साधारणता का जादुई वितान: विनोद कुमार शुक्ल की स्मृतियों में रची-बसी दुनिया

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के लिए साहित्य केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि उन मूल्यों की पुनर्स्थापना है जो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखते हैं। हमारा संकल्प है  'वर्चस्व नहीं, मूल्य-स्थापना'। इसी वैचारिक प्रखरता और रचनात्मक ईमानदारी के पथ पर चलते हुए, आज हम हिंदी साहित्य के उस 'ऋषि' को नमन कर रहे हैं, जिन्होंने सादगी को साहित्य का नया व्याकरण बना दिया।

1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे और अपनी लेखनी से वैश्विक क्षितिज पर छा जाने वाले विनोद कुमार शुक्ल (1937–2025) की आज जयंती है। यह अंक उनके उस जादुई संसार को समर्पित है, जहाँ मामूली वस्तुएं भी अपनी अनकही कहानियों के साथ उपस्थित होती हैं।

भाषा का विस्मय और जादुई यथार्थवाद

हिंदी साहित्य के विशाल आकाश में विनोद कुमार शुक्ल एक ऐसी घटना का नाम है, जिसने भाषा के भूगोल और संवेदना के इतिहास को पूरी तरह बदल दिया। जहाँ एक ओर समकालीन साहित्य शोर-शराबे और भारी-भरकम शब्दों के बोझ तले दबा जा रहा था, वहीं विनोद जी ने 'सादगी' को एक नई शक्ति के रूप में स्थापित किया। उनकी भाषा पारंपरिक व्याकरणिक जकड़न को किसी विद्रोह की तरह नहीं, बल्कि एक बच्चे की मासूमियत की तरह तोड़ती है।
‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ या ‘नौकर की कमीज़’ ये केवल शीर्षक नहीं, बल्कि उस जादुई तत्व के प्रवेश द्वार हैं जो साधारण को असाधारण बना देते हैं। वे उस दुनिया के चितेरे हैं जहाँ घर की दीवारें बोलती हैं और जहाँ एक मामूली क्लर्क की कमीज़ पूरे तंत्र की विसंगतियों को उघाड़ कर रख देती है। 'मीमांसा' मानती है कि उनका यथार्थ 'कठोर' नहीं बल्कि 'तरल' है, जो पाठक के मन में धीरे-धीरे रिसता है।

सृजन-यात्रा: लगभग जयहिंद से ज्ञानपीठ तक
विनोद जी का रचना-कर्म बहुआयामी है। 1971 में उनके पहले कविता संग्रह ‘लगभग जयहिंद’ से शुरू हुई यह यात्रा, 2024 में भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' तक पहुँची। उनके उपन्यासों ने हिंदी में एक मौलिक भारतीय उपन्यास की संभावना को नई राह दी। उन्होंने एक साथ लोकआख्यान और आधुनिक मनुष्य की अस्तित्वमूलक जटिल आकांक्षाओं को समाविष्ट कर एक नए कथा-ढांचे का आविष्कार किया।
चाहे वह ‘खिलेगा तो देखेंगे’ की दार्शनिकता हो या ‘पेड़ पर कमरा’ की मौलिकता, विनोद जी ने मध्यवर्गीय जीवन की बहुविध बारीकियों को अद्भुत कौशल के साथ उभारा है। उनकी रचनाओं पर बनी फिल्में, जैसे मणिकौल द्वारा निर्देशित 'नौकर की कमीज़', उनके विज़न की दृश्य-व्यापकता को सिद्ध करती हैं।

सादगी का गहरा दर्शन

विनोद जी के लेखन में 'असाधारणता' को खोजने के लिए किसी विशेष चश्मे की ज़रूरत नहीं है। वे छोटे-छोटे दृश्यों और रोजमर्रा के संवादों से जीवन के सबसे गूढ़ प्रश्न खड़े करते हैं।
 "सब कुछ होना बचा रहेगा" जैसी पंक्तियाँ यह भरोसा दिलाती हैं कि मशीनी होते जा रहे इस दौर में भी मनुष्यता की बची हुई स्मृतियाँ ही हमें बचाए रखेंगी।

कविताओं में मानवीय ऊष्मा: 
विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ किसी दार्शनिक बोझ से नहीं दबी हैं, बल्कि वे उस सहज करुणा की तलाश करती हैं जो आज के दौर में दुर्लभ है। संग्रह 'अतिरिक्त नहीं' की पंक्तियाँ इस रचनात्मक सादगी का चरम हैं : 

"मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।"


इसी तरह 'कवि ने कहा' संग्रह की पंक्तियाँ दुनिया के प्रति एक अटूट विश्वास को प्रतिध्वनित करती हैं। 
यह कविता अच्छाई के निरंतर प्रवाह का प्रतीक है। कवि यहाँ किसी भौगोलिक यात्रा पर नहीं, बल्कि 'भरोसे' की यात्रा पर है। यह पंक्तियाँ सिद्ध करती हैं कि साहित्य का काम केवल विसंगतियों को दिखाना नहीं, बल्कि मनुष्यता की संभावनाओं को बचाए रखना भी है। वे शब्दों का जाल नहीं बुनते, बल्कि शब्दों को इतना पारदर्शी बना देते हैं कि संवेदना आर-पार दिखाई दे सके।
विनोद जी का यह 'भोलापन' ही दरअसल उनकी सबसे बड़ी बौद्धिक शक्ति है, संख्या बल से ऊपर उठकर रचनात्मक ईमानदारी की ओर ले जाने की प्रेरणा देती है।

"दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है
कहकर मैं अपने घर से चला।
यहाँ पहुँचते तक
जगह-जगह मैंने यही कहा
और यहाँ कहता हूँ
कि दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है।
जहाँ पहुँचता हूँ
वहाँ से चला जाता हूँ।"

यहाँ कवि परिचय की औपचारिकताओं को दरकिनार कर 'सहयोग' के आदिम संस्कार को स्वर देता है। आधुनिक युग जहाँ 'पहचान' पर टिका है, वहीं विनोद जी का नायक 'व्यक्ति' को नहीं बल्कि 'मदद' की क्रिया को पहचानता है। यह बिना किसी वर्चस्व के, केवल मानवीय मूल्य की स्थापना है 

एक अलग ध्रुव: काशीनाथ से विनोद कुमार शुक्ल तक
साहित्यिक परिदृश्य में तुलना करें तो जहाँ काशीनाथ सिंह बनारस की गलियों की 'ठसक' और यथार्थ की 'खुरदरी' सतह पर खड़े हैं, वहीं विनोद कुमार शुक्ल 'शांति' और 'खामोशी' के लेखक हैं। यदि काशीनाथ जी की भाषा में 'ललकार' है, तो विनोद जी की भाषा में 'पुचकार' है। 'मीमांसा' अपने इस अंक में इन दोनों ध्रुवों के माध्यम से यह संदेश देना चाहती है कि हिंदी साहित्य जितना मुखर है, उतना ही अंतर्मुखी भी।

निष्कर्ष : स्मृतियों का कोना
विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ना अपनी ही खोई हुई मासूमियत को दोबारा पाने जैसा है। आज के हिंसक और जटिल समय में उनकी रचनाएँ एक 'सुरक्षित कोना' प्रदान करती हैं। 'मीमांसा' उन्हें केवल एक रचनाकार के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे मनीषी के रूप में याद करती है जिसने हमें शब्दों के पीछे छिपी हुई चुप्पी को पढ़ना सिखाया।
वे हमें याद दिलाते हैं कि जब तक हमारे पास 'देखने' की साफ़ दृष्टि है, तब तक यह दुनिया सुंदर बनी रहेगी। 'मीमांसा' परिवार की ओर से इस महान रचनाशिल्पी को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन

© संपादक, 
वेब पत्रिका, मीमांसा


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