स्वतंत्रता का मंत्र – वंदे मातरम्




प्रस्तावना
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम इतिहास में वंदे मातरम् केवल एक गीत या कुछ शब्दों का समूह नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसा दिव्य मंत्र बना जिसने सदियों की दासता में जकड़े भारतीय जनमानस के भीतर राष्ट्रप्रेम की अग्नि प्रज्वलित की। यह वह स्वर था जिसने शोषण, भय और निराशा के अंधकार में आशा का दीप जलाया। महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में रचित यह गीत भारत की प्राकृतिक सुंदरता के चित्रण से कहीं आगे बढ़कर राष्ट्र को एक सजीव, करुणामयी और शक्तिशाली माँ के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
वंदे मातरम् वह भाव बना, जिसने धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक अखंड और सशक्त भारत की चेतना को जन्म दिया।

विविधता में एकता का प्रतीक
भारत विश्व का एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जहाँ की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यहाँ सच ही कहा गया है “कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी।” इतनी भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों के बावजूद भारत एक राष्ट्र के रूप में खड़ा है। इस विशाल और विविध समाज को एक सूत्र में बाँधना आसान नहीं था, किंतु वंदे मातरम् के उद्घोष ने इस चुनौती को सहज बना दिया।
1905 के बंगाल विभाजन के विरुद्ध उठे जनांदोलन में जब लाखों लोग सड़कों पर उतरे, तब उनके होठों पर एक ही स्वर था वंदे मातरम्। इस मंत्र ने उत्तर में हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी के समुद्र तट तक, पश्चिम के रेगिस्तान से लेकर पूर्व की पहाड़ियों तक, हर भारतीय के हृदय में एक समान राष्ट्र-स्पंदन पैदा किया।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और प्रकृति का वंदन
वंदे मातरम् भारतीय संस्कृति के उस मूल भाव को अभिव्यक्त करता है, जहाँ राष्ट्र और प्रकृति को दैवीय माना गया है। गीत की अमर पंक्तियाँ
“सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामलाम् मातरम्”
भारत की उर्वर भूमि, जीवनदायिनी नदियों, शीतल वायु और हरियाली से भरे खेतों का वंदन करती हैं। यह स्पष्ट करती हैं कि भारतीय संस्कृति में मिट्टी केवल भूमि नहीं, बल्कि पूज्य तत्व है।
यह गीत किसी एक धर्म, संप्रदाय या वर्ग का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की आस्था है जो इस धरती से जुड़ा है। यह हमें सिखाता है कि हमारी पूजा-पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं, भाषाएँ भिन्न हो सकती हैं, लेकिन हमारी माँ भारत माता एक है। यही भाव भारत की ‘विविधता में एकता’ को वैश्विक स्तर पर अद्वितीय बनाता है।

क्रांतिकारियों की संजीवनी
स्वतंत्रता आंदोलन के कठिन और दमनकारी दौर में ‘वंदे मातरम्’ क्रांतिकारियों के लिए संजीवनी सिद्ध हुआ। लाला लाजपत राय ने इसी नाम से उर्दू दैनिक पत्र निकाला, जबकि अरबिंदो घोष ने इसे ‘राष्ट्रीयता का मंत्र’ घोषित किया। जलियांवाला बाग के रक्तरंजित मैदान से लेकर साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शनों तक, हर संघर्ष में यही स्वर गूँजता रहा।
इतिहास साक्षी है कि फाँसी के फंदे को चूमते समय खुदीराम बोस, अशफाकउल्ला खां और भगत सिंह जैसे वीरों के होंठों पर भी यही मंत्र था। इसने शिक्षित वर्ग और अनपढ़ किसानों के बीच की दूरी मिटा दी और सभी को राष्ट्र-मुक्ति के एक साझा उद्देश्य से जोड़ दिया।

उपसंहार
आज के आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत में भी वंदे मातरम् की प्रासंगिकता अक्षुण्ण है। यह हमें निरंतर स्मरण कराता है कि हमारी विविधता ही हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। विविधता में एकता केवल संवैधानिक नारा नहीं, बल्कि हमारी सदियों पुरानी सांस्कृतिक चेतना की आत्मा है, जिसे वंदे मातरम् ने शब्दों में अमर कर दिया।
यदि हम वास्तव में इस मंत्र का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें ऐसा भारत बनाना होगा जो सशक्त, आत्मनिर्भर और आंतरिक रूप से पूर्णतः एकजुट हो जहाँ हर नागरिक गर्व से कह सके वंदे मातरम्।

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