महाप्राण निराला: व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन के अंतहीन आयाम। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। जयंती विशेषांक। संपादकीय आलेख।
आज हम उस व्यक्तित्व का स्मरण करने के लिए एकत्रित हुए हैं, जिसने हिंदी साहित्य के आकाश में एक ऐसे धूमकेतु की भांति प्रवेश किया, जिसकी चमक से समूचा युग आलोकित हो उठा। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' एक ऐसा नाम, जो केवल एक कवि का नहीं, बल्कि एक चेतना का, एक क्रांति का और एक अदम्य जिजीविषा का पर्याय है।
1. व्यक्तित्व: फकीरी और फौलाद का संगम
निराला जी का व्यक्तित्व विरोधाभासों का अद्भुत समन्वय था। उनके भीतर एक ओर हिमालय जैसी अडिगता थी, तो दूसरी ओर गंगा जैसी तरलता। वे स्वभाव से 'औघड़' थे एक ऐसे सन्यासी जिन्होंने अपनी फकीरी को अपना आभूषण बनाया।
उनका कद-काठी और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि जो उन्हें एक बार देख लेता, उनकी छाप हृदय पर सदा के लिए अंकित हो जाती। किंतु उस वज्र जैसी देह के भीतर एक अत्यंत कोमल और करुणामय हृदय धड़कता था। अपनी अभावग्रस्त स्थिति में भी वे दूसरों की सहायता के लिए अपना अंतिम वस्त्र तक दान कर देने का साहस रखते थे। वे सही मायनों में 'महाप्राण' थे।
2. साहित्य की नवीन राह: छंदों के बंधन से मुक्ति
निराला उस युग में आए जब हिंदी कविता छंदों के कड़े अनुशासन में बंधी थी। उन्होंने इस परंपरा को चुनौती दी और 'मुक्त छंद' की नींव रखी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कविता की मुक्ति भी मनुष्य की मुक्ति की तरह ही अनिवार्य है।
छायावाद के स्तंभ: महादेवी वर्मा, प्रसाद और पंत के साथ मिलकर उन्होंने छायावाद को वह दार्शनिक गहराई दी, जो भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर है।
यथार्थवाद के पुरोधा: जहाँ एक ओर 'जूही की कली' में प्रेम की कोमलता है, वहीं 'भिक्षुक' और 'वह तोड़ती पत्थर' में समाज के वंचित वर्ग के प्रति उनकी गहरी सहानुभूति और यथार्थ का नग्न चित्रण है।
3. सरोज स्मृति: एक पिता का विलाप और विश्व का महान शोक-गीत
जब हम निराला के जीवन के कारुणिक पक्ष की बात करते हैं, तो उनकी पुत्री 'सरोज' का असमय जाना उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी। किंतु इसी दुख से उत्पन्न हुआ 'सरोज स्मृति' हिंदी साहित्य का ही नहीं, बल्कि विश्व साहित्य का एक अद्वितीय 'एलीजी' (शोक-गीत) है। इसमें एक पिता की विवशता भी है और अपने जीवन के संघर्षों का वह बेबाक चित्रण भी, जहाँ वे कहते हैं:
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही!"
4. निराला का अध्यात्म और दर्शन
निराला पर स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस के दर्शन का गहरा प्रभाव था। उनकी 'राम की शक्ति पूजा' केवल एक प्रबंध काव्य नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के अंतर्मन में चल रहे द्वंद्व की विजय गाथा है। जब राम हताश होते हैं, तो निराला का कवि उन्हें पुनः शक्ति संचय का मार्ग दिखाता है। यह रचना संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य की जय सुनिश्चित है, बशर्ते हम अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान लें।
5. सामाजिक चेतना और विद्रोही स्वर
निराला कभी किसी सत्ता या व्यवस्था के सामने नहीं झुके। उनकी रचना 'कुकुरमुत्ता' उस समय के पूंजीवादी और सामंती ढांचे पर एक करारा व्यंग्य है। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बनाया। उनके गीतों में जहाँ एक ओर 'वर दे वीणावादिनी' जैसी मां सरस्वती की पावन वंदना है, वहीं दूसरी ओर बादलों को क्रांति का दूत बनाकर पुकारने का आह्वान भी है।
6. वर्तमान समय में निराला की प्रासंगिकता
आज जब समाज वैचारिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, निराला के विचार और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि अभावों में भी स्वाभिमान के साथ कैसे जिया जाता है। वे हमें सिखाते हैं कि भाषा केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि संस्कृति का रक्षक भी है।
निष्कर्ष
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि निराला को पढ़ना स्वयं को जानने जैसा है। वे किसी सीमा में नहीं बंधते। वे जल की तरह प्रवाहमान हैं और अग्नि की तरह पवित्र।वेब पत्रिका 'मीमांसा' की ओर से निराला जी को श्रद्धांजलि है, बल्कि यह हमारी उस समृद्ध राजभाषा परंपरा का सम्मान है जिसे निराला ने अपने रक्त से सींचा था।
आइए, आज इस गौरवमयी अवसर पर हम संकल्प लें कि निराला के 'समन्वय' और उनके 'साहस' को हम अपने कार्य और जीवन में उतारेंगे।
सादर धन्यवाद।
जय हिंद, जय हिंदी।
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