प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का बौद्धिक स्खलन : वागर्थ के आवरण पर 'मीमांसा' की संपादकीय आलेख
भूमिका
साहित्य और पत्रकारिता का अंतर्संबंध केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के सांस्कृतिक मानस का दर्पण होता है। जब कोई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका अपने आवरण (Cover Page) का चयन करती है, तो वह केवल एक चित्र नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और युग-बोध को प्रदर्शित करती है। किंतु, जब शब्दों की साधना करने वाली संस्थाएँ बाज़ारवाद की चकाचौंध में अपनी 'दृष्टि' खोने लगें, तो मौन रहना बौद्धिक अपराध बन जाता है।
हाल ही में भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता की पत्रिका 'वागर्थ' के नवीनतम अंक (जनवरी-2026) ने अपने आवरण के माध्यम से एक ऐसा दृश्य-विमर्श प्रस्तुत किया है, जिसने साहित्य जगत में बेचैनी पैदा कर दी है। तकनीक और एआई (AI) की आड़ में जिस प्रकार की छवियों का प्रयोग किया गया है, वह न केवल सौंदर्यबोध का पतन है, बल्कि हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों और स्त्री की गरिमा पर एक आक्रामक प्रहार भी है।
'मीमांसा' का यह विश्लेषण उसी वैचारिक भटकाव की पड़ताल करता है, जहाँ आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता और तकनीक के नाम पर सांस्कृतिक प्रतीकों का विरूपण किया जा रहा है।
नीचे दिए गए बिंदु इस विद्रूपता के विभिन्न आयामों को रेखांकित करते हैं :
साहित्यिक पत्रकारिता केवल शब्दों का चयन नहीं, बल्कि एक युग की चेतना का दृश्य और वैचारिक दस्तावेजीकरण होती है। भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता जैसी प्रतिष्ठित संस्था से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'वागर्थ' के नवीनतम अंक (जनवरी-2026) का मुखपृष्ठ देखकर यह कहना कठिन है कि यह किसी गंभीर साहित्यिक विमर्श की परिचायक है या किसी बाजारू सनसनी की। पत्रिका के इस आमुख ने न केवल सुरुचिपूर्ण पाठकों को आहत किया है, बल्कि हमारी सभ्यतागत गरिमा और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति एक घिनौना दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया है।
गाॅंधी: राष्ट्रीय प्रतीक का दृश्य-विरूपण
महात्मा गाॅंधी भारतीय अस्मिता, अपरिग्रह और सादगी के शाश्वत प्रतीक हैं। आवरण के एक ओर बापू का सौम्य रेखाचित्र है, तो दूसरी ओर एक 'हाइपर-सेक्शुअलाइज्ड' (अति-कामुक) रोबोटिक स्त्री देह को खड़ा किया गया है। यह संयोजन न केवल दृश्य-असंतुलन पैदा करता है, बल्कि गाॅंधी के उन आदर्शों का क्रूर उपहास उड़ाता है जो देह-केंद्रित भोगवादी संस्कृति के विरुद्ध थे। गाॅंधी के राष्ट्रीय कद के सामने ऐसी कृत्रिम और वासना-प्रेरित छवि को रखना एक गहरे बौद्धिक दिवालियेपन और राष्ट्रीय अपमान की श्रेणी में आता है।
एआई के बहाने स्त्री देह का वस्तुकरण
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और कला-साहित्य पर केंद्रित इस अंक में तकनीक के दार्शनिक और मानवीय पक्षों पर बात होनी चाहिए थी। इसके विपरीत, संपादक ने एक ऐसी छवि का चयन किया जो स्त्री को मात्र एक 'उपभोग की वस्तु' (Objectification) के रूप में पेश करती है। यह 'साइबर-पोर्नोग्राफी' और पश्चिमी पितृसत्तात्मक दृष्टि से प्रेरित चित्रण है, जो भारतीय सभ्यता की मर्यादा और साहित्यिक शुचिता के पूर्णतः विरुद्ध है। क्या तकनीक की व्याख्या स्त्री के अंग-प्रदर्शन के बिना संभव नहीं थी?
साहित्यिक शुचिता और संस्थागत विफलता
एक ऐसी पत्रिका, जिसका कार्य भाषा और संस्कृति का संवर्धन करना है, उसके द्वारा इस प्रकार की 'दृश्य-विकृति' को प्रचारित करना चिंताजनक है। यह आवरण यह संकेत देता है कि अब साहित्य भी 'क्लिकबेट' और 'मार्केटिंग' के हथकंडों का शिकार हो चुका है। जहाँ गंभीर लेखकों और चिंतकों के नाम दर्ज हों, वहाँ ऐसा सतही और भोंडा आवरण पूरे अंक की वैचारिक महत्ता को धूमिल कर देता है।
निष्कर्ष :
यह केवल एक पत्रिका का आवरण नहीं, बल्कि हमारी वर्तमान साहित्यिक चेतना के पतन का साक्ष्य है। 'मीमांसा' इस वैचारिक कुरुपता की कड़े शब्दों में निंदा करती है। साहित्य को बाजार की अश्लील और अनैतिक दृष्टि से बचाना आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। यदि हम मौन रहकर गाॅंधी जैसे प्रतीकों और स्त्री की गरिमा के साथ इस खिलवाड़ को स्वीकार करते हैं, तो यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति सबसे बड़ा अन्याय होगा।
संपादक, मीमांसा
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