इतिहास की परिधि पर खड़ा दामिन-ए-कोह विशेष आलेख : अमन कुमार होली
संथाल हूल के नायक सिदो-कान्हू को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में स्थान न मिलना केवल एक विस्मृति नहीं, बल्कि हमारी अकादमिक ईमानदारी पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। क्या भारतीय स्वतंत्रता का स्वप्न 1857 की बैरकपुर छावनी से ही शुरू हुआ था, या उसकी नींव बहुत पहले संथाल परगना की पहाड़ियों में रख दी गई थी?
भारतीय इतिहास लेखन की विडंबना रही है कि इसने अक्सर केंद्र (राजधानियों) को प्राथमिकता दी और परिधि (जंगलों-पहाड़ों) के संघर्षों को स्थानीय विद्रोह की श्रेणी में डाल दिया। इसी का परिणाम है कि आज देश का विद्यार्थी मंगल पांडे और झांसी की रानी से तो परिचित है, लेकिन 1855 के संथाल हूल के महानायक सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो- झानो, मुर्मू बंधु व बहनें और अन्य संथाली व स्थानीय क्रांतिकारी उसके लिए मात्र एक फुटनोट बनकर रह गए हैं। प्रश्न यह नहीं है कि वे इतिहास की किताबों में हैं या नहीं; प्रश्न यह है कि वे हमारी सामूहिक चेतना और औपचारिक विमर्श का हिस्सा क्यों नहीं हैं?
संघर्ष का भूगोल: दामिन-ए-कोह
इस विमर्श के केंद्र में है दामिन-ए-कोह। 1832 में अंग्रेजों द्वारा संतालों के लिए आरक्षित की गई यह पहाड़ियों की गोद दरअसल एक ऐसा कुरुक्षेत्र थी, जहाँ औपनिवेशिक सत्ता, महाजनी कुचक्र और आदिवासी स्वाभिमान के बीच त्रिकोणीय संघर्ष हुआ। जब जल, जंगल और जमीन पर फिरंगियों का कब्जा होने लगा और ऋण की बेड़ियाँ संतालों के अस्तित्व को निगलने लगीं, तब 30 जून 1855 को भोगनाडीह की धरती से संताल भाइयों ने हुंकार भरी थी। यह विद्रोह आकस्मिक नहीं था; यह एक सुव्यवस्थित राजनीतिक चेतना का परिणाम था, जिसने पहली बार घोषणा की थी अब कंपनी का राज नहीं चलेगा।
पाठ्यक्रम की अभिजात राजनीति
हैरानी की बात यह है कि जो विद्रोह 1857 की क्रांति से दो वर्ष पूर्व ही ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला चुका था, उसे राष्ट्रीय दर्जा देने में आज भी हिचकिचाहट दिखाई देती है। इसके पीछे पाठ्यक्रम की एक अंतर्निहित राजनीति है। क्या इसलिए कि यह संघर्ष संस्कृतनिष्ठ नहीं था? क्या इसलिए कि इसका नेतृत्व करने वाले लोग अंग्रेजी या हिंदी नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा 'संताली' में संवाद कर रहे थे?
जब हम स्वतंत्रता संग्राम को केवल राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण के रूप में देखते हैं, तब सिदो-कान्हू गौण हो जाते हैं। लेकिन जब हम इसे सांस्कृतिक और पारिस्थितिक संप्रभुता (Ecological Sovereignty) की लड़ाई के रूप में देखते हैं, तो सिदो-कान्हू आधुनिक भारत के सबसे पहले और सबसे बड़े नायक बनकर उभरते हैं।
मौन की संस्कृति और हमारा दायित्व
आज जब पूरा देश आजादी का अमृत काल मना रहा है और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों पर वैश्विक बहस छिड़ी है, तब सिदो-कान्हू की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। उन्हें पाठ्यक्रम से बाहर रखना नई पीढ़ी को उस लोकतांत्रिक शिक्षा से वंचित रखना है, जो सिखाती है कि सत्ता को चुनौती देने के लिए महलों का होना जरूरी नहीं, अटूट संकल्प और जन-भागीदारी ही काफी है।
साहित्य और इतिहास के गलियारों में पसरी यह चुप्पी दरअसल एक प्रकार का बौद्धिक दमन है। यदि हम चाहते हैं कि भारतीय राष्ट्र की कल्पना समावेशी हो, तो हमें इतिहास को दिल्ली और कलकत्ता की गलियों से निकालकर साहिबगंज, पाकुड़ और दुमका की उन पगडंडियों तक ले जाना होगा, जहाँ आज भी हवाओं में सिदो-कान्हू का नाम गूँजता है।
निष्कर्षतः, सिदो-कान्हू को पाठ्यक्रम में शामिल करना किसी एक समुदाय के प्रति तुष्टीकरण नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की नैतिक पुनर्रचना है। जब तक दामिन-ए-कोह का संघर्ष हमारे बच्चों की पाठ्यपुस्तकों के मुख्य अध्यायों में नहीं चमकेगा, तब तक देश की आजादी का इतिहास अधूरा ही रहेगा। अब समय आ गया है कि हम अपनी बौद्धिक ईमानदारी का परिचय दें और इतिहास के इन विस्मृत नायकों को उनका वाजिब हक दिलाएं।
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