समय की नब्ज और बनारस का अक्स : काशीनाथ सिंह के बहाने बदलता यथार्थ जयंती विशेष संपादकीय आलेख।

प्रिय पाठकों, विचार-संरचना, वैचारिक तेवर और ‘मीमांसा’ की अस्मिता को अक्षुण्ण रखते हुए हम नये वर्ष में नये विमर्श की ओर बढ़ रहे हैं। पिछले वर्ष आप सभी सहृदय पाठकों की प्यार भरी प्रतिक्रियाएं व सुझाव आए। इस नये वर्ष में सृजन की स्याही से सुनहरे कल की पटकथा लिखने का समय आ गया है। नववर्ष केवल तिथि का परिवर्तन नहीं, बल्कि विचारों, संकल्पों और संभावनाओं के नवोन्मेष का उत्सव है। आज काशीनाथ सिंह के जन्मदिन पर विशेष संपादकीय आलेख आपको समर्पित करके हम अनुग्रहित महसूस कर रहे हैं।


जब साहित्य समय के साथ कदमताल करता है, तब वह महज़ शब्दों का विन्यास नहीं रह जाता, बल्कि अपने दौर का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज़ बन जाता है। डॉ. काशीनाथ सिंह की जयंती के अवसर पर उनके कृतित्व की मीमांसा करते हुए हम दरअसल उस ‘बनारसी ठसक’ और ‘यथार्थ की खुरदरी ज़मीन’ से रूबरू हो रहे हैं, जिसने हिंदी गद्य को किताबी अनुशासन की सीमाओं से बाहर निकालकर अस्सी के घाटों, चाय की अड़ियों और बेबाक बहसों के बीच ला खड़ा किया।

अस्सी: ब्रह्मांड का केंद्र और बदलता सूक्ष्म जगत 

काशीनाथ सिंह के लिए काशी महज़ एक भूगोल नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है एक जीवित समाज। उनके कालजयी उपन्यास काशी का अस्सी में यह उद्घोष स्पष्ट है :
“जहाँ पानी है, वहाँ जीवन है; जहाँ घाट है, वहाँ बाज़ार है।”

डॉ. सिंह का अस्सी वह ‘ब्रह्मांड का केंद्र’ है जहाँ प्रोफेसर, छात्र नेता, बेरोज़गार युवा और फक्कड़ आत्माएँ एक साथ बैठकर सामाजिक न्याय से लेकर वैश्विक राजनीति तक को अपनी देसी, ठेठ और तथाकथित ‘गपोड़ी’ शैली में परखते हैं। यही वह अस्सी है जहाँ बहसें केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से उपजी हुई होती हैं।

परंतु मीमांसा यहाँ एक ज़रूरी प्रश्न उठाती है क्या आज का अस्सी वही है?
डॉ. काशीनाथ सिंह ने बहुत पहले ही वैश्वीकरण और सांप्रदायिकता के उस उभार को चिन्हित कर लिया था, जिसने मानवीय रिश्तों को ‘पेइंग गेस्ट संस्कृति’ और मुनाफ़े की भाषा में बदल दिया। उनकी रचनाएँ सावधान करती हैं कि कैसे विदेशी प्रभाव और बाज़ारवादी सोच ने बनारस के आत्मिक और रूहानी ताने-बाने को धीरे-धीरे विकृत किया।

फक्कड़ भाषा और ‘अपना मोर्चा’ :

काशीनाथ सिंह की भाषा देहाती अवश्य है, किंतु वह किसी भी अकादमिक भाषा से अधिक धारदार और प्रभावी है। यह भाषा कबीर की परंपरा से चली आती है निडर, आत्मविश्वासी और पाखंड पर सीधा प्रहार करती हुई।
अपना मोर्चा के छात्र आंदोलनों से लेकर रेहन पर रग्घू की नैतिक उथल-पुथल तक, उन्होंने हमेशा हाशिए के आदमी और मध्यवर्गीय द्वंद्व को केंद्र में रखा।

साठोत्तरी पीढ़ी के इस महत्त्वपूर्ण रचनाकार के रूप में जहाँ वे रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह और ज्ञानरंजन जैसे ‘चार यारों’ की वैचारिक मंडली के सशक्त स्तंभ रहे। काशीनाथ सिंह ने हिंदी कथा-साहित्य को एक निर्णायक मोड़ दिया। उन्होंने रूमानी आवरण को चीरकर यथार्थ को उसके नग्न, असहज और अस्वीकार्य रूप में सामने खड़ा किया।

यादों की जुगाली : घर का जोगी जोगड़ा

संस्मरण के क्षेत्र में याद हो कि न याद हो और आछे दिन पाछे गए जैसी कृतियाँ केवल निजी स्मृतियाँ नहीं, बल्कि एक पूरे कालखंड का सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास हैं।
अपने बड़े भाई और प्रखर आलोचक डॉ. नामवर सिंह पर केंद्रित घर का जोगी जोगड़ा में साहित्यिक व्यक्तित्वों को मानवीय कमजोरियों और खूबियों के साथ जिस पारदर्शिता से प्रस्तुत किया गया है, वह हिंदी साहित्य में विरल उदाहरण है। यहाँ श्रद्धा है, पर अंधभक्ति नहीं; आत्मीयता है, पर मिथकीकरण नहीं।

निष्कर्ष :

काशीनाथ सिंह का लेखन हमें यह सिखाता है कि साहित्य को सुरक्षित, सजावटी और सुविधाभोगी नहीं होना चाहिए। उसे उस ‘खरोंच’ की तरह होना चाहिए जो व्यवस्था के चेहरे पर लगातार दिखाई देती रहे।

वेब पत्रिका मीमांसा इस जयंती विशेष अंक के माध्यम से उस अजेय रचनाकार को सादर नमन करती है, जिसने बनारस की तंग गलियों से वैश्विक विमर्श का रास्ता निकाला।
वे आज भी समय की नब्ज़ पर हाथ रखे हुए हैं और उनका साहित्य हमें आगाह करता है कि कहीं बाज़ार की चकाचौंध में हमारी अपनी ‘अस्सी’ हमारी सांस्कृतिक पहचान गुम न हो जाए।

मीमांसा की ओर से सादर,
संपादक


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