रश्मिरथी : हाशिए के पात्र का महानायकत्व और दिनकर का शब्द-शंखनाद

प्रिय पाठकगण वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस विशेषांक में प्रस्तुत है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर और उनकी कालजयी रचना 'रश्मिरथी' पर केंद्रित एक विशेष आलेख। यह आलेख कर्ण के संघर्ष, सामाजिक विमर्श और दिनकर की लेखनी के प्रवाह को समेटे हुए है।


महाभारत केवल एक युद्ध की गाथा नहीं है, बल्कि यह मानवीय प्रवृत्तियों, नैतिकता के द्वंद्व और सामाजिक विसंगतियों का एक ऐसा दर्पण है जिसमें हर युग अपना चेहरा देखता है। सदियों तक इस महागाथा को 'पांडव-केंद्रित' दृष्टि से पढ़ा गया, जहाँ अर्जुन शौर्य के प्रतीक थे और दुर्योधन की मित्रता में खड़ा कर्ण महज एक 'खलनायक' या 'अधर्मी'। लेकिन वर्ष 1952 में जब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की लेखनी से 'रश्मिरथी' (सूर्य की किरणों का रथ चलाने वाला) निःसृत हुई, तो हिंदी साहित्य और सामाजिक विमर्श में एक बड़ा बदलाव आया। दिनकर ने इतिहास के हाशिए पर खड़े एक 'गौण' पात्र को उठाकर महानायक के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

नियति से लड़ा एक योद्धा: जिसे समाज ने नकारा

कर्ण का व्यक्तित्व एक ऐसी त्रासदी है जिसे समाज ने जन्म से पहले ही त्याग दिया और जन्म के बाद पग-पग पर अपमानित किया। दिनकर जब रश्मिरथी की भूमिका लिखते हैं, तो वे स्पष्ट करते हैं कि कर्ण केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि उस हर व्यक्ति की आवाज है जिसे उसकी जाति, कुल या पृष्ठभूमि के कारण आगे बढ़ने से रोका गया।
समाज जिसे 'सूत-पुत्र' कहकर उपहास उड़ाता रहा, दिनकर ने उसे 'रश्मिरथी' कहकर महिमामंडित किया। वे लिखते हैं:
 "तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,
 पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।"

यह पंक्तियाँ उस समाज के मुँह पर तमाचा हैं जो आज भी योग्यता से ऊपर जन्म और प्रमाण-पत्रों को रखता है। दिनकर ने कर्ण के माध्यम से स्थापित किया कि श्रेष्ठता रक्त से नहीं, चरित्र और कर्म से तय होती है।

दिनकर की ओजस्विता: शब्द जो अंगारे बन गए

रामधारी सिंह दिनकर को 'अधैर्य का कवि' कहा जाता है। उनकी भाषा में वह ताप है जो पाठक के भीतर सोया हुआ लहू खौला दे। रश्मिरथी में दिनकर का प्रवाह किसी पहाड़ी नदी जैसा है अबाध और वेगवान। जब कर्ण और परशुराम का प्रसंग आता है या जब कृष्ण पांडवों का संदेश लेकर सभा में जाते हैं, तो पाठक केवल पढ़ता नहीं है, बल्कि उस दृश्य को घटित होते देखता है।
रश्मिरथी का तृतीय सर्ग 'कृष्ण की चेतावनी' हिंदी साहित्य की सबसे प्रभावशाली रचनाओं में से एक है। जब कृष्ण कहते हैं:
"दो न्याय अगर तो आधा दो, पर इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम।"

यहाँ दिनकर केवल शांति का संदेश नहीं दे रहे, बल्कि अन्याय के विरुद्ध उस अंतिम विकल्प की बात कर रहे हैं जिसे समाज अक्सर 'मजबूरी' समझ लेता है।

खलनायक या व्यवस्था का शिकार?

समाज ने अक्सर कर्ण को इसलिए खारिज किया क्योंकि वह दुर्योधन के साथ खड़ा था। लेकिन दिनकर ने इस मित्रता के पीछे के 'कृतज्ञता भाव' को उभारा। जिस समय पूरी दुनिया कर्ण को 'सूतपुत्र' कहकर अपमानित कर रही थी, उस समय दुर्योधन ने उसे अंगराज बनाया। एक तिरस्कृत व्यक्ति के लिए सम्मान देने वाला हाथ ही उसका ईश्वर हो जाता है।
दिनकर कर्ण को निर्दोष नहीं बताते, लेकिन वे समाज से सवाल पूछते हैं कि उसे उस राह पर धकेला किसने? कुंती का परित्याग, द्रोण का इनकार और इंद्र का छल—क्या यह सब मिलकर एक योद्धा को विद्रोही बनाने के लिए काफी नहीं थे?

दानवीरता: मृत्यु के द्वार पर भी अडिग

रश्मिरथी का सबसे मर्मस्पर्शी हिस्सा वह है जहाँ कर्ण अपनी मृत्यु को सामने देखते हुए भी अपना कवच-कुंडल दान कर देता है। उसे पता है कि इसके बिना वह वध योग्य हो जाएगा, फिर भी वह 'याचक' को खाली हाथ नहीं लौटाता। दिनकर यहाँ कर्ण को अर्जुन से कहीं बड़ा सिद्ध कर देते हैं। अर्जुन के पास कृष्ण का कवच था, लेकिन कर्ण के पास केवल उसका वचन था।
वे लिखते हैं:
"अतएव, सत्य ही है कि दान, वह नहीं जिसे हम देते हैं,
दान वह है, जिससे हम स्वयं को ही देते हैं।"

आज के संदर्भ में रश्मिरथी की प्रासंगिकता

आज जब हम 'विविधता' और 'समावेशन' (Inclusion) की बातें करते हैं, तो रश्मिरथी सत्तर साल पहले ही इसकी नींव रख चुकी थी। यह काव्य उन लोगों के लिए आईना है जो आज भी योग्यता को पहचान की राजनीति (Identity Politics) की भेंट चढ़ा देते हैं। कर्ण का संघर्ष आज के उस युवा का संघर्ष है जो छोटे शहर से आता है, जिसकी अंग्रेजी कमजोर है या जिसके पास कोई 'सरनेम' की शक्ति नहीं है।
दिनकर ने रश्मिरथी के माध्यम से संदेश दिया कि महानायक वह नहीं है जिसके साथ दैवीय शक्तियाँ हों, बल्कि महानायक वह है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी मनुष्यता और मर्यादा को बचाए रखे।

निष्कर्ष: एक अमर आख्यान

'रश्मिरथी' केवल एक खंडकाव्य नहीं, बल्कि आत्मगौरव का घोषणापत्र है। दिनकर ने कर्ण को महज एक पात्र से ऊपर उठाकर एक 'विचार' बना दिया। एक ऐसा विचार जो सिखाता है कि भले ही नियति आपके विरुद्ध हो, भले ही समाज ने आपको दुत्कारा हो, लेकिन आपका 'पुरुषार्थ' ही आपकी अंतिम पहचान है।
मीमांसा के पाठकों के लिए रश्मिरथी का पुनः पाठ इसलिए जरूरी है क्योंकि यह हमें सहानुभूति (Empathy) सिखाती है। यह हमें सिखाती है कि किसी को 'खलनायक' कहने से पहले उसकी परिस्थितियों के अंधेरे को समझना अनिवार्य है। दिनकर की यह कृति युगों-युगों तक गूँजती रहेगी क्योंकि जब तक अन्याय रहेगा, तब तक कर्ण जैसा विद्रोही और दिनकर जैसा कवि प्रासंगिक रहेगा।

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