गोदान का समाजशास्त्रीय अध्ययन
मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित 'गोदान' (1936) भारतीय साहित्य की वह कालजयी रचना है जिसे केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि तत्कालीन भारतीय ग्रामीण समाज का 'महाकाव्य' माना जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से 'गोदान' सामंतवाद के अंत और पूंजीवाद के आगमन के संधि-काल का जीवंत दस्तावेज है।
नीचे 'गोदान' का विस्तृत समीक्षात्मक समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत है:
1. ग्रामीण समाज की वर्ग संरचना और शोषण
'गोदान' का समाजशास्त्र मुख्य रूप से वर्ग-संघर्ष पर आधारित है। प्रेमचंद ने दिखाया है कि कैसे ग्रामीण समाज दो स्पष्ट वर्गों में विभाजित था:
* शोषक वर्ग: इसमें जमींदार (राय साहब), महाजन (साहूकार), और धार्मिक ठेकेदार (पंडित दातादीन) शामिल हैं।
* शोषित वर्ग: होरी, गोबर और धनिया जैसे किसान और भूमिहीन मजदूर।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से, यह उपन्यास 'ऋणग्रस्तता' (Indebtedness) के उस दुष्चक्र को उजागर करता है जिसमें किसान पैदा होता है, जीता है और मर जाता है। होरी की 'गाय' की लालसा केवल एक पशु की चाह नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और धार्मिक मुक्ति की छटपटाहट है।
2. जाति व्यवस्था और धार्मिक पाखंड
भारतीय समाज का समाजशास्त्र जाति के बिना अधूरा है। 'गोदान' में जाति व्यवस्था केवल सामाजिक विभाजन नहीं, बल्कि आर्थिक शोषण का एक हथियार है।
* पंडित दातादीन जैसे पात्र धर्म की आड़ में होरी का शोषण करते हैं।
* जब होरी के घर में मर्यादा का प्रश्न आता है, तो 'पंच' (जातीय पंचायत) उस पर भारी जुर्माना लगाकर उसे आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ देते हैं।
* सिलिया और मातादीन का प्रसंग जातिगत शुद्धता के पाखंड को उजागर करता है, जहाँ शारीरिक संबंध तो स्वीकार्य हो जाते हैं, लेकिन सामाजिक बराबरी नहीं।
3. संक्रमणकालीन समाज: सामंतवाद बनाम पूंजीवाद
उपन्यास में एक तरफ राय साहब हैं जो सामंती मूल्यों और आधुनिक विलासिता के बीच झूल रहे हैं, और दूसरी तरफ मिस्टर खन्ना हैं जो उभरते हुए उद्योगपति (पूंजीपति) का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* शहर और गाँव का द्वंद्व: प्रेमचंद ने गाँव (बेलारी और सेमरी) और शहर (लखनऊ) के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे शहर का पूंजीवाद गाँव के संसाधनों को सोख रहा है।
* मशीनीकरण और चीनी मिलों का आगमन ग्रामीण कुटीर व्यवस्था को नष्ट कर रहा है।
4. नारी की स्थिति और पितृसत्तात्मक समाज
समाजशास्त्रीय अध्ययन में धनिया एक अत्यंत सशक्त पात्र बनकर उभरती है। वह पितृसत्तात्मक समाज की उन रूढ़ियों को चुनौती देती है जिनसे होरी डरा रहता है।
* धनिया का जुझारूपन यह दर्शाता है कि भारतीय ग्रामीण महिला केवल सहिष्णु नहीं है, बल्कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की क्षमता भी रखती है।
* वहीं, मालती का चरित्र शहरी आधुनिक महिला के क्रमिक विकास को दिखाता है—जो 'तितली' से 'सेवा की देवी' बनती है।
5. कृषि संकट और 'सर्वहाराकरण' (Proletarianization)
'गोदान' का सबसे दुखद समाजशास्त्रीय पहलू किसान का मजदूर में बदल जाना है। होरी जीवन भर अपनी 'मर्यादा' और 'किसानी' को बचाने का प्रयास करता है, लेकिन अंततः वह एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में सड़क पर दम तोड़ देता है।
* यह प्रक्रिया समाजशास्त्र में 'वि-कृषकीकरण' कहलाती है।
* होरी की मृत्यु व्यक्तिगत हार नहीं, बल्कि तत्कालीन भारतीय कृषि व्यवस्था की सामूहिक विफलता है।
6. गोदान का प्रतीकात्मक महत्व
'गोदान' (गाय का दान) हिंदू धर्म में मोक्ष का मार्ग माना जाता है। समाजशास्त्रीय स्तर पर प्रेमचंद यह व्यंग्य करते हैं कि जिस किसान ने जीवन भर दूसरों को अन्न खिलाया, अंत समय में उसके पास 'गोदान' के लिए बीस आने भी नहीं हैं। धर्म और कर्मकांड कैसे गरीब को अंतिम समय तक निचोड़ते हैं, यह इसका सबसे क्रूर सत्य है।
मुख्य निष्कर्ष (Table)
उपसंहार
संक्षेप में, 'गोदान' का समाजशास्त्र परंपरा और आधुनिकता के बीच के संघर्ष का चित्रण है। यह बताता है कि कैसे सामाजिक संस्थाएं (जाति, धर्म, पंचायत) मिलकर एक व्यक्ति को कुचल देती हैं। होरी की मृत्यु भारतीय किसान की त्रासदी का शाश्वत दस्तावेज है, जो आज भी प्रासंगिक प्रतीत होता है।
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