छायावादी प्रवृत्तियों की समझ।

नमस्ते। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस विशेषांक में आपका हार्दिक स्वागत है। आज हम एक ऐसे विचित्र समय में जी रहे हैं जहाँ जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि उसकी अतिशयता (Information Overload) सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। सूचनाओं के इस अंतहीन जाल में पाठक अक्सर स्वयं को दिशाहीन पाता है। आज प्रेषित की जाने वाली सूचनाएँ केवल 'क्लिक' और 'व्यूज' के गणित तक सिमट गई हैं। उनमें न तो वह रूहानी जुड़ाव है, न ही वह विश्लेषण जो पाठक के अंतर्मन को उद्वेलित कर सके। सूचनाएँ परोसी तो जा रही हैं, लेकिन उनका 'अस्वाद' खो गया है। हालांकि हम हिंदी साहित्य के उस स्वर्ण-युग की देहरी पर  खड़े हैं, जिसने जड़ता को चेतना दी और स्थूलता को सूक्ष्मता के कोमल आवरण से ढंक दिया। हम बात कर रहे हैं छायावाद की। छायावाद केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय मानस की वह अंगड़ाई थी जिसने मध्यकालीन रूढ़ियों को तोड़कर आधुनिकता के नए प्रतिमान गढ़े।मीमांसा' का यह प्रयास है कि पाठक केवल शब्दों को देखे नहीं, बल्कि उन्हें 'महसूस' करे। हम केवल जानकारी के वितरक नहीं, बल्कि विचारों के संवाहक बनना चाहते हैं। छायावाद की सूक्ष्मता, उसकी रहस्यमयी कल्पनाशीलता और मानवीय सरोकारों के माध्यम से हम आज के पाठक को उस जड़ता से बाहर निकालना चाहते हैं, जहाँ सूचनाएँ तो हैं, पर ज्ञान का प्रकाश धुंधला है।
आइए, इस विशेषांक के माध्यम से हम साहित्य की उस पावन सलिला में डुबकी लगाएँ, जहाँ शिल्प की नवीनता और भावों की तरलता मिलकर एक नए 'मीमांसा-बोध' को जन्म देती है।


छायावाद: युगबोध और संवेदना का नव-उन्मेष
हिंदी कविता के इतिहास में छायावाद (1918-1936) वह कालखंड है, जहाँ पहुँचकर भाषा अपनी सीमाओं को लांघकर संगीत बन गई। 'मीमांसा' के इस अंक में हम उन दस स्तंभों के आधार पर इस युग की पड़ताल करेंगे, जिन्होंने इसे अमर बनाया।

1. आत्माभिव्यंजन: 'स्व' की प्रतिष्ठा
छायावाद से पूर्व कविता लोक-मंगल या उपदेश की वस्तु थी, लेकिन छायावादी कवियों ने 'मैं' को प्रधानता दी। यह अहंकार नहीं, बल्कि आत्म-बोध था। निराला जब कहते हैं, "मैंने मैं शैली अपनाई", तो वे उस व्यक्तिगत पीड़ा और उल्लास को स्वर देते हैं जो अब तक वर्जित था। यहाँ कवि अपनी निजी अनुभूतियों को विश्व-अनुभूति बनाकर प्रस्तुत करता है।

2. सौंदर्य चित्रण: सूक्ष्मता का उल्लास
छायावाद में सौंदर्य हाड़-मांस का पुतला नहीं, बल्कि एक वायवीय और अलौकिक अनुभूति है। यहाँ सौंदर्य आँखों से अधिक मन की वस्तु है। प्रसाद की पंक्तियों में श्रद्धा का सौंदर्य हो या पंत की कविताओं में नारी का रूप, वह सदैव एक दैवीय आभा से मंडित रहता है। यह सौंदर्य 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह' है।

3. श्रृंगार निरूपण: देह से विदेह तक
रीतिकाल का श्रृंगार जहाँ विलासिता में डूबा था, वहीं छायावाद का श्रृंगार अत्यंत मर्यादित, पवित्र और आंतरिक है। यहाँ मिलन की व्याकुलता तो है, किंतु उसमें वासना की गंध नहीं। कामायनी में मनु और श्रद्धा का प्रेम सृजन का आधार बनता है, जो भौतिकता से ऊपर उठकर आध्यात्मिक धरातल को छूता है।

4. नारी चित्रण: शक्ति और करुणा की प्रतिमूर्ति
छायावादी कवियों ने नारी को दासी या भोग्या के स्थान पर 'प्रेरणा' और 'शक्ति' के रूप में प्रतिष्ठित किया। प्रसाद ने उद्घोष किया— "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो।" वह पुरुष की सहचरी, उसकी चेतना और समस्त सृजन की मूल इकाई बनकर उभरी। महादेवी वर्मा के काव्य में तो नारी की अंतर्वेदना और उसकी अदम्य जिजीविषा का साक्षात स्वरूप मिलता है।

5. रहस्य भावना और कल्पना की प्रधानता
छायावाद का अर्थ ही है—प्रकृति के भीतर किसी अज्ञात सत्ता की 'छाया' देखना। जब पंत पूछते हैं, "न जाने कौन अये द्युतिमान!", तो वह जिज्ञासा ही रहस्यवाद है। कल्पना यहाँ पंख लगाकर उड़ती है। यह कोरी कल्पना नहीं, बल्कि यथार्थ की कड़वाहट से बचकर एक सुंदर स्वप्निल संसार की रचना करने की प्रवृत्ति है।

6. प्रकृति चित्रण: सजीव और संवेदनात्मक
छायावाद में प्रकृति जड़ नहीं, बल्कि एक सजीव सत्ता है। वह कवि की सुख-दुख की संगिनी है। पंत को 'प्रकृति का सुकुमार कवि' यों ही नहीं कहा गया; उनके लिए प्रकृति की गोद मां के आंचल जैसी है। यहाँ प्रकृति कहीं मानवीकरण अलंकार के रूप में सजती है, तो कहीं दार्शनिक चिंतन का विषय बनती है।

7. दुःख और वेदना की अभिव्यक्ति
छायावाद की अंतर्धारा में एक गहरी करुणा प्रवाहित है। महादेवी की "मैं नीर भरी दुख की बदली" जैसी पंक्तियां इस वेदना की पराकाष्ठा हैं। यह दुख केवल व्यक्तिगत हार नहीं है, बल्कि तत्कालीन पराधीनता और समाज की विषमताओं से उपजी एक सामूहिक छटपटाहट है।

8. राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति
अक्सर छायावाद पर पलायनवाद का आरोप लगता है, किंतु इसके गर्भ में राष्ट्रप्रेम की तीव्र भावना छिपी है। माखनलाल चतुर्वेदी की 'पुष्प की अभिलाषा' या प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों के गीत (जैसे— "अरुण यह मधुमय देश हमारा") भारतीय अस्मिता और गौरव का गान करते हैं। यह राष्ट्रवाद प्रत्यक्ष नारों में नहीं, बल्कि संस्कृति की रक्षा के संकल्प में दिखता है।

9. मानवीय सरोकार और दयनीय जीवन
निराला जैसे कवियों ने छायावाद के भीतर ही प्रगतिवाद के बीज बो दिए थे। 'भिक्षुक', 'वह तोड़ती पत्थर' और 'विधवा' जैसी कविताएं समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा को स्वर देती हैं। यह प्रमाणित करता है कि छायावाद केवल बादलों और फूलों की कविता नहीं थी, वह ज़मीन के दुख से भी जुड़ी थी।

10. शैलीगत प्रवृत्तियां: शिल्प का नव-संस्कार
छायावाद की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषा और शिल्प है। कवियों ने ब्रजभाषा के मोह को त्यागकर खड़ी बोली को वह माधुर्य और सामर्थ्य दिया, जिसकी कल्पना पहले असंभव थी।
 * लाक्षणिकता का प्रयोग: यहाँ शब्द सीधे अर्थ न देकर गहरे संकेत देते हैं। भाषा में एक प्रकार की तरलता और गोपनियता है।
 * प्रतीकात्मक शैली: दीपक, बादल, लहर, और उषा जैसे शब्द केवल प्राकृतिक तत्व नहीं, बल्कि मानवीय भावों के प्रतीक बनकर आए हैं।
 * उपचार वक्रता और नवीन अलंकार: छायावाद ने उपमा और रूपक को नए अर्थ दिए। 'मानवीकरण' (Personification) इस युग का सबसे प्रिय अलंकार रहा, जहाँ जड़ वस्तुओं को चेतना युक्त दिखाया गया।
 * संगीत और लय: मुक्त छंद (निराला की देन) ने कविता को छंदों के बंधन से मुक्त कर उसे भावों की लय पर थिरकने का अवसर दिया।

निष्कर्ष: 'मीमांसा' का दृष्टिकोण
छायावाद हिंदी साहित्य का वह वसंत है, जिसकी खुशबू आज भी हमारे गद्य और पद्य में रची-बसी है। इसने हमें सिखाया कि मनुष्य के भीतर का आकाश और बाहर की प्रकृति एक ही सत्य के दो रूप हैं। 'मीमांसा' का यह अंक छायावाद के उन्हीं सूक्ष्म रेशों को सुलझाने का एक विनम्र प्रयास है।
पाठकवृंद, हम आशा करते हैं कि छायावाद की यह साहित्यिक यात्रा आपके हृदय को उद्वेलित करेगी और आप उन कवियों की अनुभूतियों को अपने भीतर महसूस कर पाएंगे जिन्होंने शब्द को 'ब्रह्म' बना दिया।
— संपादक, 'मीमांसा'


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