दादी
सुबह चार साढ़े चार बजे हीं मैं उठ जाया करता था और जल्दी से भाग कर दरवाज़े पर से हीं अखबार वाले की बाट जोहता। सड़क पर भागने वाले हर साइकिल को गौर से देखता, कहीं उसके कैरियर या झोले में अखबार का पुलिंदा है कि नहीं।
नहीं होता तो मन निराश हो जाता और यदि कोई अखबार लाता दिखता तो उस दयामयी के आगे अपनी नन्ही-सी हथेली फैला देता। वह अपनी आंचल की गांठ में से दो रूपए निकाल कर अपने वयोवृद्ध हाथों से मुझे सौंप दिया करती। मैं खुशी-खुशी अखबार लेकर उसके आकर्षक चित्र निहारा करता। खेल वाले पेज पर से अपने पसंदीदा क्रिकेटरों को ढूंढता। रोजाना का यही मेरा कार्यक्रम था।
परंतु किसी दिन मैं सवेरा चढ़ते तक सोया रहता, तो अखबार वालों से भेंट न होती। उस दिन मन खिन्न-सा रहता। मैं भुनभुनाता हुआ उसी दयामयी के पास जाता। सामने दरवाजे के बाहर बरामदे पर एक चौकी लगी रहती थी; वही उसका स्थायी पता था।
मैंने कहा, "हा दादी, आज पेपर वाला नहीं आया।"
वो कहती, "अभी त नाय ऐलो छौ नुनू। हम्मऽ कहां देखलऽ छियौ।" (अभी तो नहीं आया है, मैंने भी कहां देखा है।)
मैं निराश हो जाता। तब मेरे मुरझाए चेहरे को देखकर वह प्यार से मेरे बालों को सहलाती और अपने पास रखे बिस्कुटों को दे देती। मैं इस अचानक उपहार से खुश हो जाता। शायद उन्हें मेरे हर ख़ुशी और गम को पढ़ने की विचित्र शक्ति थी।
मैं उसके वृद्ध जीवन में उल्लास का एकमात्र कारण था, ऐसा मैं दावे के साथ नहीं कह सकता, लेकिन मेरी उपस्थिति उसके वृद्ध आंखों की ज्योति बढ़ा देती।
स्कूल में जब मेरा नामांकन हुआ, तो मैं सुबह नौ बजे से तीन बजे दोपहर तक बंध जाता। उससे हिलने-मिलने वाला कोई नहीं रहा। लगभग दो बजे कड़कती धूप में हीं वो मेरे स्कूल के ग्राउंड में चबूतरे पर जाकर बैठ जाती और मेरी छुट्टी होने तथा निकलने का इंतजार करती। हालांकि तब मुझे स्कूल से लिवा लाने और पहुंचाने का जिम्मा कभी वो और मम्मी, कभी-कभी पापा किया करते थे।
और जब मैं अपने से आने-जाने लगा, तब तो उनकी सेवानिवृत्ति हो गई। मैं जब अपने स्कूल से लौटकर आता, तो वह दूर से ही मेरे आगमन को भांप लेती और "अमन बाबू आ गया, अमन बाबू आ गया..." — इस क्रम को वह बार-बार दुहराती। मानो मुझे देखकर वह प्रत्येक पल और जी जाती थी। मुझे यह आश्चर्यजनक लगता, यद्यपि मैं तब लड़कपन में था।
हां, मुहल्ले भर में यदि कोई नवजात शिशु हौसली चढ़ जाने से रोता, तो उससे निजात दिलाने लोग दादी के पास दूर-दराज से आते।
उनके पास आकर बच्चा आश्चर्यजनक रूप में चुप हो जाता। वह बच्चे के मुंह में अंगुली डालती और राख से हौसली छुड़ा देती। अद्भुत! इस जादुई करतब को देखकर सब दंग रह जाते। इस रूप में वह बच्चों के वैद्य के नाम से प्रसिद्ध हो चुकी थी। यूं तो वह इस काम के लिए कुछ पैसे नहीं लेती, फिर भी लोग अपनी श्रद्धा से दस-पांच दे जाते थे।
मुझे ख्याल है कि दुकान में यदि कोई फल खरीदने आता, तो वह उसे पक्के तोल कर देती थी। बहुत वृद्धा हो जाने के बाद भी उन्हें चश्मा नहीं लगा था, लेकिन वे रूपए का हिसाब लगाने व गिनने में कुशल थीं। कभी कोई ग्राहक कम रूपए देता या वृद्ध होने के कारण ठगने का प्रयास करता, तो तुरंत हीं धोप देती और उचित मूल्य चुकाने के लिए कहती। हां, कभी-कभी यदि कोई हेल-मेल का ग्राहक आ पहुंचा, तो वह मुफ्त में ही ज्यादा दे देती थी और कहतीं, "तुम भी तो हमारे बच्चे हीं हो।"
यह उनकी दानवीरता मां को कभी-कभार खल जाती, हालांकि मां ने कभी व्यक्तिगत में उन्हें कुछ कहा नहीं।
दादी का एक और व्यक्तित्व उन्हें खास बनाता था— वह यह कि वह अच्छे लोगों के लिए बहुत ही नेक और छल-कपट करने वालों के लिए सख्त थी। उनका सिद्धांत अटल था।
पिताजी ने एक बार बताया था कि मेरी दादी की देवरानी जब नयी-नयी गौवना होकर आयी थी, तो घर के रिवाज के अनुसार बड़ी जेठानी के गहने-जेवर, वस्त्र पहनने-ओढ़ने के लिए खास मौकों पर दिए जाते थे। बहुत दिनों तक जब वो सोने का हार उन्हें वापस मांगने पर नहीं मिला, तो फलस्वरूप दादी अत्यंत क्रोधित हुईं। उन्होंने यह क्रोध दबाए रखा। काफ़ी दिन हुए, अचानक एक त्योहार में उन्होंने छोटी देवरानी के गले में वो हार देखा।
उन्होंने उनसे यह कहकर मांगा, "रुक्मिणी, आज मुझे पहनने दो।" फिर उन्होंने गुस्से में आकर सील-पट्टे पर उसे थकुच दिया।
इस संपूर्ण कहानी के लिए शब्द संख्या बताएं
Comments
Post a Comment