महामना मदन मोहन मालवीय और हिंदी: एक भाषाई आंदोलन से जीवन मूल्यों के अनुशीलन तक
प्रस्तावना
भारतीय राष्ट्रवाद के आकाश में पंडित मदन मोहन मालवीय एक ऐसे नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी मेधा से धर्म, राजनीति, शिक्षा और पत्रकारिता को आलोकित किया। लेकिन इन सबसे इतर, उनका एक ऐसा व्यक्तित्व है जो 'हिंदी' और 'नागरी' के लिए समर्पित रहा। मालवीय जी के लिए हिंदी केवल एक भाषा नहीं थी, बल्कि वह भारत की अस्मिता, संस्कृति और आम जन की पीड़ा को स्वर देने वाली वाहिका थी। आज जब हम उनकी जयंती मना रहे हैं, तब यह आवश्यक है कि हम हिंदी के प्रति उनके उस अनुष्ठान को समझें जिसने आधुनिक भारत की भाषाई दिशा तय की।
1. नागरी आंदोलन और मालवीय जी का ऐतिहासिक संकल्प
19वीं सदी के उत्तरार्ध में उत्तर भारत की कचहरियों और सरकारी कार्यालयों में फारसी मिश्रित उर्दू का बोलबाला था। आम जनता, जो मुख्य रूप से देवनागरी और हिंदी भाषी थी, न्याय की प्रक्रिया से कटी हुई थी। मालवीय जी ने इसे एक महान अन्याय माना।
1897 में उन्होंने 'कोर्ट कैरेक्टर एंड प्राइमरी एजुकेशन इन नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस एंड अवध' नामक एक विस्तृत शोध पत्र तैयार किया। यह केवल एक ज्ञापन नहीं था, बल्कि हिंदी के पक्ष में दिया गया सबसे प्रबल तर्क था। उन्होंने आंकड़ों के साथ यह सिद्ध किया कि हिंदी और देवनागरी लिपि ही इस देश की वास्तविक जनभाषा है। उनके अथक प्रयासों का ही प्रतिफल था कि 18 अप्रैल, 1900 को तत्कालीन गवर्नर सर एंटोनी मैकडोनल ने देवनागरी को अदालती कार्यों में मान्यता प्रदान की। यह आधुनिक भारत के भाषाई इतिहास का वह मोड़ था, जिसने हिंदी को 'दरबारी' हाशिए से उठाकर 'संवैधानिक' केंद्र की ओर अग्रसर किया।
2. हिंदी पत्रकारिता: 'अभ्युदय' और 'मर्यादा' का उद्घोष
मालवीय जी जानते थे कि हिंदी को केवल सरकारी आदेशों से नहीं, बल्कि जन-चेतना से जीवित रखा जा सकता है। उन्होंने 1907 में 'अभ्युदय' साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया। इसके माध्यम से उन्होंने किसानों, मजदूरों और सामान्य नागरिकों की समस्याओं को हिंदी में उठाया।
बाद में उन्होंने 'मर्यादा' पत्रिका और 'लीडर' जैसे अंग्रेजी अखबार के साथ-साथ 'हिंदुस्तान' (हिंदी दैनिक) की नींव रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका संपादन कार्य केवल सूचना देना नहीं था, बल्कि हिंदी गद्य को संस्कारित करना भी था। वे भाषा की शुद्धता के साथ-साथ उसकी संप्रेषणीयता (Clarity) के भी प्रबल पक्षधर थे।
3. काशी हिंदू विश्वविद्यालय: हिंदी को मिला अंतरराष्ट्रीय मंच
मालवीय जी का सबसे बड़ा कीर्तिमान 'काशी हिंदू विश्वविद्यालय' (BHU) है। उन्होंने इस विश्वविद्यालय को हिंदी की साधना स्थली बनाया। उस समय जब शिक्षा का माध्यम केवल अंग्रेजी होना गर्व की बात मानी जाती थी, मालवीय जी ने हिंदी को उच्च शिक्षा और अनुसंधान की भाषा बनाने का स्वप्न देखा।
उन्होंने विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की स्थापना की और बाबू श्याम सुंदर दास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे मनीषियों को यहाँ आमंत्रित किया। उनके प्रयासों से हिंदी को अकादमिक गरिमा प्राप्त हुई और पहली बार विज्ञान, दर्शन और वाणिज्य जैसे विषयों पर हिंदी में मौलिक लेखन और अनुवाद के कार्य प्रारंभ हुए।
4. मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र: मूल्यों का जीवंत संग्रहालय
मालवीय जी के विचारों और हिंदी के प्रति उनके अनुराग को केवल इतिहास तक सीमित न रखकर, उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 'मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र' (Malaviya Centre for Ethics and Values) की स्थापना की गई।
यह केंद्र मालवीय जी के उन सात मूल्यों— सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति, आत्मत्याग, सेवा और सौहार्द —पर शोध और प्रसार का कार्य करता है।
हिंदी भाषा के संदर्भ में इस केंद्र का योगदान अतुलनीय है:
* मूल्यपरक शिक्षा: यह केंद्र हिंदी माध्यम से युवाओं को नैतिक मूल्यों और भारतीय जीवन पद्धति से जोड़ने के लिए कार्यशालाएं आयोजित करता है।
* साहित्यिक संरक्षण: मालवीय जी के हिंदी भाषणों, पत्रों और लेखों का संकलन और प्रकाशन इसी केंद्र की देखरेख में हुआ है, जो हिंदी शोधार्थियों के लिए एक निधि है।
* चारित्रिक विकास: मालवीय जी का मानना था कि "भाषा व्यक्ति के चरित्र का दर्पण है।" यह केंद्र हिंदी भाषा के माध्यम से चरित्र निर्माण के उन्हीं सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भों में परिभाषित कर रहा है।
5. हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान: एक सांस्कृतिक विमर्श
मालवीय जी के नारे 'हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान' को अक्सर संकुचित राजनीति के चश्मे से देखा जाता है, परंतु मालवीय जी के लिए इसके अर्थ अत्यंत व्यापक थे। उनके लिए 'हिंदू' एक समावेशी संस्कृति थी, 'हिंदी' एक जोड़ने वाली भाषा और 'हिंदुस्तान' एक अखंड राष्ट्र। उन्होंने हिंदी को कभी भी अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं खड़ा किया, बल्कि उन्होंने 'हिंदी साहित्य सम्मेलन' की स्थापना कर सभी भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय का सेतु बनाया।
6. वर्तमान प्रासंगिकता और विमर्श
आज जब हम 21वीं सदी में 'नई शिक्षा नीति' के माध्यम से मातृभाषा में शिक्षा की बात कर रहे हैं, तो हमें बोध होता है कि मालवीय जी सौ साल पहले ही इस सत्य को पहचान चुके थे। वे कहते थे कि "यदि हम अपनी भाषा में शिक्षा नहीं देंगे, तो हमारी मौलिकता समाप्त हो जाएगी।"
आलेख का सारांश: मुख्य बिंदु
| क्षेत्र | मालवीय जी का योगदान |
| न्यायपालिका | 1900 में अदालतों में देवनागरी को आधिकारिक मान्यता दिलाई। |
| शिक्षा | BHU के माध्यम से हिंदी को उच्च शिक्षा और शोध की भाषा बनाया। |
| पत्रकारिता | 'अभ्युदय' और 'मर्यादा' के जरिए हिंदी गद्य को सशक्त किया। |
| संस्थागत ढांचा | हिंदी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) की स्थापना में मुख्य भूमिका। |
| नैतिकता | मूल्य अनुशीलन केंद्र के माध्यम से हिंदी और मानवीय मूल्यों का समन्वय। |
उपसंहार
महामना मदन मोहन मालवीय जी का हिंदी प्रेम किसी भाषाई कट्टरता का परिणाम नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को पहचानने का प्रयास था। उन्होंने हिंदी को दरिद्रता के भाव से निकालकर गौरव के सिंहासन पर बैठाया। आज उनकी जयंती पर सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम हिंदी को केवल भावनाओं की भाषा न रहने दें, बल्कि उसे ज्ञान, विज्ञान, न्याय और रोजगार की भाषा बनाने का संकल्प लें।
मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र जैसे संस्थान हमें याद दिलाते हैं कि भाषा और मूल्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। महामना का जीवन संदेश आज भी गूँज रहा है। भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने ठीक हीं कहा था "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।"
नोट
यह 'मीमांसा' ब्लॉग के लिए महामना मालवीय जी और हिंदी भाषा पर एक विस्तृत, विमर्शपूर्ण और शोधपरक आलेख है। इसमें उनके ऐतिहासिक संघर्षों से लेकर मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र की वर्तमान प्रासंगिकता तक को समाहित किया गया है। इसे तैयार करने में एआई तकनीक की भी सहायता ली गई है।
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