जुही की कली, सरस्वती और निराला : हताशा से अमरता तक का सफर
प्रिय पाठकगण आज के मीमांसा के विशेषांक में हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के जीवन का वह दौर जो साहित्य के इतिहास में 'संघर्ष और सृजन' की एक बेमिसाल दास्तान है।
भूमिका
हिन्दी साहित्य के आकाश में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी आभा से न केवल छायावाद को आलोकित किया, बल्कि कविता के व्याकरण को भी बदल डाला। लेकिन इस 'महाप्राण' के 'महामानव' बनने की राह फूलों की सेज नहीं थी। यह कहानी है उस हताशा की, जिसने एक कवि को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन अंततः उसे कालजयी बना दिया। इस कहानी के केंद्र में है एक कालजयी कविता जुही की कली, एक प्रतिष्ठित पत्रिका 'सरस्वती' और एक युगद्रष्टा संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी।
वह दौर और निराला का विक्षोभ
1916 के आसपास का वह समय था। निराला युवा थे, भीतर भावनाओं का ज्वार था और अभिव्यक्ति के लिए वे बेचैन थे। उन्होंने 'जुही की कली' की रचना की। यह कविता केवल शब्दों का चयन नहीं थी, बल्कि हिन्दी कविता में 'मुक्त छंद' का पहला शंखनाद था। निराला ने छंदों की बेड़ियाँ तोड़ दी थीं। वे परिपाटी से अलग हटकर कुछ ऐसा लिख रहे थे, जो उस समय के 'साहित्यिक अनुशासन' को चुनौती दे रहा था।
सरस्वती की दहलीज और अस्वीकार का दंश
उस समय 'सरस्वती' पत्रिका का संपादन आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी कर रहे थे। 'सरस्वती' में छपना उस दौर के लेखकों के लिए किसी प्रशस्ति-पत्र से कम नहीं था। निराला ने बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ 'जुही की कली' को प्रकाशन के लिए द्विवेदी जी के पास भेजा।
लेकिन परिणाम वह नहीं रहा जिसकी निराला ने अपेक्षा की थी। आचार्य द्विवेदी, जो भाषा की शुद्धता और छंदों की मर्यादा के सख्त हिमायती थे, उन्हें यह कविता रास नहीं आई। उन्होंने कविता को यह कहते हुए वापस लौटा दिया कि इसमें 'अश्लीलता' का पुट है और यह 'छंदबद्ध' नहीं है।
"एक युवा कवि के लिए, जिसने अपनी पूरी आत्मा उस रचना में झोंक दी हो, देश की सबसे बड़ी पत्रिका से मिला यह तिरस्कार किसी वज्रपात से कम नहीं था।"
हताशा का वह अंधकारमयी क्षण
निराला के जीवन में यह वह दौर था जब वे पारिवारिक और आर्थिक मोर्चों पर भी बुरी तरह टूटे हुए थे। पत्नी मनोहरा देवी का साथ छूट चुका था, और दरिद्रता द्वार पर खड़ी थी। 'सरस्वती' द्वारा कविता की वापसी ने उनकी साहित्यिक पहचान पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया था।
इतिहासकार बताते हैं कि उस समय निराला अत्यंत हताश थे। उनके मन में यह विचार भी आया कि क्या वे वास्तव में कवि बनने के योग्य हैं? क्या उनकी दृष्टि गलत है? वह हताशा केवल एक कविता की अस्वीकृति नहीं थी, बल्कि एक नई विचारधारा और शैली के प्रति पूरे समाज की अरुचि का संकेत थी।
हताशा से उपजा विद्रोह
निराला 'निराला' इसीलिए थे क्योंकि वे झुकना नहीं जानते थे। हताशा ने उन्हें अवसाद में धकेलने के बजाय एक नई ऊर्जा दी। उन्होंने महसूस किया कि यदि 'सरस्वती' के द्वार बंद हैं, तो उन्हें अपना रास्ता खुद बनाना होगा। उन्होंने द्विवेदी जी के प्रति कभी कटुता नहीं रखी, लेकिन अपनी कलात्मक स्वतंत्रता से समझौता भी नहीं किया।
'जुही की कली' बाद में अन्य पत्रिकाओं में छपी और उसने वह धमाका किया कि पूरा हिन्दी जगत स्तब्ध रह गया। जिस मुक्त छंद को 'केंचुआ छंद' कहकर चिढ़ाया गया था, वही आगे चलकर आधुनिक कविता की मुख्यधारा बना।
सरस्वती और निराला का मिलन
बाद के वर्ष समय का चक्र घूमा। निराला की प्रतिभा को कोई दबा न सका। बाद में आचार्य द्विवेदी ने भी निराला की शक्ति को पहचाना। निराला ने स्वयं स्वीकार किया था कि द्विवेदी जी के अनुशासन ने ही उन्हें अपनी भाषा को माँजने में मदद की। हताशा के उन क्षणों ने निराला को 'परिमल' और 'गीतिका' जैसी कृतियों को रचने का संबल दिया।
उपसंहार
मीमांसा के पाठकों के लिए संदेश निराला और सरस्वती का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सृजन कभी भी बंधनों का मोहताज नहीं होता। हताशा एक ठहराव हो सकती है, लेकिन वह अंत नहीं है। निराला अगर उस दिन द्विवेदी जी की अस्वीकृति से हार मान लेते, तो आज हिन्दी कविता के पास वह मुक्त गगन न होता जिसमें आज के कवि सांस ले रहे हैं।
जुही की कली आज भी उतनी ही सुगंधित है, जितनी 1916 में थी। यह कविता गवाह है कि जब एक कलाकार अपनी हताशा को अपनी शक्ति बना लेता है, तो वह इतिहास नहीं, बल्कि युग रचता है।
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