बालक भाषा, मान्यताओं और ज्ञान की संरचनाओं को आत्मसात करता है।

4. भाषा (Language)

भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि चिंतन का उपकरण है। भाषा के विकास के साथ बालक की सोच भी परिष्कृत होती है।


जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत

संज्ञानात्मक विकास की चर्चा जीन पियाजे के बिना अधूरी है। उन्हें विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है। पियाजे के अनुसार बालक निष्क्रिय ग्रहणकर्ता नहीं, बल्कि “नन्हा वैज्ञानिक” है, जो सक्रिय रूप से अपने ज्ञान का निर्माण करता है।

पियाजे के मुख्य संप्रत्यय

1. स्कीमा (Schema)

स्कीमा मानसिक संरचनाएँ हैं, जिनके माध्यम से बालक अपने अनुभवों को व्यवस्थित करता है।

2. अनुकूलन (Adaptation)

वातावरण के साथ तालमेल बैठाने की प्रक्रिया को अनुकूलन कहा जाता है। इसके दो भाग हैं—

आत्मसातीकरण (Assimilation) – नए अनुभव को पुरानी संरचना में समाहित करना।

समायोजन (Accommodation) – नए अनुभव के कारण पुरानी संरचना में परिवर्तन करना।

3. साम्यधारण (Equilibration)

आत्मसातीकरण और समायोजन के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया।

पियाजे की चार अवस्थाएँ

1. संवेदी-पेशीय अवस्था (0–2 वर्ष)

इस अवस्था में शिशु इंद्रियों और शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से सीखता है। वस्तु स्थायित्व (Object Permanence) का विकास इसी चरण में होता है।

2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2–7 वर्ष)

बालक प्रतीकात्मक खेल खेलने लगता है। इस अवस्था की विशेषताएँ हैं—

आत्मकेंद्रिता (Egocentrism)

जीववाद (Animism)

एकांगी चिंतन (Centration)


3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7–11 वर्ष)

बालक मूर्त वस्तुओं पर तार्किक चिंतन करने लगता है। संरक्षण (Conservation) की समझ विकसित होती है।

4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष से आगे)

अमूर्त चिंतन, परिकल्पनात्मक तर्क और वैज्ञानिक सोच का विकास होता है।

पियाजे का सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक अवस्था की अपनी सीमाएँ और संभावनाएँ होती हैं, अतः शिक्षण उसी के अनुरूप होना चाहिए।

जेरोम ब्रूनर का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत

जेरोम ब्रूनर ने पियाजे के विचारों को आगे बढ़ाते हुए संज्ञानात्मक विकास को ‘प्रतिनिधित्व’ (Representation) की दृष्टि से समझाया। उनके अनुसार ज्ञान तीन प्रकार से प्रस्तुत होता है—

1. सक्रियता अवस्था (Enactive Stage)

बालक क्रियाओं और शारीरिक अनुभवों से सीखता है।

2. दृश्यात्मक अवस्था (Iconic Stage)

बालक चित्रों और मानसिक प्रतिबिंबों के माध्यम से जानकारी ग्रहण करता है।

3. सांकेतिक अवस्था (Symbolic Stage)

भाषा, संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से अमूर्त चिंतन का विकास।

ब्रूनर ने “खोजपूर्ण अधिगम” (Discovery Learning) का समर्थन किया। उनके अनुसार शिक्षक को मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए, जिससे बालक स्वयं ज्ञान की खोज करे।

पियाजे और ब्रूनर का तुलनात्मक अवलोकन

पियाजे ने विकास को आयु-आधारित अवस्थाओं में विभाजित किया; ब्रूनर ने प्रतिनिधित्व के रूपों पर बल दिया।

पियाजे जैविक परिपक्वता को प्रमुख मानते हैं; ब्रूनर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों को भी समान महत्व देते हैं।

दोनों ही बालक को सक्रिय ज्ञान-निर्माता मानते हैं।


संज्ञानात्मक विकास और भाषा

भाषा विचारों का माध्यम है। भाषा के विकास से स्मृति, कल्पना और तर्क की क्षमता सुदृढ़ होती है। शब्दों के माध्यम से बालक अपने अनुभवों को संरचित करता है। अतः कक्षा में संवादात्मक वातावरण आवश्यक है।


संज्ञानात्मक विकास और रचनात्मकता

रचनात्मकता संज्ञानात्मक विकास का उच्चतम स्तर है। जब बालक नए विचार उत्पन्न करता है, समस्याओं के अनोखे समाधान प्रस्तुत करता है और कल्पनाशील दृष्टिकोण अपनाता है, तब उसकी संज्ञानात्मक क्षमता परिपक्व मानी जाती है।


शैक्षिक उपयोगिता

1. बाल-केंद्रित शिक्षा

शिक्षण बालक की मानसिक अवस्था के अनुरूप होना चाहिए।

2. खोजपूर्ण अधिगम

शिक्षक प्रश्न पूछकर, प्रयोग करवाकर और चर्चा कराकर बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित करे।

3. मूर्त से अमूर्त की ओर

प्राथमिक स्तर पर ठोस सामग्री का प्रयोग; उच्च स्तर पर अमूर्त अवधारणाओं की चर्चा।

4. क्रमबद्धता

सरल से जटिल, ज्ञात से अज्ञात की ओर शिक्षण।

5. समस्या-आधारित अधिगम

वास्तविक जीवन की समस्याओं को कक्षा में प्रस्तुत कर बालकों की तार्किक क्षमता विकसित करना।


समकालीन परिप्रेक्ष्य

आज के डिजिटल युग में बच्चों की संज्ञानात्मक संरचना पर तकनीक का गहरा प्रभाव पड़ रहा है। मोबाइल, इंटरनेट और आभासी संसार नई संभावनाएँ भी प्रदान करते हैं और चुनौतियाँ भी। सूचना की अधिकता के बीच आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) की आवश्यकता बढ़ गई है।

निष्कर्ष

संज्ञानात्मक विकास मानव व्यक्तित्व के निर्माण की आधारभूत प्रक्रिया है। यह स्पष्ट करता है कि बालक का मस्तिष्क निष्क्रिय पात्र नहीं, बल्कि सक्रिय सृजनकर्ता है। जीन पियाजे ने जहाँ विकास की आंतरिक संरचना और जैविक परिपक्वता पर बल दिया, वहीं जेरोम ब्रूनर ने सामाजिक अंतःक्रिया और प्रतिनिधित्व के रूपों को महत्त्व दिया।

शिक्षक-प्रशिक्षण के संदर्भ में यह अनिवार्य है कि भावी शिक्षक बालकों की संज्ञानात्मक अवस्थाओं को समझें और उसी के अनुरूप शिक्षण-रणनीतियाँ अपनाएँ। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि चिंतनशील, तार्किक और सृजनात्मक नागरिक तैयार करना है।

अतः संज्ञानात्मक विकास का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि ज्ञान थोपा नहीं जाता, बल्कि निर्मित किया जाता है—और इस निर्माण की प्रक्रिया में बालक स्वयं सबसे सक्रिय भागीदार होता है।

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