बंदी जीवन, राष्ट्रभक्ति और साहित्यिक चेतना के विनायक : सावरकर। पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के सम्मानित पाठकों के लिए आज का दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक संकल्प को दोहराने का क्षण है। आज उस प्रखर राष्ट्रभक्त, अदम्य साहसी सेनानी और कालजयी साहित्यकार की पुण्यतिथि है, जिनके विचारों की गूंज आज भी भारतीय मानस को झंकृत करती है; माने तो इतिहास के पन्नों पर कुछ नाम स्याही से नहीं, बल्कि रक्त और तपस्या से लिखे जाते हैं। विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसा ही नाम है, जो स्वाधीनता समर के क्षितिज पर उस दैदीप्यमान नक्षत्र की भांति है, जिसने 'काले पानी' के घनघोर अंधकार में भी राष्ट्रप्रेम की लौ को बुझने नहीं दिया। उनका जीवन एक ऐसी महागाथा है, जहाँ क्रांतिकारी तेवर और कोमल साहित्यिक हृदय का अनूठा संगम मिलता है।
सेल्युलर जेल: यातनाओं के बीच सृजन का संगीत
अंडमान की वह कोठरी, जहाँ हवाएं भी दीवारों से टकराकर सिसकती थीं, सावरकर के लिए केवल एक कैदखाना नहीं, बल्कि एक तपोभूमि बन गई। जब शरीर को कोल्हू के बैल की तरह जोता जाता था और हाथों में बेड़ियाँ अपनी क्रूरता का संगीत सुनाती थीं, तब सावरकर का मस्तिष्क राष्ट्र के भविष्य का ताना-बाना बुन रहा होता था।
लेखनी छीन ली गई, कागज वर्जित थे, लेकिन जिसकी आत्मा में साहित्य का झरना बहता हो, उसे कौन रोक सकता था? उन्होंने जेल की दीवारों को ही अपना महाकाव्य बना लिया। कीलों और कोयले के टुकड़ों से दीवारों पर कविताएँ उकेरीं और उन्हें कंठस्थ किया। यह संसार के साहित्यिक इतिहास की सबसे विरल और मर्मस्पर्शी घटना है, जहाँ एक कवि अपनी रचनाओं को दीवारों पर लिखकर और फिर उन्हें मिटाकर अपनी स्मृति में सुरक्षित रखता है।
राष्ट्रभाषा हिन्दी: एकता का सूत्रधार
सावरकर केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं थे; वे सांस्कृतिक और भाषाई दासता से भी मुक्ति चाहते थे। उनका मानना था कि जिस राष्ट्र की अपनी भाषा नहीं, वह राष्ट्र गूंगा है। 1906 में जब वे लंदन के 'इंडिया हाउस' में थे, तभी उन्होंने 'अभिनव भारत' के संकल्पों में हिन्दी को राष्ट्रभाषा और देवनागरी को राष्ट्रलिपि के रूप में स्थान दिया था।
उनका तर्क अत्यंत व्यावहारिक और दूरदर्शी था। वे जानते थे कि उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम को जोड़ने वाला एकमात्र सेतु हिन्दी ही हो सकती है। जेल के भीतर भी उनका यह अभियान थमा नहीं। उन्होंने दक्षिण भारतीय, बंगाली और मराठी भाषियों के बीच हिन्दी की महत्ता को स्थापित किया।
"हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीयता की आत्मा की अभिव्यक्ति है।" - यह सावरकर का अटूट विश्वास था।
भाषा शुद्धि और साहित्यिक चेतना
सावरकर एक सजग भाषाविद थे। उन्होंने अनुभव किया कि सदियों की गुलामी ने हमारी भाषाओं में विदेशी शब्दों का ऐसा घालमेल कर दिया है कि हम अपनी मौलिकता खो रहे हैं। उन्होंने 'भाषा शुद्धि' का आंदोलन चलाया और कई सटीक शब्द हिन्दी को दिए जो आज हमारी शब्दावली का अभिन्न हिस्सा हैं:
* दिग्दर्शक (Director)
* नगरपालिका (Municipality)
* महापौर (Mayor)
* प्राध्यापक (Professor)
उनकी साहित्यिक चेतना केवल शब्दों तक सीमित नहीं थी। उनके द्वारा रचित '1857 का स्वातंत्र्य समर' ने सोई हुई भारतीय चेतना को वह चिंगारी दी, जिसने आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। उनके काव्य में जहाँ एक ओर 'ने मजसी ने परत मातृभूमीला, सागर प्राण तळमळला' जैसी विरह और देशप्रेम की व्याकुलता है, वहीं दूसरी ओर वीरता का वह ओज है जो कायरों में भी प्राण फूंक दे।
अंडमान में ज्ञान का दीप
जेल की काल कोठरियों में सावरकर ने एक 'अनौपचारिक विश्वविद्यालय' खड़ा कर दिया था। उन्होंने राजबंदियों को न केवल राजनीतिक रूप से जागरूक किया, बल्कि उन्हें विभिन्न भाषाएँ सीखने के लिए भी प्रेरित किया। उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि अंडमान की उस भयानक जेल में एक समृद्ध पुस्तकालय विकसित हो गया।
वे कहते थे कि शत्रु हमें शारीरिक रूप से बंदी बना सकता है, वैचारिक रूप से नहीं। जब राजबंदियों ने हिन्दी में पत्र-व्यवहार शुरू किया, तो यह अंग्रेजों के लिए एक नई चुनौती थी। यह सावरकर की भाषाई कूटनीति की जीत थी।
उपसंहार
विनायक दामोदर सावरकर का व्यक्तित्व एक महासागर की तरह है, जिसमें राष्ट्रभक्ति की लहरें हैं, तर्क की गहराई है और साहित्य का अमृत है। वे एक ऐसे सेनानी थे जिन्होंने तलवार और कलम, दोनों से ही मां भारती की सेवा की। आज उनकी पुण्यतिथि पर 'मीमांसा' परिवार उन्हें शत-शत नमन करता है।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियाँ केवल शरीर को कष्ट दे सकती हैं, संकल्प को नहीं। उनकी स्मृति हमें सदैव अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने राष्ट्र के प्रति गौरव की अनुभूति कराती रहेगी।
अमर रहे वह क्रांतिकारी चेतना! जय हिन्द!
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के सम्मानित पाठकों के लिए आज का दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक संकल्प को दोहराने का क्षण है। आज उस प्रखर राष्ट्रभक्त, अदम्य साहसी सेनानी और कालजयी साहित्यकार की पुण्यतिथि है, जिनके विचारों की गूंज आज भी भारतीय मानस को झंकृत करती है; माने तो
इतिहास के पन्नों पर कुछ नाम स्याही से नहीं, बल्कि रक्त और तपस्या से लिखे जाते हैं। विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसा ही नाम है, जो स्वाधीनता समर के क्षितिज पर उस दैदीप्यमान नक्षत्र की भांति है, जिसने 'काले पानी' के घनघोर अंधकार में भी राष्ट्रप्रेम की लौ को बुझने नहीं दिया। उनका जीवन एक ऐसी महागाथा है, जहाँ क्रांतिकारी तेवर और कोमल साहित्यिक हृदय का अनूठा संगम मिलता है।
सेल्युलर जेल: यातनाओं के बीच सृजन का संगीत
अंडमान की वह कोठरी, जहाँ हवाएं भी दीवारों से टकराकर सिसकती थीं, सावरकर के लिए केवल एक कैदखाना नहीं, बल्कि एक तपोभूमि बन गई। जब शरीर को कोल्हू के बैल की तरह जोता जाता था और हाथों में बेड़ियाँ अपनी क्रूरता का संगीत सुनाती थीं, तब सावरकर का मस्तिष्क राष्ट्र के भविष्य का ताना-बाना बुन रहा होता था।
लेखनी छीन ली गई, कागज वर्जित थे, लेकिन जिसकी आत्मा में साहित्य का झरना बहता हो, उसे कौन रोक सकता था? उन्होंने जेल की दीवारों को ही अपना महाकाव्य बना लिया। कीलों और कोयले के टुकड़ों से दीवारों पर कविताएँ उकेरीं और उन्हें कंठस्थ किया। यह संसार के साहित्यिक इतिहास की सबसे विरल और मर्मस्पर्शी घटना है, जहाँ एक कवि अपनी रचनाओं को दीवारों पर लिखकर और फिर उन्हें मिटाकर अपनी स्मृति में सुरक्षित रखता है।
राष्ट्रभाषा हिन्दी: एकता का सूत्रधार
सावरकर केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं थे; वे सांस्कृतिक और भाषाई दासता से भी मुक्ति चाहते थे। उनका मानना था कि जिस राष्ट्र की अपनी भाषा नहीं, वह राष्ट्र गूंगा है। 1906 में जब वे लंदन के 'इंडिया हाउस' में थे, तभी उन्होंने 'अभिनव भारत' के संकल्पों में हिन्दी को राष्ट्रभाषा और देवनागरी को राष्ट्रलिपि के रूप में स्थान दिया था।
उनका तर्क अत्यंत व्यावहारिक और दूरदर्शी था। वे जानते थे कि उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम को जोड़ने वाला एकमात्र सेतु हिन्दी ही हो सकती है। जेल के भीतर भी उनका यह अभियान थमा नहीं। उन्होंने दक्षिण भारतीय, बंगाली और मराठी भाषियों के बीच हिन्दी की महत्ता को स्थापित किया।
"हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीयता की आत्मा की अभिव्यक्ति है।" - यह सावरकर का अटूट विश्वास था।
भाषा शुद्धि और साहित्यिक चेतना
सावरकर एक सजग भाषाविद थे। उन्होंने अनुभव किया कि सदियों की गुलामी ने हमारी भाषाओं में विदेशी शब्दों का ऐसा घालमेल कर दिया है कि हम अपनी मौलिकता खो रहे हैं। उन्होंने 'भाषा शुद्धि' का आंदोलन चलाया और कई सटीक शब्द हिन्दी को दिए जो आज हमारी शब्दावली का अभिन्न हिस्सा हैं:
* दिग्दर्शक (Director)
* नगरपालिका (Municipality)
* महापौर (Mayor)
* प्राध्यापक (Professor)
उनकी साहित्यिक चेतना केवल शब्दों तक सीमित नहीं थी। उनके द्वारा रचित '1857 का स्वातंत्र्य समर' ने सोई हुई भारतीय चेतना को वह चिंगारी दी, जिसने आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। उनके काव्य में जहाँ एक ओर 'ने मजसी ने परत मातृभूमीला, सागर प्राण तळमळला' जैसी विरह और देशप्रेम की व्याकुलता है, वहीं दूसरी ओर वीरता का वह ओज है जो कायरों में भी प्राण फूंक दे।
अंडमान में ज्ञान का दीप
जेल की काल कोठरियों में सावरकर ने एक 'अनौपचारिक विश्वविद्यालय' खड़ा कर दिया था। उन्होंने राजबंदियों को न केवल राजनीतिक रूप से जागरूक किया, बल्कि उन्हें विभिन्न भाषाएँ सीखने के लिए भी प्रेरित किया। उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि अंडमान की उस भयानक जेल में एक समृद्ध पुस्तकालय विकसित हो गया।
वे कहते थे कि शत्रु हमें शारीरिक रूप से बंदी बना सकता है, वैचारिक रूप से नहीं। जब राजबंदियों ने हिन्दी में पत्र-व्यवहार शुरू किया, तो यह अंग्रेजों के लिए एक नई चुनौती थी। यह सावरकर की भाषाई कूटनीति की जीत थी।
उपसंहार
विनायक दामोदर सावरकर का व्यक्तित्व एक महासागर की तरह है, जिसमें राष्ट्रभक्ति की लहरें हैं, तर्क की गहराई है और साहित्य का अमृत है। वे एक ऐसे सेनानी थे जिन्होंने तलवार और कलम, दोनों से ही मां भारती की सेवा की। आज उनकी पुण्यतिथि पर 'मीमांसा' परिवार उन्हें शत-शत नमन करता है।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियाँ केवल शरीर को कष्ट दे सकती हैं, संकल्प को नहीं। उनकी स्मृति हमें सदैव अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने राष्ट्र के प्रति गौरव की अनुभूति कराती रहेगी।
अमर रहे वह क्रांतिकारी चेतना! जय हिन्द!
अस्वीकरण (Disclaimer): इस आलेख में प्रस्तुत विचार ऐतिहासिक तथ्यों और वीर सावरकर जी के साहित्यिक योगदान पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य केवल सूचनात्मक और शैक्षिक है। 'मीमांसा' पत्रिका किसी भी प्रकार के वैमनस्य का समर्थन नहीं करती और न ही ऐतिहासिक व्याख्याओं की विधिक सटीकता का दावा करती है।
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