यशपाल : क्रांति और कलम के सिपाही
प्रख्यात क्रांतिकारी और कथाकार यशपाल (3 दिसंबर 1903 - 26 दिसंबर 1976) की पुण्यतिथि के अवसर पर 'मीमांसा वेब' एक विशेष आलेख आपके लिए प्रस्तुत कर रही है।
भूमिका
हिन्दी साहित्य के आकाश में यशपाल एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपने जीवन के प्रथम सोपान में 'पिस्तौल' थामी और उत्तरार्ध में 'कलम' को अपना हथियार बनाया। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक साहित्यकार को याद करना नहीं है, बल्कि उस अदम्य जिजीविषा और वैचारिक स्पष्टता को याद करना है जिसने स्वाधीनता आंदोलन और आधुनिक हिन्दी उपन्यास को एक नई दिशा दी।
1. क्रांति की वेदी से लेखन की मेज तक
यशपाल का व्यक्तित्व विरोधाभासों का मेल नहीं, बल्कि एक क्रमिक विकास था। भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के सहयोगी रहे यशपाल ने 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) के सक्रिय सदस्य के रूप में ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। जब वे जेल गए, तो वहां उनके भीतर का लेखक जागा। उन्होंने महसूस किया कि जो परिवर्तन 'बम' से नहीं आ सकता, वह 'विचार' से संभव है।
2. 'झूठा सच': विभाजन की त्रासदी का महाकाव्य
यशपाल का कालजयी उपन्यास 'झूठा सच' हिन्दी साहित्य की वह धरोहर है, जिसके बिना विभाजन के इतिहास को समझना असंभव है। इस उपन्यास में उन्होंने केवल राजनीति नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के विखंडन को उकेरा है।
* वतन और देश: विभाजन की विभीषिका के दो खंडों में उन्होंने दिखाया कि कैसे भूगोल बदल जाने से इंसान की पहचान और जड़ें उखड़ जाती हैं।
3. सामाजिक यथार्थवाद और प्रगतिशील चेतना
यशपाल 'कला कला के लिए' के पक्षधर नहीं थे। उनके साहित्य में मार्क्सवादी चेतना और सामाजिक सरोकार मुखर हैं। 'दिव्या', 'अमिता' और 'दादा कॉमरेड' जैसे उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने धर्म, सत्ता और नैतिकता के पुराने मानदंडों को चुनौती दी। उन्होंने नारी अस्मिता और मध्यवर्गीय विसंगतियों पर जो चोट की, वह आज भी प्रासंगिक है।
4. कलम की निर्भीकता
उनकी कहानियों (जैसे 'पर्दा', 'फूलों का कुर्ता') में आम आदमी की विवशता और समाज का ढोंग साफ झलकता है। यशपाल ने कभी भी सत्य से समझौता नहीं किया, चाहे वह जेल की सलाखें हों या साहित्य की दुनिया में होने वाले वैचारिक मतभेद।
"यशपाल के लिए लिखना एक बौद्धिक विलासिता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक अनिवार्य औजार था।"
निष्कर्ष
यशपाल आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी 'कलम' की गूँज 'झूठा सच' के पन्नों में और 'क्रांति' की मशाल उनके वैचारिक विमर्श में आज भी जल रही है। एक सच्चा 'कलम का सिपाही' वही है जो मरकर भी अपने विचारों के माध्यम से समाज को झकझोरता रहे।
पुण्यतिथि पर शत-शत नमन!
Comments
Post a Comment