साठोत्तरी समाज के सारस्वत स्तंभ : रघुवीर सहाय का कवि-कर्म और भाषाई विवेक
वेब पत्रिका 'मीमांसा' की प्रस्तुति पुण्यतिथि विशेष
हिंदी साहित्य के आकाश में रघुवीर सहाय एक ऐसे नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से कविता के पारम्परिक 'शिखरों' को त्यागकर 'शहर के चौक' की धूल और जनसामान्य की सीढ़ियों को चुना। आज उनकी पुण्यतिथि पर 'मीमांसा' उनके कृतित्व का एक व्यवस्थित और गहन समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा है, जो साठोत्तरी भारत के यथार्थ, पत्रकारिता के भाषाई संयम और काव्य के मर्म का अनूठा संगम है।
जीवन-वृत्त और पत्रकारिता का संस्कार :
रघुवीर सहाय का जन्म ९ दिसम्बर १९२९ मृत्यु ३० दिसम्बर १९९०। वे हिन्दी के दूसरे तार सप्तक के कवि व पत्रकार थे।लखनऊ की उस मिट्टी में हुआ जहाँ की तहजीब में ही भाषा का सौंदर्य बसा था। १९५१ में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करने के उपरांत उन्होंने 'दैनिक नवजीवन' से अपनी पत्रकारिता यात्रा शुरू की। आगे चलकर 'प्रतीक', 'आकाशवाणी' और 'दिनमान' जैसे संस्थानों ने उनके भीतर के उस 'संवाददाता' को जीवित रखा, जो कविता को महज़ कोरी कल्पना नहीं बल्कि 'खबर' की तरह सटीक और वस्तुनिष्ठ बनाना चाहता था।
काव्य-भाषा : बोलचाल का नया मुहावरा
डॉ. विभावरी के अनुसार, रघुवीर सहाय नई कविता के उन प्रमुख कवियों में हैं जिन्होंने भाषाई विशिष्टता के माध्यम से इस आंदोलन को परिभाषित किया। उनकी काव्य-भाषा बोलचाल की उस सहजता से निर्मित है, जो रचना प्रक्रिया में समाहित होकर एक विशिष्ट साहित्यिक रूप धारण कर लेती है।
पत्रकारिता और कविता का समन्वय : सहाय जी ने पत्रकारिता की भाषा और काव्य-भाषा के बीच की दूरी को न्यूनतम कर दिया। उनकी कविताओं को इसी कारण ‘खबर की कविता’ भी कहा जाता रहा है।
गद्य और पद्य का अभेद : हिंदी कविता के इतिहास में वे ऐसे विरल कवि हैं जहाँ गद्य और पद्य की सीमा रेखा लगभग समाप्त हो जाती है। उनकी कविताएँ व्याकरणिक मानदंडों को तोड़कर बातचीत के स्तर पर पाठक से संवाद करती हैं।
"और कभी जब कभी गौरैया- सा मन
घर के आँगन में खेलने का हुआ
मैंने थामा हाथ उसे कह के बचपना न करो..." (अनिश्चय)
सपाटबयानी और व्यंग्य का प्रखर प्रहार :
रघुवीर सहाय की कविता में 'सपाटबयानी' एक हथियार की तरह प्रयुक्त होती है। वे सीधे प्रहार करते हैं, लेकिन उस सीधेपन में व्यंग्य की ऐसी धार होती है जो पाठक को बेचैन कर देती है। उनकी सुप्रसिद्ध कविता 'अधिनायक' इसी शैली का चरमोत्कर्ष है, जहाँ वे सत्ता के तामझाम और गरीब 'हरचरना' के फटा सुथन्ने के बीच के अंतराल को उघाड़ते हैं।
बौद्धिक ईमानदारी : संग्रह 'हँसों हँसों जल्दी हँसों' की कविताओं में वे बुद्धिजीवी वर्ग की विद्रूपताओं पर भी कड़ा प्रहार करते हैं। वे स्वयं को भी कठघरे में खड़ा करने का साहस रखते हैं, जो उनकी रचनात्मक ईमानदारी का प्रमाण है।
बिम्ब-विधान और वर्णनात्मकता का प्रजातंत्र :
रामस्वरूप चतुर्वेदी जी के अनुसार, रघुवीर सहाय ने वर्णन और बिम्ब के भेद को क्रमशः मिटाया है। उनके बिम्ब बोझिल या अपरिचित नहीं हैं, बल्कि वे सामान्य जीवन की वस्तुओं से गहरे अर्थ निकालते हैं।
दृश्य और अदृश्य का संगम : वे 'उजड़ी डालों के अस्थिजाल' जैसे नए बिम्बों का सृजन करते हैं जो न केवल कविता की अर्थवत्ता बढ़ाते हैं, बल्कि एक ताज़गी भी पैदा करते हैं।
प्रजातांत्रिक भाषा : उनकी भाषा किसी विशिष्ट वर्ग की बपौती न होकर उस 'दूसरे' (पाठक) के लिए साहस का पर्याय बनती है। जैसा कि वे स्वयं 'लोग भूल गए हैं' की भूमिका में कहते हैं "कविता वह साहस है, जो हमारे जाने बिना दूसरे को मिलता है।"
निष्कर्ष :
रघुवीर सहाय की समूची काव्य-यात्रा का केंद्रीय लक्ष्य एक ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था की निर्मिति था जहाँ शोषण, अन्याय और दासता के लिए कोई जगह न हो। वे जीवन के अंतिम क्षणों तक अपनी जिजीविषा को 'अपनी संतानों को कुत्ते की मौत मरने से बचाने' के संकल्प के साथ जोड़ते हैं।
आज के इस दौर में, जहाँ भाषा अक्सर शोर का हिस्सा बन जाती है, रघुवीर सहाय की 'प्रसादमय सहजता' और 'सजग तटस्थता' हमें याद दिलाती है कि साहित्य का मुख्य धर्म सत्ता से सवाल पूछना और मनुष्यता को बचाए रखना है। 'मीमांसा' उन्हें सादर नमन करती है।
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