भारतेंदु मंडल के दैदीप्यमान नक्षत्र - पंडित राधाचरण गोस्वामी। जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि वह दर्पण है जिसमें कालखंड की धड़कनें सुनाई देती हैं। 'मीमांसा' की इस विशेष श्रृंखला में आज हमारा सौभाग्य है कि हम उस मनीषी को अपनी भावांजलि अर्पित कर रहे हैं, जिन्होंने ब्रज की पावन रज को अपने माथे पर लगाकर आधुनिक हिंदी साहित्य की आधारशिला रखने में महती भूमिका निभाई। आज हम बात कर रहे हैं पंडित राधाचरण गोस्वामी की।

भारतीय साहित्य का वह दौर, जिसे हम 'भारतेंदु युग' के नाम से जानते हैं, वास्तव में एक सांस्कृतिक महायज्ञ था। उस यज्ञ के ऋत्विजों में गोस्वामी जी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे केवल एक रचनाकार नहीं थे, बल्कि ऋषि-मुनियों की उस प्रज्ञा-परंपरा के ध्वजवाहक थे, जहाँ ज्ञान लोक-कल्याण का माध्यम बनता है।

वंश-परंपरा और संस्कार का अंकुरण

25 फरवरी, 1859 को वृंदावन की दिव्य धरा पर जब राधाचरण जी का जन्म हुआ, तो मानो सरस्वती स्वयं उनके स्वागत को उद्यत थीं। उनके पिता गल्लू जी महाराज (गुणमंजरी दास) स्वयं एक सिद्ध भक्त कवि थे। गोस्वामी जी को साहित्य और राष्ट्रप्रेम विरासत में मिले थे। उनके पिता के भीतर धार्मिक कट्टरता का लेश मात्र भी नहीं था; इसके उलट उनमें सामाजिक क्रांति की प्रज्वलित चिंगारियाँ थीं। इन्हीं संस्कारों की खाद-पानी ने राधाचरण जी को एक ऐसा व्यक्तित्व प्रदान किया, जहाँ एक ओर ब्रज की मधुर भक्ति थी, तो दूसरी ओर राष्ट्र की मुक्ति का शंखनाद।

वृंदावन: नवजागरण का आध्यात्मिक केंद्र

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब भारत पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब बनारस, इलाहाबाद, पटना और कलकत्ता जैसे नगर वैचारिक चेतना के केंद्र बन रहे थे। किंतु वृंदावन को इस नवजागरण की मुख्यधारा से जोड़ने का श्रेय अकेले राधाचरण गोस्वामी जी को जाता है। वे वृंदावन के एकमात्र ऐसे प्रतिनिधि थे, जिन्होंने धर्म, अध्यात्म और आधुनिक राजनीति का अद्भुत समन्वय किया।

साहित्यिक अवदान: विधाओं के पथ-प्रदर्शक

गोस्वामी जी का साहित्यिक जीवन 1877 में 'शिक्षामृत' के प्रकाशन से प्रारंभ हुआ। उन्होंने लगभग 75 पुस्तकों की रचना की, जिनमें मौलिक नाटक, उपन्यास और अनुवाद शामिल हैं। राधाचरण गोस्वामी जी के साहित्यिक जीवन का आरम्भ 1877 ई. में हुआ था। इसी वर्ष उनकी पुस्तक ‘शिक्षामृत’ का प्रकाशन हुआ था। यह उनकी प्रथम पुस्तकाकार रचना थी।
उनकी साहित्यिक उपलब्धियों की अनेक दिशाएँ हैं। वे कवि थे, उन्होंने हिंदी गद्य की विभिन्न विधाओं की श्रीवृद्धि भी की। उन्होंने राधा-कृष्ण की लीलाओं, प्रकृति-सौंदर्य और ब्रज की संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर काव्य-रचना की। कविता में उनका उपनाम ‘मंजु’ था। 

गोस्वामी जी साहित्यकार ही नहीं पत्रकार भी थे। उन्होंने वृंदावन से ‘भारतेंदु’ मासिक पत्र का संपादन-प्रकाशन किया था। इसका प्रकाशन 3 वर्ष 5 माह तक हुआ। व्यय अधिक होने के कारण इसे बंद करना पड़ा।
1910 ई. 1920 ई. तक वृन्दावन से ही ‘श्रीकृष्ण चैतन्य चंद्रिका, नाम से एक धार्मिक मासिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन किया।

राधारचरण गोस्वामी जी सर्वधर्म समान भाव सिद्धांत के प्रतीक थे। वे श्रीराधारमण जी के अनन्य उपासक और ब्रह्म माध्व गौड़ीय संप्रदाय के मुख्य आचार्य होने के बावजूद भी उनमें किसी अन्य धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय के प्रति दुराग्रह नहीं था। उन्होंने अपने जीवन चरित के नौवें पृष्ठ पर स्वयं लिखा है- “मैं एक कट्टर वैष्णव हिंदू हूँ। अन्य धर्म अथवा समाज के लोगों से विरोध करना उचित नहीं समझता। बहुत से आर्यसमाजी, ब्रह्मसमाजी, मुसलमान, ईसाई मेरे सच्चे मित्र हैं और बहुधा इनके समाजों में जाता भी हूँ।”

राधाचरण गोस्वामी की काव्य रचनाएँ-

नवभक्त माल, दामिनी दूतिका (खंडकाव्य), शिशिर सुषमा, इश्क चमन, भ्रमरगीत, बारहमासी, निपटनादान, विधवा विलाप, प्रेम बगीची, भारत संगीत, भूमाहरण प्रार्थना

राधाचरण गोस्वामी जी के नाट्य रचनाएँ-

सुदामा चरित नाटक, सती चंद्रावली, अमर सिंह राठौर
, तन मन धन सब गोसाई जी के अर्पण

 राधाचरण गोस्वामी जी ने समस्या प्रधान मौलिक उपन्यास लिखे- बाल विधवा- (1883-84 ई.), सर्वनाश- (1883-84 ई.), अलकचन्द (अपूर्ण 1884-85 ई.), विधवा विपत्ति (1888 ई.), वीरबाला’ (1883-84 ई.) यह ऐतिहासिक उपन्यास है।

उन्होंने ‘बिरजा’, ‘जावित्री’ और ‘मृण्मयी’ नामक उपन्यासों के अनुवाद बंगभाषा में किये है। लघु उपन्यासों को वे ‘नवन्यास’ कहते थे। ‘कल्पलता’ (1884-85 ई.) और ‘सौदामिनी’ (1890-91 ई.) उनके मौलिक सामाजिक ‘नवन्यास’ हैं। प्रेमचन्द के पूर्व ही गोस्वामी जी ने ‘समस्यामूलक’ उपन्यास लिखकर हिन्दी में नई धारा का प्रवर्त्तन किया था।

पंडित ‘बालकृष्ण भट्ट’ और ‘हिंदी प्रदीप’ ने पंडित राधाचरण गोस्वामी को हिंदी के साढ़े तीन लेखकों में से एक माना था। उन्होंने ‘हिंदी प्रदीप’ के जनवरी-फरवरी और मार्च 1894 ई. (जिल्द 17 संख्या 5, 6 और 7) में कहा था कि हिंदी के साढ़े तीन सुलेखक थे- बाबू हरिश्चंद्र, ब्रह्मण मासिक पत्र के संपादक प्रतापनारायण मिश्र और राधाचरण गोस्वामी, आधा पीयूस प्रवाह के संपादक अंबिकादत्त व्यास।

विचारों की उग्रता और प्रगतिशीलता में वे अपने युग के अन्य सभी लेखकों से बहुत आगे था। वे प्रखर क्रांतिकारी साहित्यकार थे, प्रखर राष्ट्र-चिन्तक, साहित्य और समय की धारा को मोड़ देनेवाले युगद्रष्टा कथाकार थे।

उपन्यास विधा के अग्रदूत: हिंदी साहित्य में अक्सर यह विमर्श होता है कि समस्यामूलक उपन्यासों का आरंभ किसने किया? 'मीमांसा' के माध्यम से हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि प्रेमचंद जी से बहुत पहले, गोस्वामी जी ने 'बाल विधवा' (1883) और 'विधवा विपत्ति' जैसे उपन्यासों के माध्यम से समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया था। वे हिंदी के प्रथम समस्यामूलक उपन्यासकार थे। इतना ही नहीं, 'वीरबाला' के माध्यम से उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यास की नींव भी रखी।

नाट्य कला और 'मंजु' की काव्य-धारा: 'सती चंद्रावती', 'अमर सिंह राठौर' और 'सुदामा' जैसे उनके नाटक आज भी शास्त्रीयता और लोक-रंजन के अद्भुत मिश्रण हैं। कविता की दुनिया में वे 'मंजु' उपनाम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते थे। ब्रजभाषा के प्रति उनका अगाध प्रेम था।

एक रोचक तथ्य: गोस्वामी जी खड़ी बोली पद्य के मुखर विरोधी थे। उनकी यह चिंता भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक थी। उन्हें भय था कि खड़ी बोली के बहाने उर्दू का प्रभाव बढ़ेगा और हमारी मूल भारतीय संस्कृति धुंधली पड़ सकती है। यह उनकी अपनी भाषा और मिट्टी के प्रति गहरी संवेदनशीलता का ही परिचायक था।

राजनीतिक चेतना और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण
एक धर्माचार्य का राजनीति में सक्रिय होना आज भले ही सामान्य लगे, किंतु उस दौर में गोस्वामी जी ने जो उदाहरण प्रस्तुत किए, वे विस्मयकारी हैं। वे कांग्रेस के आजीवन सदस्य रहे और 1888 से 1894 तक मथुरा कांग्रेस समिति के सचिव के रूप में कार्य किया।
राष्ट्रनेताओं के प्रति उनके सम्मान का एक ऐसा प्रसंग है जो हमारी आंखों को नम कर देता है। जब 'पंजाब केसरी' लाला लाजपत राय वृंदावन आए, तो एक श्रेष्ठ आचार्य होने के बावजूद गोस्वामी जी ने उनकी बग्घी के घोड़ों को हटाकर स्वयं उसे खींचा। यह उनके भीतर के उस विनम्र सेवक का दर्शन था, जो राष्ट्र के सेनानियों को देवताओं से भी ऊपर मानता था।
क्रांतिकारियों के प्रति उनका प्रेम अटूट था। 1911 में जब रासबिहारी बोस उनसे मिलने आए, तो भावुक होकर गोस्वामी जी की आँखों से अश्रु छलक आए। यह मिलन धर्म और क्रांति के मिलन का ऐतिहासिक क्षण था।

समाज सुधार और नगरपालिका में भूमिका

वे केवल कलम के सिपाही नहीं थे, अपितु कर्मयोगी भी थे। वृंदावन नगरपालिका के सदस्य के रूप में उन्होंने नगर के विकास के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। आज हम जिन कुंज गलियों की चर्चा करते हैं, उनमें से छह पक्की सड़कों का निर्माण उन्हीं की दूरदर्शिता का परिणाम था। उन्होंने सिद्ध किया कि एक साहित्यकार यदि चाहे, तो शासन और प्रशासन में रहकर धरातल पर भी परिवर्तन ला सकता है।

उपसंहार: एक युगांतकारी अवसान

12 दिसंबर, 1925 को हिंदी साहित्य का यह चमकता सितारा भौतिक रूप से हमसे विदा हो गया। किंतु उनका कार्य, उनकी शुचिता और उनकी समावेशी दृष्टि आज भी प्रासंगिक है। वे ब्रह्म समाज के विचारों से भी प्रभावित हुए, जिसका अर्थ है कि वे सत्य की खोज में संकुचित सीमाओं को लांघने का साहस रखते थे।
'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक के माध्यम से हम आज की युवा पीढ़ी का आह्वान करते हैं कि वे राधाचरण गोस्वामी जैसे मनीषियों के जीवन को पढ़ें। वे हमें सिखाते हैं कि अपनी परंपराओं पर गर्व करते हुए भी आधुनिक कैसे बना जा सकता है।
साहित्य और राष्ट्र के इस अनन्य साधक को हमारा शत-शत नमन!

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह सामग्री केवल साहित्यिक एवं शैक्षिक जानकारी हेतु है। लेख में प्रस्तुत तथ्य ऐतिहासिक अभिलेखों और शोध पर आधारित हैं। पाठक किसी भी विशिष्ट संदर्भ के लिए मूल ग्रंथों का मिलान अवश्य करें। हमारा उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसार करना है, किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं।

कॉपीराइट चेतावनी (Copyright Policy)

इस आलेख की विशिष्ट संरचना, संपादन और प्रस्तुति शैली के सर्वाधिकार 'मीमांसा' के पास सुरक्षित हैं।
अनुमति: बिना लिखित अनुमति के इस सामग्री का व्यावसायिक उपयोग वर्जित है।
साझाकरण: गैर-व्यावसायिक उपयोग के लिए इसे साझा करते समय 'मीमांसा' को श्रेय (Credit) देना अनिवार्य है।
उल्लंघन: कॉपीराइट के अनधिकृत उल्लंघन पर कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।

Comments

Popular posts from this blog

भारतीय साहित्यों में नायिका भेद और वर्तमान नारी अस्मिता - वेब पत्रिका 'मीमांसा' का वागेश्वरी स्तंभ विशेषांक।

व्यवस्था की विसंगतियों का दरबारी चितेरा : श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी की शाश्वत गूँज

संपादकीय : साहित्यिक शुचिता की मीमांसा और 'दिनकर' के नाम पर "ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं" के छद्म प्रसार का सत्य