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वेब पत्रिका 'मीमांसा' पर अमन कुमार होली की कहानी - "अंतिम कारतूस"

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27 फरवरी 1931... प्रयागराज का अल्फ्रेड पार्क। एक तरफ ब्रिटिश हुकूमत की पूरी फौज और दूसरी तरफ अपनी 'कोल्ट' पिस्तौल थामे खड़ा एक अकेला जांबाज। यह कहानी केवल एक क्रांतिकारी के अंतिम क्षणों की नहीं है, बल्कि यह गाथा है उस अटूट संकल्प की जिसने मौत को भी मुस्कुराकर गले लगा लिया। पढ़िए—'अंतिम कारतूस', जो आज भी भारत की माटी में देशभक्ति की गूँज बनकर जीवित है। प्रयागराज की उस दोपहर का सन्नाटा अचानक बख्तरबंद गाड़ियों के भारी टायरों की रगड़ और इंजनों के शोर से टूट गया। अल्फ्रेड पार्क के लोहे के फाटकों के बाहर धूल का गुबार उठा और ब्रिटिश पुलिस की गाड़ियाॅं चीखती हुई रुकीं। "पोजीशन!" नॉट-बाबर की कड़कती आवाज़ गूँजी। भारी बूटों की 'खट-खट' से पार्क की मिट्टी कांपने लगी। खाकी वर्दी वाले दर्जनों सिपाही अपनी .303 इनफील्ड राइफलों के साथ झाड़ियों और पेड़ों के पीछे तैनात हो गए। सन्नाटे को चीरते हुए राइफलों के 'बोल्ट-एक्शन' की धात्विक आवाज़ आई कड़क-कड़क... धांय! चैंबर में गोली चढ़ी और पहली फायरिंग ने आसमान में उड़ते पक्षियों के झुंड को बदहवास कर दिया। पेड़ों से कौवे...

छायावादी प्रवृत्तियों की समझ।

नमस्ते। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस विशेषांक में आपका हार्दिक स्वागत है। आज हम एक ऐसे विचित्र समय में जी रहे हैं जहाँ जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि उसकी अतिशयता (Information Overload) सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। सूचनाओं के इस अंतहीन जाल में पाठक अक्सर स्वयं को दिशाहीन पाता है। आज प्रेषित की जाने वाली सूचनाएँ केवल 'क्लिक' और 'व्यूज' के गणित तक सिमट गई हैं। उनमें न तो वह रूहानी जुड़ाव है, न ही वह विश्लेषण जो पाठक के अंतर्मन को उद्वेलित कर सके। सूचनाएँ परोसी तो जा रही हैं, लेकिन उनका 'अस्वाद' खो गया है। हालांकि हम हिंदी साहित्य के उस स्वर्ण-युग की देहरी पर  खड़े हैं, जिसने जड़ता को चेतना दी और स्थूलता को सूक्ष्मता के कोमल आवरण से ढंक दिया। हम बात कर रहे हैं छायावाद की। छायावाद केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय मानस की वह अंगड़ाई थी जिसने मध्यकालीन रूढ़ियों को तोड़कर आधुनिकता के नए प्रतिमान गढ़े।मीमांसा' का यह प्रयास है कि पाठक केवल शब्दों को देखे नहीं, बल्कि उन्हें 'महसूस' करे। हम केवल जानकारी के वितरक नहीं, बल्कि विचारों के संवाहक बनना चाहते हैं। ...

बंदी जीवन, राष्ट्रभक्ति और साहित्यिक चेतना के विनायक : सावरकर। पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

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वेब पत्रिका 'मीमांसा' के सम्मानित पाठकों के लिए आज का दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक संकल्प को दोहराने का क्षण है। आज उस प्रखर राष्ट्रभक्त, अदम्य साहसी सेनानी और कालजयी साहित्यकार की पुण्यतिथि है, जिनके विचारों की गूंज आज भी भारतीय मानस को झंकृत करती है; माने तो इतिहास के पन्नों पर कुछ नाम स्याही से नहीं, बल्कि रक्त और तपस्या से लिखे जाते हैं। विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसा ही नाम है, जो स्वाधीनता समर के क्षितिज पर उस दैदीप्यमान नक्षत्र की भांति है, जिसने 'काले पानी' के घनघोर अंधकार में भी राष्ट्रप्रेम की लौ को बुझने नहीं दिया। उनका जीवन एक ऐसी महागाथा है, जहाँ क्रांतिकारी तेवर और कोमल साहित्यिक हृदय का अनूठा संगम मिलता है। सेल्युलर जेल: यातनाओं के बीच सृजन का संगीत अंडमान की वह कोठरी, जहाँ हवाएं भी दीवारों से टकराकर सिसकती थीं, सावरकर के लिए केवल एक कैदखाना नहीं, बल्कि एक तपोभूमि बन गई। जब शरीर को कोल्हू के बैल की तरह जोता जाता था और हाथों में बेड़ियाँ अपनी क्रूरता का संगीत सुनाती थीं, तब सावरकर का मस्तिष्क राष्ट्र के भविष्य का ताना-बाना बुन रहा होता था। ...

भारतेंदु मंडल के दैदीप्यमान नक्षत्र - पंडित राधाचरण गोस्वामी। जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

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साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि वह दर्पण है जिसमें कालखंड की धड़कनें सुनाई देती हैं। 'मीमांसा' की इस विशेष श्रृंखला में आज हमारा सौभाग्य है कि हम उस मनीषी को अपनी भावांजलि अर्पित कर रहे हैं, जिन्होंने ब्रज की पावन रज को अपने माथे पर लगाकर आधुनिक हिंदी साहित्य की आधारशिला रखने में महती भूमिका निभाई। आज हम बात कर रहे हैं पंडित राधाचरण गोस्वामी की। भारतीय साहित्य का वह दौर, जिसे हम 'भारतेंदु युग' के नाम से जानते हैं, वास्तव में एक सांस्कृतिक महायज्ञ था। उस यज्ञ के ऋत्विजों में गोस्वामी जी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे केवल एक रचनाकार नहीं थे, बल्कि ऋषि-मुनियों की उस प्रज्ञा-परंपरा के ध्वजवाहक थे, जहाँ ज्ञान लोक-कल्याण का माध्यम बनता है। वंश-परंपरा और संस्कार का अंकुरण 25 फरवरी, 1859 को वृंदावन की दिव्य धरा पर जब राधाचरण जी का जन्म हुआ, तो मानो सरस्वती स्वयं उनके स्वागत को उद्यत थीं। उनके पिता गल्लू जी महाराज (गुणमंजरी दास) स्वयं एक सिद्ध भक्त कवि थे। गोस्वामी जी को साहित्य और राष्ट्रप्रेम विरासत में मिले थे। उनके पिता के भीतर धार्मिक कट्टरता का लेश म...

महाप्राण निराला: व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन के अंतहीन आयाम। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। जयंती विशेषांक। संपादकीय आलेख।

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आज हम उस व्यक्तित्व का स्मरण करने के लिए एकत्रित हुए हैं, जिसने हिंदी साहित्य के आकाश में एक ऐसे धूमकेतु की भांति प्रवेश किया, जिसकी चमक से समूचा युग आलोकित हो उठा। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' एक ऐसा नाम, जो केवल एक कवि का नहीं, बल्कि एक चेतना का, एक क्रांति का और एक अदम्य जिजीविषा का पर्याय है। 1. व्यक्तित्व: फकीरी और फौलाद का संगम निराला जी का व्यक्तित्व विरोधाभासों का अद्भुत समन्वय था। उनके भीतर एक ओर हिमालय जैसी अडिगता थी, तो दूसरी ओर गंगा जैसी तरलता। वे स्वभाव से 'औघड़' थे एक ऐसे सन्यासी जिन्होंने अपनी फकीरी को अपना आभूषण बनाया। उनका कद-काठी और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि जो उन्हें एक बार देख लेता, उनकी छाप हृदय पर सदा के लिए अंकित हो जाती। किंतु उस वज्र जैसी देह के भीतर एक अत्यंत कोमल और करुणामय हृदय धड़कता था। अपनी अभावग्रस्त स्थिति में भी वे दूसरों की सहायता के लिए अपना अंतिम वस्त्र तक दान कर देने का साहस रखते थे। वे सही मायनों में 'महाप्राण' थे। 2. साहित्य की नवीन राह: छंदों के बंधन से मुक्ति निराला उस युग में आए जब हिंदी कविता छंदों के ...

विषय की रूपरेखा (Research Synopsis): अंतरराष्ट्रीय मानक

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विषय की रूपरेखा (Research Synopsis): अंतरराष्ट्रीय मानक रूपरेखा आपके शोध का 'ब्लूप्रिंट' है। इसे वैज्ञानिक और तर्कसंगत बनाने के लिए निम्नलिखित संरचना का पालन करें: 1. शीर्षक (Proposed Title) स्पष्टता: शीर्षक संक्षिप्त, आकर्षक और शोध के मूल विषय को स्पष्ट करने वाला हो। मानक: इसमें मुख्य चरों (Variables) और समय सीमा (यदि लागू हो) का उल्लेख होना चाहिए। उदाहरण: "सुदामा पांडेय 'धूमिल' के काव्य में लोकतान्त्रिक मोहभंग: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन (1960-1980)" 2. प्रस्तावना / भूमिका (Introduction) विषय प्रवर्तन: शोध विषय का सामान्य परिचय। प्रासंगिकता: वर्तमान समय में इस विषय पर शोध करना क्यों आवश्यक है? समस्या कथन (Statement of Problem): वह मूल प्रश्न क्या है जिसका उत्तर आप ढूंढ रहे हैं? 3. पूर्व साहित्य का पुनरावलोकन (Review of Related Literature) अन्तरराष्ट्रीय मानक: केवल किताबों की सूची नहीं, बल्कि उन पर आलोचनात्मक टिप्पणी। Research Gap: पिछले शोधों में क्या छूट गया है जिसे आप पूरा करेंगे? हिंदी साहित्य में: नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय आदि की आलोचनाओं का संदर्भ देना। 4....

शोध परिकल्पना और उसके उपादान

नमस्ते। शोध की दुनिया में आपका स्वागत है! एक शोधार्थी के लिए उसकी 'शोध परिकल्पना' (Research Hypothesis) वैसी ही है जैसे एक नाविक के लिए उसका दिशा-सूचक यंत्र (Compass)। बिना इसके, आप ज्ञान के अथाह समुद्र में दिशाहीन भटक सकते हैं। आइए, बहुत ही सरल और आत्मीय भाषा में समझते हैं कि परिकल्पना का महत्व क्या है और इसे गढ़ने के लिए आप किन स्रोतों का सहारा ले सकते हैं। शोध परिकल्पना का महत्व (Significance of Research Hypothesis) शोध परिकल्पना केवल एक 'अनुमान' नहीं है, बल्कि यह आपके शोध का तार्किक आधार है। इसके महत्व को हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं:  निश्चित दिशा प्रदान करना: परिकल्पना शोधार्थी को यह बताती है कि उसे क्या खोजना है। यह आपके शोध के दायरे को सीमित और केंद्रित करती है, जिससे आप फालतू की जानकारी जुटाने में समय बर्बाद नहीं करते।  परीक्षण योग्यता (Testability): यह एक ऐसा कथन है जिसे डेटा के माध्यम से सिद्ध या असिद्ध किया जा सकता है। बिना परिकल्पना के, शोध केवल एक निबंध बनकर रह जाता है, वैज्ञानिक जांच नहीं।  सांख्यिकीय विश्लेषण का आधार: आधुनिक शोध में जब हम डेटा एक...