"फायर! डोंट लेट हिम मूव!" कमांडर का आदेश मिलते ही तड़तड़ाहट शुरू हो गई। प्रतिद्वंद्वी ने पास की जामुन के पेड़ की ओट ली। धांय... धांय... उनकी कोल्ट पिस्तौल से निकली गोलियाॅं सीधे निशाने पर बैठ रही थीं। एक सिपाही कंधे पर हाथ रख चीखा और जमीन पर गिर पड़ा।
"पकड़ो! मारो साले को!" सिपाहियों की घबराई हुई चीख-पुकार और राइफलों की रिलोडिंग की आवाज़ें खट-कड़क, खट-कड़क वातावरण को और भी भयावह बना रही थीं। धुआं इतना घना था कि सूरज की रोशनी मद्धम पड़ने लगी। आज़ाद के चारों ओर की मिट्टी गोलियों की मार से उड़ रही थी।
तभी एक धमाका हुआ अंग्रेजों ने अपनी पोजीशन मजबूत करने के लिए छोटे हैंड-ग्रेनेड (बमबाजी) का सहारा लिया। पार्क की शांत फिजा बारूद की गंध से भर गई। गोलियों की वह 'तड़तड़ाहट' नहीं, बल्कि मौत का संगीत था। हर राइफल से निकलती गोली के बाद खाली खोखे के गिरने की 'टिंग-टिंग' साफ़ सुनाई दे रही थी।
पर उधर से आज़ाद की एक गरजती हुई हॅंसी आई, जो राइफलों के शोर पर भारी थी। उन्होंने अपनी पिस्तौल का मैगजीन चेक किया अंतिम कुछ गोलियाॅं। उन्होंने अपनी मूंछों पर आखिरी बार ताव दिया। बूटों की चाप पास आ रही थी, घेरा छोटा हो रहा था, और आज़ाद की आँखों में वह चमक थी जो केवल मौत को जीतने वालों के पास होती है।
दोपहर का वक्त था अल्फ्रेड पार्क के उस विशाल जामुन के पेड़ के पीछे सन्नाटा पसरा था, लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद के भीतर विचारों का एक चक्रवात चल रहा था। उनके हाथ में उनकी प्रिय 'कोल्ट' पिस्तौल थी, वही जो उनकी परछाईं बनकर साथ रहती थी। अचानक, टहनियों के टूटने की आहट हुई और फिर एक कर्कश आवाज़ गूँजी...
"सराउंड हिम! डोंट लेट हिम एस्केप!" (उसे घेर लो! बचने न पाए!)
नॉट-बाबर अपनी पूरी फौज के साथ सामने था। गोलियों की तड़तड़ाहट ने पार्क की शांति को चीर दिया। भारतीय निशानेबाज ने आजाद के टाॅंग में निशाना साधा। गोली आज़ाद की जाॅंघ को छूकर निकल गई। दर्द की एक लहर उठी, और इसी टीस के साथ आज़ाद की स्मृतियाँ पीछे की ओर दौड़ पड़ीं... अतीत का झरोखा खुल गया।
आज़ाद की आँखों के सामने 9 अगस्त 1925 की वह धुंधली रात कौंध गई। इंजन की भारी आवाज़, अंधेरा और बिस्मिल की वह बुलंद आवाज़ "पकड़ो खजाना!" काकोरी स्टेशन के पास ट्रेन रुकी थी। आज़ाद याद कर रहे थे कि कैसे उन्होंने और उनके साथियों ने फिरंगियों के अहंकार (सरकारी खजाने) को लूटा था। वह जीत सिर्फ पैसों की नहीं, हौसले की थी। लेकिन फिर... बिस्मिल, अशफाक, रोशन सिंह... एक-एक करके सब बिछड़ गए। फाॅंसी के फंदे उनके गले का हार बन गए और आज़ाद अकेले रह गए एक ऐसी मशाल जिसे बुझाने के लिए पूरी ब्रिटिश हुकूमत ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।
एक और गोली चली। आज़ाद वर्तमान में लौटे। सुखदेव राज उनके पास ही थे। "सुखदेव, तुम यहाँ से निकलो! संगठन को तुम्हारी ज़रूरत है। मैं इन्हें उलझाए रखता हूँ," आज़ाद की आवाज़ में वह पत्थर जैसी दृढ़ता थी जिसे कोई डिगा नहीं सकता था। सुखदेव हिचकिचाए, पर आज़ाद की आँखों के आदेश को टाल न सके। वे सुरक्षित निकल गए। अब मैदान में आज़ाद अकेले थे। चारों ओर से सैकड़ों बंदूकें और बीच में वह 'अजेय' योद्धा। अंग्रेजी गोलियों की गूँज के बीच, जब आज़ाद जामुन के पेड़ के पीछे खून से लथपथ खड़े थे, उनकी धुंधलाई आँखों के सामने एक चेहरा उभरा भगत सिंह। वह तीखी नाक, वे बुद्धिमत्ता से चमकती आँखें और वह मंद मुस्कान।
आज़ाद का सीना फटने लगा। अभी कुछ ही समय पहले तो उनकी आखिरी मुलाकात हुई थी। भगत ने कहा था, "पंडित जी, फाँसी का फंदा तो मेरा श्रृंगार बनेगा," और आज़ाद ने झल्लाकर उसका कंधा झकझोर दिया था "नहीं भगत, तुझे आज़ाद भारत देखना है!"
आज 27 फरवरी है। आज़ाद जानते थे कि ठीक 25 दिन बाद, 24 मार्च को उनके 'भगत' को मौत के गले मिलना है। आज़ाद के भीतर एक हूक उठी। उन्होंने सुखदेव राज के साथ मिलकर कितनी ही योजनाएँ बनाई थीं भगत को जेल तोड़कर बाहर निकालने की, वायसराय की गाड़ी उड़ाने की ताकि दबाव बनाया जा सके। पर आज नियति ने उन्हें इस पार्क में घेर लिया था।
आज़ाद की मुट्ठियाँ भिंच गईं। 'अफसोस भगत! मैं तुझे बचाने के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाता, पर आज खुद मौत से घिर गया हूँ। मेरा भाई वहाँ अकेला है, और मैं यहाँ...' एक पल के लिए उस फौलादी पुरुष की आँखें नम हो गईं। वह दर्द गोली के जख्म से कहीं ज्यादा गहरा था। पर तभी एक और राइफल की गोली उनके पास से सनसनाती हुई गुजरी और आज़ाद ने अपनी पिस्तौल कस ली। उन्होंने मन ही मन कहा "भगत, तू वहां चढ़ना सूली पर, मैं यहाँ इस माटी को अपना रक्त चढ़ाता हूँ। हम फिर मिलेंगे आज़ाद भारत के किसी मुकाम पर!"
स्मृतियाँ फिर पीछे मुड़ीं। 15 साल का एक बालक, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार किया था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा था: "तुम्हारा नाम?"
बालक ने सीना तानकर कहा: "आज़ाद!"
"पिता का नाम?"
"स्वतंत्रता!"
"घर कहाँ है?"
"जेलखाना!"
पंद्रह कोड़ों की मार उस बालक की पीठ पर पड़ी थी, पर हर कोड़े के साथ मुँह से सिर्फ़ एक ही नाम निकला 'वन्दे मातरम'। वह बालक आज 24 साल का गबरू जवान बन चुका था, जिसने अपने नाम को सार्थक करने की कसम खाई थी।
पार्क में गोलियों की आवाज़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। जामुन का पेड़ भी गोलियों की बौछार से छलनी हो गया था। आज़ाद से सोचा और अब कहाॅं शरण लूं!
कमबख्त किसने मुखबिरी की? प्रयागराज की वह दोपहर अब ढलने को थी। आज़ाद के शरीर से बहता रक्त अल्फ्रेड पार्क की मिट्टी को लाल कर रहा था। तभी, उनके धुंधलाते मानस पटल पर भाबुआ के अपने घर की तस्वीर उभर आई।
उन्हें अपनी वृद्ध माँ (जगरानी देवी) का चेहरा याद आया। एक टीस उठी 'माँ, मैं तेरा सहारा न बन सका। तुझे बुढ़ापे में लाठी की ज़रूरत थी, पर मैंने तुझे आंसुओं की विरासत दी।' आज़ाद की आँखों के कोर गीले हो गए। उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की, "हे ईश्वर! अगर पुनर्जन्म सत्य है, तो मुझे फिर से इसी माँ की कोख से जन्म देना, ताकि इस जन्म का अधूरा कर्ज अगले जन्म में सेवा करके उतार सकूँ।"
परंतु, तभी उनके हाथ में लगी माटी की छुअन ने उन्हें याद दिलाया कि एक और 'माँ' है, जिसका ऋण कहीं बड़ा है। भारत माता।
आज़ाद ने अपनी पिस्तौल की ठंडी नली को अपनी कनपटी से छुआया। उन्होंने मिट्टी की एक मुट्ठी भरी और उसे चूमते हुए बुदबुदाए, "माँ, मैंने अपना वचन निभाया। जीते-जी फिरंगियों की बेड़ियाँ मुझे छू न सकीं। आज तेरे मिट्टी के ऋण से उऋण (मुक्त) होने का समय आ गया है।"
उन्होंने आसमान की ओर देखा, जहाँ सूरज बादलों के पीछे छिप रहा था। आज़ाद के होंठों पर एक शांत प्रार्थना थी "बहुत दौड़-भाग ली आज़ाद ने... बहुत संघर्ष किया इस बदन ने... अब बस तेरी गोद में सिर रखकर चैन की नींद सोना चाहता हूँ माँ!"
आज़ाद के पास अब अंतिम कारतूस बचा था। उन्होंने मुस्कुराकर अपनी पिस्तौल की ओर देखा। उन्हें वह कसम याद आई जो उन्होंने खुद से की थी "जीते जी कभी फिरंगियों के हाथ नहीं आऊँगा।"
पुलिस की टुकड़ी धीरे-धीरे पास आ रही थी। नॉट-बाबर को लगा कि आज़ाद की गोलियाॅं खत्म हो गई हैं। लेकिन आज़ाद के पास अभी उनकी 'आज़ादी' शेष थी। उन्होंने पिस्तौल अपनी कनपटी पर रखी। प्रयागराज की मिट्टी ने मानो अपनी बाहें फैला दीं।
एक आखिरी धांय! और सन्नाटा छा गया। आज़ाद ने जैसे ही वह अंतिम गोली दागी, आसमान का दृश्य ही बदल गया। सूरज और तेज हो गया, मानों वह भी इस महानायक को अंतिम विदाई दे रहा हो। नीला आसमान पूरी तरह स्वच्छ हो गया और सफेद बादलों ने एक 'दैवीय कफन' की तरह आज़ाद की देह को ढक लिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे स्वर्ग में बिस्मिल, अशफाक और रोशन सिंह बांहें फैलाकर अपने 'चंद्रशेखर' को गले लगाने को आतुर हैं। अंग्रेजी सिपाहियों को लगा कि आजाद चुपचाप इंतजार कर रहा है, घायल हो चुका है। मौका पाकर पुलिस तड़ा-तड़ गोलियों की बौछारें कर दीं। चीलों गिद्धों ने ऊॅंची- ऊॅंची उड़ानें भरीं।
जब नॉट-बाबर पास पहुँचा, तो उसने देखा कि वह महामानव शांत पड़ा था। वह दृश्य इतना अलौकिक था कि उस क्रूर और नीली आँखों वाले नॉट-बाबर का कलेजा भी कांप उठा। वह भारतीय नौजवान की ऐसी अकल्पनीय वीरता देखकर भावुक हो गया। उसने अपनी कैप उतारी और थरथराते होंठों से 'गॉड' से प्रार्थना करने लगा कि इस महान योद्धा को स्वर्ग में सर्वोच्च स्थान मिले।
आज़ाद मरकर भी आज़ाद ही रहे। उनकी देह निष्प्राण थी, लेकिन उनकी मूंछों का ताव अब भी अंग्रेजों के खौफ का कारण बना हुआ था। आज वहाॅं जामुन का पेड़ भले ही न हो, पर वहाँ की मिट्टी आज भी चीख-चीख कर कहती है "आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे।" हाॅं ये सच है उसी आज़ाद के अंतिम कारतूस का खोखा अब बीज से वटवृक्ष का रूप ले लिया है।
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