पूर्वी क्षितिज पर आज़ादी का सूर्योदय : नेताजी, जापान और आज़ाद हिंद फौज का महासमर। शूरवीर स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख। खंड 3
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के गौरवशाली स्तंभ 'शूरवीर' के अंतर्गत 'देश प्रेम सप्ताह' की इस विशेष आलेख माला में आप सभी सुधी पाठकों का स्वागत है। आज तीसरे खंड में हम उस महागाथा का साक्षात्कार करेंगे, जिसने समूचे एशिया के भूगोल को बदल दिया और ब्रिटिश साम्राज्य की अपराजेयता के मिथक को सदैव के लिए ध्वस्त कर दिया। हम शूरवीर स्तंभ के जरिए उस विराट देशप्रेमी के शौर्य की गाथा सुना रहे हैं जिसके पराक्रम का समंदर भी गवाह बना। इतिहास जब करवट लेता है, तो वह केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं होता, बल्कि वह एक पूरी सभ्यता की चेतना का पुनर्जन्म होता है। 'देश प्रेम सप्ताह' के इस विशेष खंड में हम उन अनछुए और विचलित कर देने वाले सत्यों की ओर बढ़ेंगे, जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के कोमल हृदय को एक फौलादी योद्धा में बदल दिया। यह खंड केवल युद्ध की रणनीतियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उस 'ज्वाला' का वृत्तांत है जो नृशंसता की राख से राष्ट्रवाद का सूरज बनकर निकली।
नेताजी जानते थे कि जापान एक 'साम्राज्यवादी' शक्ति है और वह भारत की मदद केवल अपने स्वार्थ के लिए कर रहा है। इसीलिए, नेताजी ने जापान के प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो के सामने अत्यंत स्पष्ट और सख्त नीति रखी:
इस रेलवे पुल और मार्ग के निर्माण में हज़ारों ब्रिटिश, आस्ट्रेलियाई व भारतीय सैनिकों को युद्धबंदी के रूप में लगाया गया था। लेकिन जब नेताजी का पदार्पण हुआ, तो जापानी कैंपों में बंद इन सैनिकों की नियति बदल गई। जापान ने 'एशिया एशियावासियों का है' के नारे के साथ भारतीय सैनिकों को रिहा किया और नेताजी के आह्वान पर उन्हें भाईचारे और मुक्ति सेना का हिस्सा बनाया।
सिंगापुर में रासबिहारी बोस ने जब 'इंडियन इंडिपेंडेंस लीग' की कमान सुभाष चंद्र बोस के हाथों में सौंपी, तो वह एक ऐतिहासिक क्षण था। नेताजी ने देखा कि वहां हजारों भारतीय युद्धबंदी थे, जो दिशाहीन महसूस कर रहे थे। नेताजी ने अपनी मृदुल किंतु तार्किक वाणी से उनमें वह आत्मविश्वास भरा कि कल के 'बंदी' आज के 'मुक्तिदाता' बन गए।
नेताजी उस महिला के तर्क और साहस से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्काल विश्व की पहली महिला लड़ाकू इकाई 'रानी झाँसी रेजिमेंट' के गठन की घोषणा की। कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में इन 'रणचंडियों' ने सिद्ध किया कि भारत की नारी केवल त्याग की मूरत नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में साक्षात काल भी है।
उन्होंने सिद्ध किया कि भारत की बेटियाँ केवल चूल्हा-चौका नहीं संभालतीं, बल्कि वे भारत माता की बेड़ियाँ काटने के लिए हाथ में बंदूक उठाकर दुश्मन का सीना भी छलनी कर सकती हैं। यह नेताजी के आधुनिक और समतावादी दृष्टिकोण का प्रमाण था।
जब जापानी सेना ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को जीता, तो नेताजी ने उन्हें भारत की पहली स्वतंत्र भूमि के रूप में अधिग्रहित किया और उनका नाम 'शहीद' और 'स्वराज' द्वीप रखा। यह एक राजनेता की दूरदर्शिता थी कि वे युद्ध के मैदान में भी संप्रभुता के प्रतीक गढ़ रहे थे।
जब युद्ध के बाद INA के अधिकारियों पर लाल किले में मुकदमा चला, तो समूचा भारत सुलग उठा। रॉयल इंडियन नेवी में विद्रोह हो गया। अंग्रेजों को समझ आ गया कि अब भारत की सेना उनकी वफादार नहीं, बल्कि नेताजी की 'आज़ाद हिंद फौज' की अनुयायी बन चुकी है।
'मीमांसा' के माध्यम से हमारा उद्देश्य उसी वैचारिक क्रांति को जीवित रखना है। नेताजी का सैन्य अनुशासन, उनकी संगठन शक्ति और उनका अटूट राष्ट्रवाद आज के युवाओं के लिए वह मार्गदर्शिका है, जो हमें एक 'श्रेष्ठ भारत' बनाने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने शंघाई के गलियों से लेकर सुमात्रा के समुद्र तटों तक फैले हर भारतीय को यह महसूस कराया कि वे भी इस महान क्रांति के नायक हैं। उनकी शारीरिक मेहनत ने उन्हें एक सैनिक बनाया, तो उनकी वैचारिक साधना ने उन्हें 'नेताजी' के रूप में अमर कर दिया। उन्होंने हीं पहली बार भारतीय महिलाओं को आधुनिक सैन्य युद्धक प्रशिक्षण रानी झांसी रेजीमेंट के तहत दिया। उनके इसी दूरदर्शी दृष्टि ने आधुनिक भारतीय सेना और पुलिस सेवा में भारतीय महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की।
'मीमांसा' का यह खंड हमें याद दिलाता है कि आज़ादी की कीमत केवल अहिंसक आंदोलनों ने नहीं, बल्कि उन गुमनाम सैनिकों ने भी चुकाई थी जिन्हें firing squads के सामने खड़ा किया गया, जिन्हें जंगलों में घास खाकर लड़ना पड़ा और जिन्होंने नरभक्षण जैसी विभीषिकाओं के बीच भी 'जय हिंद' का नारा बुलंद रखा।
इतिहास की वीथिकाएँ साक्षी हैं कि संकल्प जब फौलादी हों, तो भौगोलिक दूरियाँ और संसाधनों का अभाव केवल तुच्छ बाधाएं बनकर रह जाते हैं। श्रृंखला के पिछले खंडों में हमने नेताजी के बर्लिन प्रवास और जर्मनी में उनके कूटनीतिक कौशल को समझा। लेकिन नियति ने नेताजी के लिए एक बड़ा रंगमंच तैयार कर रखा था 'एशिया और पैसिफिक' का रणक्षेत्र। आज का यह आलेख उस जाज्वल्यमान नेतृत्व को समर्पित है, जिसने पूर्वी एशिया की धरती से 'दिल्ली चलो' का वह शंखनाद किया, जिसकी प्रतिध्वनि आज भी हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाती है।
पनडुब्बी की वह रहस्यमयी यात्रा: मौत को मात देकर एशिया आगमन
फरवरी 1943 का समय था। द्वितीय विश्व युद्ध अपने चरम पर था और समूचा महासागर मित्र राष्ट्रों के रडारों और युद्धपोतों से भरा पड़ा था। ऐसे समय में नेताजी ने वह जोखिम लिया जिसकी मिसाल सैन्य इतिहास में मिलना दुर्लभ है। जर्मन पनडुब्बी U-180 से शुरू हुई यह 90 दिनों की यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का सफर नहीं था, बल्कि यह भारत की किस्मत बदलने का मार्ग था।
हिंद महासागर की लहरों के नीचे, दमघोंटू वातावरण में हफ़्तों बिताते हुए नेताजी का धैर्य और शांतचित्त स्वभाव उनके सन्यासी योद्धा होने का प्रमाण था। मेडागास्कर के पास, उफनते समुद्र के बीचों-बीच, एक पनडुब्बी से दूसरी जापानी पनडुब्बी (I-29) में जाना साक्षात मृत्यु को गले लगाने जैसा था। लेकिन जिस महानायक के हृदय में 30 करोड़ देशवासियों की आजादी का स्वप्न धधक रहा हो, उसे समंदर की लहरें क्या रोकतीं? जब वे टोक्यो पहुँचे, तो जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो उनके व्यक्तित्व के ओज से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए जापान के निस्वार्थ समर्थन की घोषणा कर दी।
नृशंसता का साक्षात्कार: फायरिंग स्क्वाड और अमानवीय यातनाएं
जापान और नेताजी के संबंधों को अक्सर सतही तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसकी गहराई उन विचलित कर देने वाले अनुभवों में छिपी थी जो भारतीय युद्धबंदियों ने सहे थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ रहे भारतीय सैनिकों को जब जापानियों ने बंदी बनाया, तो शुरूआती दौर में उनके साथ जो हुआ, वह मानवता के नाम पर कलंक था।
ऐतिहासिक दस्तावेजों और दुर्लभ साक्ष्यों से पता चलता है कि कई स्थानों पर जापानी सैनिकों ने भारतीय युद्धबंदियों का इस्तेमाल 'टारगेट शूटिंग' के लिए किया। जीवित मनुष्यों को खम्भों से बांधकर उन पर फायरिंग स्क्वायड द्वारा निशाना लगाने का अभ्यास किया जाता था। इससे भी भयावह थी 'कैनेबलिज्म' (नरभक्षण) की वे रिपोर्टें, जो युद्ध की विभीषिका में रसद की कमी के कारण सामने आईं। कई भारतीय सैनिकों को इन अमानवीय नृसंहारों का सामना करना पड़ा।
नेताजी ने जब इन घटनाओं के बारे में सुना, तो उनका हृदय करुणा और क्रोध से भर उठा। उन्होंने रासबिहारी बोस और कैप्टन मोहन सिंह द्वारा खड़ी की गई शुरुआती बुनियाद को एक ढाल में बदल दिया।
चीनी नानजिंग नरसंहार' से सीख: जापान के साथ स्पष्ट नीति
नेताजी एक भावुक देशभक्त होने के साथ-साथ एक अत्यंत यथार्थवादी राजनेता (Realist Statesman) थे। वे चीन के 'नानजिंग नरसंहार' (Nanking Massacre) की विभीषिका से भली-भांति परिचित थे, जहाँ जापानी सेना ने अकल्पनीय बर्बरता की थी।
नेताजी जानते थे कि जापान एक 'साम्राज्यवादी' शक्ति है और वह भारत की मदद केवल अपने स्वार्थ के लिए कर रहा है। इसीलिए, नेताजी ने जापान के प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो के सामने अत्यंत स्पष्ट और सख्त नीति रखी:
समान संप्रभुता: आज़ाद हिंद फौज जापानी सेना की 'भाड़े की सेना' (Mercenary Army) नहीं, बल्कि एक 'सहयोगी राष्ट्र की सेना' होगी।
भारतीयों का संरक्षण: जापानी शिविरों में बंद हर भारतीय युद्धबंदी को तत्काल प्रभाव से नेताजी के संरक्षण में दिया जाए।
स्वतंत्र प्रशासन: अंडमान-निकोबार जैसे मुक्त क्षेत्रों पर पूर्ण प्रशासनिक अधिकार केवल आज़ाद हिंद सरकार का होगा।
नेताजी की यह स्पष्टवादिता ही थी कि उन्होंने जापान को एक 'आक्रामक साम्राज्य' से 'मुक्तिदाता सहयोगी' के रूप में व्यवहार करने पर मजबूर कर दिया।
सिंगापुर का पतन और 'डेथ रेलवे' का निर्माण
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सिंगापुर का पतन (Fall of Singapore) ब्रिटिश साम्राज्य के इतिहास की सबसे शर्मनाक हार थी। जापानी सेना ने जिस गति से ब्रिटिश किलों को ढहाया, उसने पूरी दुनिया को चकित कर दिया। इसी दौर में 'डेथ रेलवे' का निर्माण शुरू हुआ, जो बर्मा (म्यांमार) को थाईलैंड से जोड़ने का एक विशाल उपक्रम था।
इस रेलवे पुल और मार्ग के निर्माण में हज़ारों ब्रिटिश, आस्ट्रेलियाई व भारतीय सैनिकों को युद्धबंदी के रूप में लगाया गया था। लेकिन जब नेताजी का पदार्पण हुआ, तो जापानी कैंपों में बंद इन सैनिकों की नियति बदल गई। जापान ने 'एशिया एशियावासियों का है' के नारे के साथ भारतीय सैनिकों को रिहा किया और नेताजी के आह्वान पर उन्हें भाईचारे और मुक्ति सेना का हिस्सा बनाया।
आज़ाद हिंद फौज का पुनर्गठन: बिखरी शक्तियों का संचयन
नेताजी ने अपनी नेतृत्व कौशल व शूरवीरता की नई परिभाषा लिखी 'इंसान से सैनिक' तक का सफर किया। कैप्टन मोहन सिंह और रासबिहारी बोस ने जिस पौधे को सींचा था, उन्होंने उसे एक विशाल वटवृक्ष बना दिया। सुभाष बाबू ने युद्धबंदियों की दयनीय स्थिति को आत्मसम्मान में बदल दिया। जो सैनिक कल तक यातना शिविरों में मौत की प्रतीक्षा कर रहे थे, नेताजी के एक आह्वान पर वे शेर की तरह दहाड़ने लगे।
नेताजी की संगठन शक्ति का कमाल था कि उन्होंने मज़हब, प्रान्त और जाति के आधार पर बँटी 'ब्रिटिश रेजिमेंट' को खत्म कर 'हिंदुस्तानी रेजिमेंट' बनाई। जहाँ लंगर में हिंदू, मुस्लिम और सिख एक साथ बैठकर भोजन करते थे। यह उस समय की सबसे बड़ी वैचारिक क्रांति थी।
उन्होंने 'आज़ाद हिंद फौज' (INA) को मात्र एक सेना नहीं, बल्कि एक 'अनुशासित राष्ट्र' के रूप में ढाला। यहाँ न कोई हिंदू था, न मुसलमान, न सिख यहाँ केवल 'भारतीय' थे। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज को एक आधुनिक सैन्य ढांचा प्रदान किया। इसमें 'सुभाष ब्रिगेड', 'गांधी ब्रिगेड' और 'नेहरू ब्रिगेड' जैसे खंड बनाए गए।
आज़ाद हिंद की गूँज: 'शुभ सुख चैन' और 'कदम-कदम बढ़ाए जा'
नेताजी का मानना था कि एक सेना बिना धुन और बिना गान के केवल सशस्त्र भीड़ है। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज को एक राष्ट्रीय पहचान देने के लिए एक ऐसे गान की कल्पना की, जो हर धर्म और भाषा के भारतीय को एक सूत्र में पिरो सके।
'शुभ सुख चैन' - आज़ाद हिंद का आधिकारिक राष्ट्रगान
नेताजी के निर्देश पर रवींद्रनाथ टैगोर के 'जन-गण-मन' को हिंदुस्तानी (हिंदी-उर्दू मिश्रित) रूप दिया गया। इसके बोल कैप्टन आबिद हसन सफरानी और मुमताज हुसैन ने लिखे, जबकि इसकी अमर और ओजस्वी धुन कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने तैयार की। जब आज़ाद हिंद सरकार के कार्यक्रमों में यह गान बजता था, तो सिंगापुर की फिजाओं में एक नई ऊर्जा का संचार होता था। यह गीत केवल शब्दों का मेल नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत की पहली आधिकारिक घोषणा थी।
इसी क्रम में, कैप्टन राम सिंह ठाकुर द्वारा रचित "कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा" केवल एक मार्चिंग गीत नहीं बना, बल्कि वह हर उस सैनिक की धड़कन बन गया जो अपने पीछे परिवार छोड़कर भारत की सीमाओं की ओर बढ़ रहा था। इन गीतों ने भूख, थकान और मौत के खौफ को पीछे धकेल कर जीत की भूख जगा दी।
टोक्यो के सितारे: हिदेकी तोजो और सम्राट हिरोहिटो
जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो और सम्राट हिरोहिटो ने नेताजी को एक 'राज्य के प्रमुख' (Head of State) का सम्मान दिया। तोजो नेताजी के जाज्वल्यमान व्यक्तित्व और उनकी स्पष्टवादिता के कायल थे। जापानी संसद (Diet) में तोजो ने आधिकारिक रूप से घोषणा की कि जापान भारत पर कब्ज़ा नहीं करना चाहता, बल्कि वह भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अपना रक्त बहाने को तैयार है। यह एक दुर्लभ कूटनीतिक विजय थी, जहाँ एक एशियाई शक्ति ने भारत की संप्रभुता को मान्यता दी।
प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो ने सिंगापुर की जीत के ठीक अगले दिन संदेश जारी किया था। जिसका उद्देश्य उन भारतीय सैनिकों का विश्वास जीतना था जो ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ रहे थे। इसी भरोसे की नींव पर आगे चलकर नेताजी ने जापान के साथ एक 'समान शक्ति' के रूप में हाथ मिलाया। यह रहा वह ऐतिहासिक संदेश
भारतीयों के नाम प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो का संबोधन
16 फरवरी, 1942
"आज भारत के पास अपनी हज़ारों साल पुरानी महान परंपराओं और गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने का सबसे उत्तम अवसर है। अब समय आ गया है कि भारत ब्रिटिश शासन के दमन से मुक्त होकर एक नए और समृद्ध 'पूर्वी एशिया' के निर्माण में अपनी भूमिका निभाए।
जापान की यह हार्दिक इच्छा है कि भारत फिर से अपना वह खोया हुआ सम्मान पाए जहाँ 'भारत केवल भारतीयों का हो'। हम भारत की आज़ादी के लिए किए जाने वाले आपके हर देशभक्तिपूर्ण प्रयास का निस्वार्थ भाव से समर्थन करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
परंतु, यदि भारत के लोग अपने इतिहास और परंपराओं का मोल नहीं समझेंगे, अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं होंगे और अंग्रेजों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर उनकी गुलामी को ही अपना भाग्य मान लेंगे, तो मुझे बहुत दुख के साथ कहना पड़ेगा कि भारत अपनी महान सभ्यता को फिर से स्थापित करने का यह स्वर्णिम अवसर हमेशा के लिए खो देगा।"
प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो
आज़ाद हिंद रेडियो: वैचारिक युद्ध का अस्त्र
युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि मस्तिष्क में भी लड़ा जा रहा था। नेताजी ने बर्लिन के अनुभवों को सिंगापुर में विस्तार दिया। 'आज़ाद हिंद रेडियो' के माध्यम से उन्होंने उन भारतीय सैनिकों को संबोधित किया जो अब भी ब्रिटिश वर्दी पहनकर अपने ही भाइयों पर गोलियां चला रहे थे।
उन्होंने रेडियो पर उन नृशंसताओं का जिक्र किया जो ब्रिटिश अधिकारियों ने भारतीय सैनिकों के साथ की थीं। उन्होंने बताया कि कैसे अंग्रेज अधिकारी भारतीय सैनिकों को युद्ध के मोर्चे पर 'तोप का चारा' (Cannon Fodder) बनाकर छोड़ देते हैं और खुद पीछे हट जाते हैं। नेताजी के इन प्रसारणों ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी के भीतर एक मनोवैज्ञानिक दरार पैदा कर दी, जो अंततः 1946 के नौसेना विद्रोह का कारण बनी।
वैचारिक क्रांति: "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा"
मृदुल शैली में हृदय को झकझोरने वाला यह आह्वान आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। नेताजी ने जब बर्मा की धरती से यह नारा दिया, तो दक्षिण-पूर्वी एशिया के कोने-कोने से भारतीय अपना सर्वस्व दान करने निकल पड़े। धनवानों ने अपनी तिजोरियाँ खोल दीं, माताओं ने अपने पुत्रों को तिलक लगाकर मोर्चे पर भेज दिया और युवाओं ने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र लिखे। यह नेताजी के जाज्वल्यमान नेतृत्व का ही करिश्मा था कि एक व्यक्ति ने सात समंदर पार एक समानांतर सरकार (Arzi Hukumat-e-Azad Hind) खड़ी कर दी, जिसे दुनिया के 9 देशों ने मान्यता दी।
प्रशांत के तट से ब्रह्मपुत्र की लहरों तक नेताजी का वैश्विक जन-आह्वान और साधन।
इतिहास अक्सर युद्धों को केवल नक्शों और सेनाओं की हलचल के रूप में देखता है, लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए यह महासमर एक आध्यात्मिक साधना थी। जब वे पूर्वी एशिया की धरती पर उतरे, तो उनके सामने केवल एक बिखरी हुई फौज नहीं थी, बल्कि बिखरा हुआ एक 'छोटा भारत' था, जो शंघाई के व्यापारिक केंद्रों से लेकर जावा-सुमात्रा के बागानों तक फैला हुआ था। 'मीमांसा' के आज के अंक में हम पढ़ेंगे कि कैसे एक सन्यासी-योद्धा ने समूचे सुदूर पूर्व (Far East) को भारत की आजादी की हवन-कुंड में तब्दील कर दिया।
सुदूर पूर्व के भारतीयों से आह्वान: "पूंजी नहीं, प्राण चाहिए"
सिंगापुर और टोक्यो की सीमाओं को लांघकर नेताजी का प्रभाव शंघाई, कोरियाई प्रायद्वीप, ताइवान और फिलीपींस तक जा पहुँचा। इन क्षेत्रों में रहने वाले भारतीय चाहे वे समृद्ध व्यापारी हों या बंधुआ मजदूर सबके लिए नेताजी की आवाज एक 'दैवीय पुकार' बन गई।
उन्होंने शंघाई और फिलीपींस के धनी भारतीयों से कहा, "मुझे आपके बैंक बैलेंस का एक हिस्सा नहीं, बल्कि आपकी पूरी संपत्ति और आपके परिवार का एक सदस्य सेना के लिए चाहिए।" नेताजी की यह मांग इतनी कठोर थी कि साधारण राजनेता इससे कतराते, लेकिन नेताजी की मृदुलता और सत्यनिष्ठा ने जादू कर दिया। ताइवान और कोरिया में बसे भारतीयों ने, जो दशकों से अपनी जड़ों को भूल चुके थे, अपनी दुकानों की चाबियाँ नेताजी के चरणों में रख दीं।
स्थानीय नागरिकों और एशियाई राष्ट्रों का समर्थन
नेताजी का कद इतना विशाल था कि केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि बर्मा, जावा, बाली और सुमात्रा के स्थानीय नागरिक भी उनके आकर्षण में बंध गए। उन्होंने इन देशों के लोगों को यह समझाया कि "भारत की आजादी ही एशिया की मुक्ति का द्वार है।" बर्मा के ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ रसद की भारी कमी थी, स्थानीय लोगों ने अपनी उपज का बड़ा हिस्सा आज़ाद हिंद फौज के 'ट्रेनिंग सेंटर्स' के लिए दान कर दिया। जावा और सुमात्रा के द्वीपों से रसद सामग्री के जहाज केवल इसलिए भेजे गए क्योंकि वहां के लोगों को नेताजी के 'पैन-एशियाटिक' (समस्त एशिया एक है) के विचार पर अटूट विश्वास था।
त्याग की पराकाष्ठा: अब्दुल हबीब यूसुफ मार्फानी 'सेवक-ए-हिंद'
जब नेताजी ने रंगून (यंगून) में आज़ाद हिंद फौज के लिए चंदे की अपील की, तो त्याग के ऐसे उदाहरण सामने आए जो आज भी हमें निशब्द कर देते हैं। गुजरात के एक समृद्ध गुजराती मुस्लिम व्यवसायी अब्दुल हबीब यूसुफ मार्फानी ने अपनी जीवन भर की पूंजी लगभग 1 करोड़ रुपये (उस समय की खगोलीय राशि) नेताजी के चरणों में रख दी। उन्होंने कहा, "नेताजी, यह दौलत मेरी नहीं, देश की है।" उनकी इस महान देशभक्ति से अभिभूत होकर नेताजी ने उन्हें 'सेवक-ए-हिंद' पदक से सम्मानित किया। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों के उस अटूट योगदान का प्रतीक है, जिसने मज़हब से ऊपर राष्ट्र को रखा।
चूड़ी-कंगन और खूनी हस्ताक्षर: जन-आंदोलन का उफान
नेताजी की सभाओं में जोश का ऐसा आलम था कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपना सर्वस्व देने को आतुर था। हज़ारों महिलाओं ने अपने सुहाग के प्रतीक सोने के चूड़ी और कंगन उतारकर दान कर दिए। कई किसानों ने अपनी पुश्तैनी जमीनें बेचकर पैसा आज़ाद हिंद फौज के कोष में जमा कराया। युवाओं ने स्याही से नहीं, बल्कि अपनी उंगलियां चीरकर 'खूनी हस्ताक्षर' से प्रतिज्ञा पत्रों पर दस्तखत किए कि वे आज़ादी के बिना वापस नहीं लौटेंगे।
"क्या हम कमज़ोर हैं?": रानी झाँसी रेजिमेंट का उदय
एक ऐतिहासिक सभा के दौरान एक महिला भीड़ को चीरती हुई नेताजी के पास आई। उसकी आँखों में विद्रोह की ज्वाला थी। उसने नेताजी को चुनौती देते हुए कहा "नेताजी, क्या आप महिलाओं को कमज़ोर समझते हैं? जब पुरुष देश के लिए लड़ सकते हैं, तो हमें यह अधिकार क्यों नहीं? क्या देश सेवा पर केवल पुरुषों का एकाधिकार है?"
नेताजी उस महिला के तर्क और साहस से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्काल विश्व की पहली महिला लड़ाकू इकाई 'रानी झाँसी रेजिमेंट' के गठन की घोषणा की। कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में इन 'रणचंडियों' ने सिद्ध किया कि भारत की नारी केवल त्याग की मूरत नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में साक्षात काल भी है।
रानी झाँसी रेजिमेंट: नारी शक्ति का वैश्विक शंखनाद
नेताजी की संगठन शक्ति का सबसे अद्भुत उदाहरण थी 'रानी झाँसी रेजिमेंट'। उस दौर में, जब दुनिया की बड़ी सेनाएं महिलाओं को केवल सहायक भूमिकाओं में देखती थीं, नेताजी ने कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में महिलाओं की एक पूरी लड़ाकू ब्रिगेड खड़ी कर दी।
स्वयं युद्ध का कठोर प्रशिक्षण: कमांडर जो सिपाही भी था
संगठन शक्ति और सैन्य अनुशासन 'इत्तेहाद, एतमाद और कुर्बानी' का का नेतृत्व नेताजी में जाज्वल्यमान था क्योंकि वे केवल आदेश नहीं देते थे, बल्कि स्वयं आदर्श प्रस्तुत करते थे। आज़ाद हिंद फौज का नारा था इत्तेहाद (एकता), एतमाद (विश्वास) और कुर्बानी (बलिदान)। सेना के शिविरों में नेताजी वही भोजन करते थे जो एक साधारण सिपाही खाता था। वे घंटों पैदल चलकर मोर्चों का निरीक्षण करते थे। उनका सैन्य अनुशासन इतना कठोर था कि ब्रिटिश जासूस भी हैरान थे कि कैसे ये सैनिक बिना रसद और पर्याप्त हथियारों के भी मौत को गले लगाने के लिए मुस्कुराते हुए तैयार रहते हैं।
नेताजी केवल आदेश देने वाले 'डिक्टेटर' नहीं थे। उन्होंने स्वयं भारी हथियारों को चलाने, खंदक खोदने और 'बुश-सर्वाइवल' (जंगलों में जीवित रहने) का कठोर प्रशिक्षण लिया। वे चाहते थे कि आज़ाद हिंद फौज का हर सिपाही यह देखे कि उनका सर्वोच्च सेनापति भी वही कष्ट सह रहा है जो वे सह रहे हैं।
टोक्यो और सिंगापुर के मिलिट्री एकेडमी में जब वे अपनी जापानी तलवार और पिस्तौल के साथ अभ्यास करते, तो जापानी जनरल भी उनके सैन्य अनुशासन और एकाग्रता को देखकर दांतों तले उंगली दबा लेते थे।
टोक्यो और सिंगापुर के मिलिट्री एकेडमी में जब वे अपनी जापानी तलवार और पिस्तौल के साथ अभ्यास करते, तो जापानी जनरल भी उनके सैन्य अनुशासन और एकाग्रता को देखकर दांतों तले उंगली दबा लेते थे।
ऋषि तुल्य जीवन: विलासिता का त्याग और कठोर साधना
युद्ध के उस भीषण दौर में, जहाँ कमांडर अक्सर सुरक्षित मुख्यालयों में बैठते थे, नेताजी का जीवन एक आधुनिक ऋषि जैसा था। वे दिन में 18-20 घंटे काम करते थे। फिलीपींस से लेकर बर्मा के मोर्चों तक की लंबी यात्राओं के दौरान उन्होंने कभी थकान की शिकायत नहीं की।
अक्सर देखा जाता कि नेताजी देर रात तक नक्शों पर रणनीतियां बनाते और सुबह होने से पहले ही प्रशिक्षण शिविरों में पहुंच जाते। उनका भोजन अत्यंत साधारण था अक्सर वे सैनिकों के साथ उबले हुए चावल और नमक खाकर गुजारा करते। शारीरिक मेहनत का यह आलम था कि उन्होंने दक्षिण-पूर्वी एशिया की चिलचिलाती धूप और बर्मा के दलदली जंगलों में हफ़्तों बिताए, जिससे उनका शरीर जर्जर हो गया था, लेकिन उनकी आंखों की चमक (जाज्वल्यमान आभा) और बढ़ती गई।
रसद और प्रबंधन की वैचारिक क्रांति
इतनी बड़ी सेना (लगभग 50,000-60,000 सैनिक) के लिए रसद (Logistics) जुटाना एक प्रशासनिक दुःस्वप्न था। नेताजी ने इसके लिए 'टोटल मोबिलाइजेशन' (पूर्ण लामबंदी) का विचार दिया। उन्होंने ट्रेनिंग सेंटरों के लिए राशन कार्ड प्रणाली शुरू की और यह सुनिश्चित किया कि किसी भी स्थानीय नागरिक का शोषण न हो। बर्मा और सिंगापुर के भारतीय व्यापारियों ने 'आज़ाद हिंद बैंक' के माध्यम से लाखों टन अनाज और सैन्य सामग्री का प्रबंध किया। यह नेताजी की प्रबंधन शक्ति ही थी कि बिना किसी देश की सहायता पर पूरी तरह निर्भर रहे, उन्होंने अपनी सेना को महीनों तक आत्मनिर्भर बनाए रखा।
संगठन शक्ति और सैन्य अनुशासन: 'इत्तेहाद, एतमाद और कुर्बानी'
नेताजी का नेतृत्व जाज्वल्यमान था क्योंकि वे केवल आदेश नहीं देते थे, बल्कि स्वयं आदर्श प्रस्तुत करते थे। आज़ाद हिंद फौज का नारा था इत्तेहाद (एकता), एतमाद (विश्वास) और कुर्बानी (बलिदान)।
सेना के शिविरों में नेताजी वही भोजन करते थे जो एक साधारण सिपाही खाता था। वे घंटों पैदल चलकर मोर्चों का निरीक्षण करते थे। उनका सैन्य अनुशासन इतना कठोर था कि ब्रिटिश जासूस भी हैरान थे कि कैसे ये सैनिक बिना रसद और पर्याप्त हथियारों के भी मौत को गले लगाने के लिए मुस्कुराते हुए तैयार रहते हैं।
एक्सिस पावर जापान के साथ कूटनीतिक संतुलन
जापान के साथ नेताजी का गठबंधन 'वैचारिक दासता' का नहीं, बल्कि 'समान साझेदारी' का था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि आज़ाद हिंद फौज, जापानी सेना की पिछलग्गू बनकर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र सहयोगी के रूप में लड़ेगी।
जब जापानी सेना ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को जीता, तो नेताजी ने उन्हें भारत की पहली स्वतंत्र भूमि के रूप में अधिग्रहित किया और उनका नाम 'शहीद' और 'स्वराज' द्वीप रखा। यह एक राजनेता की दूरदर्शिता थी कि वे युद्ध के मैदान में भी संप्रभुता के प्रतीक गढ़ रहे थे।
एशिया एंड पैसिफिक का भीषण संघर्ष: बर्मा से भारत की ओर
1944 की शुरुआत में, आज़ाद हिंद फौज ने बर्मा (म्यांमार) के जंगलों से होकर भारत की सीमा की ओर कूच किया। वह दृश्य कल्पनातीत रहा होगा, जब भारतीय मिट्टी के बेटों ने अपनी ही भूमि को आजाद कराने के लिए भीषण वर्षा, दलदल, और मलेरिया जैसी बीमारियों से लड़ते हुए 'इम्फाल' और 'कोहिमा' के मोर्चे पर दस्तक दी।
जापान की वायु सेना और INA की पैदल टुकड़ियों ने मिलकर मित्र राष्ट्रों (Allied Forces) को पीछे धकेलना शुरू किया। कोहिमा की पहाड़ियों पर हुई लड़ाई को विश्व के सबसे घातक युद्धों में गिना जाता है। यहाँ भारतीय वीरों ने अपने रक्त से आज़ादी की इबारत लिखी। जब पहली बार भारतीय भूमि पर 'आजाद हिंद' का तिरंगा फहराया गया, तो वह केवल एक झंडा नहीं, बल्कि सदियों की गुलामी के अंत की घोषणा थी
पदक वितरण और मनोबल का सृजन: 'वीर-ए-हिंद' से 'शहीद-ए-भारत' तक
नेताजी जानते थे कि एक सैनिक का सबसे बड़ा सम्मान उसका पदक और उसकी पहचान होती है। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज के लिए अपने स्वयं के वीरता पदकों की श्रृंखला शुरू की। जब वे मोर्चे पर जाकर किसी घायल सैनिक की छाती पर पदक सजाते और उसे 'वीर-ए-हिंद' या 'तम्घा-ए-बहादुरी' से नवाजते, तो उस सैनिक का दर्द गौरव में बदल जाता था।
वे पदक वितरण के समय सैनिकों के व्यक्तिगत दुखों को सुनते, उनकी पारिवारिक समस्याओं का समाधान करते और उनमें यह विश्वास भरते कि उनकी शहादत को स्वतंत्र भारत का इतिहास कभी नहीं भूलेगा। पदक वितरण के समारोहों में उनके भाषणों में वह 'मृदुलता' होती थी जो पिता की ममता और सेनापति के अधिकार का अद्भुत मिश्रण थी।
संघर्ष का उपसंहार: भौतिक पराजय, नैतिक विजय
यद्यपि युद्ध के अंतिम दौर में मौसम की प्रतिकूलता और जापान के आत्मसमर्पण ने INA को रणनीतिक रूप से पीछे हटने पर मजबूर किया, लेकिन नेताजी की यह लड़ाई असफल नहीं थी। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की उस रीढ़ को तोड़ दिया था जिसके दम पर वे भारत पर राज करते थे 'भारतीय सैनिकों की वफादारी'।
जब युद्ध के बाद INA के अधिकारियों पर लाल किले में मुकदमा चला, तो समूचा भारत सुलग उठा। रॉयल इंडियन नेवी में विद्रोह हो गया। अंग्रेजों को समझ आ गया कि अब भारत की सेना उनकी वफादार नहीं, बल्कि नेताजी की 'आज़ाद हिंद फौज' की अनुयायी बन चुकी है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का पूर्वी एशिया का यह अध्याय हमें सिखाता है कि "एक व्यक्ति मर सकता है, लेकिन उसका विचार उसकी मृत्यु के बाद हज़ारों लोगों के जीवन में समाहित हो जाता है।"
'मीमांसा' के माध्यम से हमारा उद्देश्य उसी वैचारिक क्रांति को जीवित रखना है। नेताजी का सैन्य अनुशासन, उनकी संगठन शक्ति और उनका अटूट राष्ट्रवाद आज के युवाओं के लिए वह मार्गदर्शिका है, जो हमें एक 'श्रेष्ठ भारत' बनाने की प्रेरणा देती है।
वैचारिक मेहनत: साम्प्रदायिक एकता का अनुष्ठान लाल किला ट्रायल
सुमात्रा से लेकर टोक्यो तक फैले इस अभियान में नेताजी की सबसे बड़ी मेहनत 'मानसिक बदलाव' पर थी। उन्होंने भारतीय समाज में सदियों से जमी 'जाति और सम्प्रदाय' की दीवारों को ढहा दिया। उनके कैंपों में ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम और सिख एक ही थाली में भोजन करते और एक ही बैरक में सोते थे। यह उस समय के भारत के लिए एक अकल्पनीय 'वैचारिक क्रांति' थी। नेताजी ने सिद्ध किया कि जब लक्ष्य 'माँ भारती' की मुक्ति हो, तो छोटे-मोटे मतभेद तुच्छ हो जाते हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का पूर्वी एशिया का यह कार्यकाल केवल एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि एक 'महा-यज्ञ' था।
उन्होंने शंघाई के गलियों से लेकर सुमात्रा के समुद्र तटों तक फैले हर भारतीय को यह महसूस कराया कि वे भी इस महान क्रांति के नायक हैं। उनकी शारीरिक मेहनत ने उन्हें एक सैनिक बनाया, तो उनकी वैचारिक साधना ने उन्हें 'नेताजी' के रूप में अमर कर दिया। उन्होंने हीं पहली बार भारतीय महिलाओं को आधुनिक सैन्य युद्धक प्रशिक्षण रानी झांसी रेजीमेंट के तहत दिया। उनके इसी दूरदर्शी दृष्टि ने आधुनिक भारतीय सेना और पुलिस सेवा में भारतीय महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की।
'मीमांसा' का यह खंड हमें याद दिलाता है कि आज़ादी की कीमत केवल अहिंसक आंदोलनों ने नहीं, बल्कि उन गुमनाम सैनिकों ने भी चुकाई थी जिन्हें firing squads के सामने खड़ा किया गया, जिन्हें जंगलों में घास खाकर लड़ना पड़ा और जिन्होंने नरभक्षण जैसी विभीषिकाओं के बीच भी 'जय हिंद' का नारा बुलंद रखा।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व इसलिए महान है क्योंकि उन्होंने नरक जैसी परिस्थितियों (Hellish Conditions) से अमृत निकालकर एक सेना खड़ी की। उन्होंने जापान की आँखों में आँखें डालकर भारत की अस्मिता की रक्षा की और 'शुभ सुख चैन' के मधुर स्वरों से राष्ट्र के भविष्य को अभिमंत्रित किया।
शूरवीर स्तंभ/ संपादकीय आलेख
अमन कुमार होली
© संपादक
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
सम्पादकीय टिप्पणी (अमन कुमार 'होली'): हिंदी साहित्य में अक्सर युद्ध के वीभत्स रूप को छोड़ दिया जाता है, लेकिन नेताजी को समझने के लिए उस 'वीभत्स' को समझना जरूरी है जिससे लड़कर उन्होंने 'वीर रस' की सृष्टि की। यह आलेख उन शहीदों के रक्त का तर्पण है। हिंदी पाठकों के लिए नेताजी का यह अध्याय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें सिखाता है कि नेतृत्व केवल सत्ता से नहीं, बल्कि त्याग, साधना और सबको साथ लेकर चलने की शक्ति से पैदा होता है। 'मीमांसा' के माध्यम से हम उस गौरव को घर-घर पहुँचाने के संकल्प को पुनः दोहराते हैं। इतिहास के इस खंड को लिपिबद्ध करते समय मेरा हृदय उन अनाम शहीदों के प्रति नतशिर है, जिन्होंने सात समंदर पार रहकर भी अपनी जड़ों को सींचा। जिन्होंने बर्मा के घने जंगलों में भूखे-प्यासे रहकर भी 'जय हिंद' का नारा नहीं छोड़ा। हिंदी साहित्य की कोमलता और इतिहास की कठोर सच्चाई का यह संगम 'मीमांसा' के पाठकों के लिए एक भेंट है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख वेब पत्रिका ‘मीमांसा’ के शूरवीर स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित एक ऐतिहासिक-वैचारिक विवेचन है। इसमें प्रस्तुत तथ्य, घटनाएँ, विवरण और विश्लेषण लेखक के गहन अध्ययन, उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों, शोध-ग्रंथों, दस्तावेज़ों, संस्मरणों तथा प्रचलित इतिहास लेखन पर आधारित हैं।
इस आलेख का उद्देश्य किसी राष्ट्र, समुदाय, धर्म या समूह के प्रति द्वेष, नफ़रत अथवा वैमनस्य उत्पन्न करना नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण अध्याय को वैचारिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रवादी दृष्टि से प्रस्तुत करना है।
आलेख में उल्लिखित युद्ध, हिंसा, यातना, नरसंहार अथवा अमानवीय कृत्यों का वर्णन समर्थन अथवा औचित्य सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास की जटिलताओं और संघर्षों को समझने के लिए किया गया है। यदि किसी पाठक की भावनाएँ आहत होती हैं, तो यह पूर्णतः अनजाने में है।
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