अंतर्मन के चितेरे : जैनेंद्र कुमार और प्रेमचंदोत्तर हिंदी गद्य का मनोवैज्ञानिक उत्कर्ष
विशेष प्रस्तुति: 'मीमांसा' जीवनी विशेषांक
सर्वेषां हितम् एव साहित्यम् के पावन ध्येय को समर्पित वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस विशेष अंक में आज हम एक ऐसे रचनाकार का विहंगम मूल्यांकन प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसने हिंदी कथा-साहित्य की धारा को बाह्य यथार्थ की स्थूलता से मोड़कर अंतर्मन की सूक्ष्म कंदराओं की ओर प्रवाहित किया। वे थे महान कथाकार जैनेंद्र कुमार।
एक युग प्रवर्तक का प्रादुर्भाव
2 जनवरी 1905 को अलीगढ़ के कौड़ियागंज में जन्मे आनंदीलाल (जैनेंद्र कुमार) का जीवन स्वयं में एक महागाथा है। बचपन में ही पिता का साया उठ जाने के बाद हस्तिनापुर के गुरुकुल की कठोर तपश्चर्या और माँ व मामा के संरक्षण ने उनके व्यक्तित्व को वह दार्शनिक आधार प्रदान किया, जो आगे चलकर उनकी कृतियों में मुखर हुआ। असहयोग आंदोलन की आग में तपकर और लाला लाजपत राय के 'तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स' के सानिध्य में रहकर जैनेंद्र ने जो राजनीतिक चेतना अर्जित की, उसने उन्हें समाज की नब्ज पहचानने की शक्ति दी। किंतु उनका वास्तविक गंतव्य राजनीति नहीं, बल्कि साहित्य के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं का साक्षात्कार करना था।
प्रेमचंदोत्तर साहित्य: पूरक, विलोम नहीं
अक्सर हिंदी आलोचना में प्रेमचंद और जैनेंद्र को परस्पर विरोधी ध्रुवों के रूप में देखा जाता है। प्रेमचंद जहाँ सामाजिक यथार्थ, कृषक जीवन और बाह्य विसंगतियों के चितेरे थे, वहीं जैनेंद्र व्यक्ति के अंतर्मन, उसकी शंकाओं और नैतिक द्वंद्वों के अन्वेषक बने।
'मीमांसा' के दृष्टिकोण से देखें तो जैनेंद्र प्रेमचंद के विलोम नहीं, अपितु उनके पूरक थे। प्रेमचंद ने समाज का जो ढांचा खड़ा किया, जैनेंद्र ने उसमें रहने वाले 'व्यक्ति' की आत्मा को स्वर दिया। प्रेमचंद की सामाजिकता में जिस वैयक्तिक निजत्व की न्यूनता कभी-कभी खलती थी, उसे जैनेंद्र ने अपनी मनोवैज्ञानिक गहराई से पूर्ण किया। प्रसिद्ध आलोचक गोपाल राय के अनुसार, जैनेंद्र 'शहर की गली और कोठरी की सभ्यता' में सिमटकर व्यक्ति-पात्रों की मानसिक परतों को उघाड़ते हैं।
"जैनेंद्र का गद्य न होता तो अज्ञेय का गद्य संभव न होता। हिंदी कहानी ने प्रयोगशीलता का पहला पाठ जैनेंद्र से ही सीखा।"
रचना कर्म: मनोवैज्ञानिक यथार्थ का नया विन्यास
जैनेंद्र कुमार ने हिंदी उपन्यास को 'घटना' के बोझ से मुक्त कर उसे 'चरित्र' के धरातल पर प्रतिष्ठित किया। उनके उपन्यासों 'परख' (१९२९), 'सुनीता' (१९३५), 'त्यागपत्र' (१९३७) और 'मुक्तिबोध' ने तत्कालीन पाठकों को झकझोर कर रख दिया।
1. नारी चेतना और अस्मिता का प्रश्न
जैनेंद्र के साहित्य के केंद्र में नारी है। उनकी नायिकाएँ चाहे वह 'त्यागपत्र' की मृणाल हो या 'सुनीता' बनी-बनाई सामाजिक मर्यादाओं को चुनौती देती हैं। १९३०-४० के उस दौर में, जब विवाह संस्था पर प्रश्न उठाना दुस्साहस था, जैनेंद्र की नायिकाएँ अपनी स्वतंत्रता और स्वतंत्र व्यक्तित्व के लिए छटपटाती नजर आती हैं। वे अक्सर आत्मयातना की शिकार बनती हैं, लेकिन यह आत्मयातना उनके जीवन दर्शन का अंग है, जो उन्हें भीड़ से अलग एक पहचान देती है।
2. क्रांति और कोमलता का द्वंद्व
जैनेंद्र के पुरुष पात्रों में एक अजीबोगरीब द्वंद्व मिलता है। वे बाह्य रूप से कोमल और भीरु प्रतीत होते हैं, किंतु उनके भीतर एक 'महान विध्वंसक' छिपा होता है। यह विध्वंसक व्यक्तित्व अक्सर नारी के प्रति आकर्षण और अस्वीकृति की प्रतिक्रिया में निर्मित होता है।
3. कहानियों का नया शिल्प
'फाँसी', 'पाजेब', 'नीलम देश की राजकन्या' और 'दो चिड़ियाँ' जैसी कहानियों के माध्यम से उन्होंने कहानी को केवल मनोरंजन या उपदेश का साधन न रहने देकर उसे एक 'दार्शनिक विमर्श' बना दिया। उनकी कहानियाँ किसी भी पंक्ति से शुरू होकर पाठक को एक ऐसे मोड़ पर छोड़ देती हैं, जहाँ उसे स्वयं उत्तर खोजना पड़ता है।
प्रेमचंद और जैनेन्द्र: एक अनूठी मित्रता
साहित्यिक गलियारों में यह किस्सा आज भी मशहूर है कि मृत्युशैया पर लेटे प्रेमचंद से जैनेन्द्र ने पूछा था "अब ईश्वर के बारे में क्या सोचते हैं?" प्रेमचंद का जवाब था "इस बदहाल दुनिया में ईश्वर है, ऐसा तो मुझे भी नहीं लगता।" वैचारिक मतभेदों के बावजूद प्रेमचंद ने जैनेन्द्र की प्रतिभा को भरपूर सम्मान दिया। यहाँ तक कि प्रेमचंद के बाद 'हंस' की मशाल को जैनेन्द्र और शिवरानी देवी ने मिलकर थामे रखा।
गद्य का शिल्पकार: अज्ञेय के अग्रज
आलोचक नामवर सिंह के अनुसार, जैनेन्द्र वह साहित्यकार थे जिन्होंने भाषा को 'शृंगारहीन' और पारदर्शी बनाया। उनकी भाषा में जो 'तोड़-फोड़' और प्रयोगशीलता थी, उसी ने आगे चलकर अज्ञेय के गद्य का मार्ग प्रशस्त किया। वे कबीर के भक्त थे और जीवन के अंतिम क्षणों तक सत्ता के गलियारों में भी अपनी स्पष्टवादिता और ठसक के साथ खड़े रहे।
हिंदी गद्य को जैनेंद्र की देन: एक नया 'सिंटेक्स'
जैनेंद्र का सबसे बड़ा योगदान भाषा के स्तर पर है। उन्होंने हिंदी गद्य की पारंपारिक जड़ता को तोड़ा। उन्होंने हिंदी को एक पारदर्शी भंगिमा और नया तेवर दिया। उनकी भाषा 'श्रृंगारहीन' होकर भी गहरे अर्थ व्यंजित करती है। अशोक वाजपेयी उन्हें 'शब्द के संकोच का कथाकार' कहते हैं, जो कम से कम शब्दों में विराट सत्य कहने की सामर्थ्य रखते थे।
वैचारिक पीठिका: गाँधीवाद और स्यादवाद का संगम
जैनेंद्र का साहित्य केवल कल्पना की उड़ान नहीं है, बल्कि वह गाँधीवादी अहिंसा और जैन दर्शन के 'स्यादवाद' से अनुप्राणित है। उन्होंने जीवन की बाह्य वास्तविकताओं से अधिक महत्त्व व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष को दिया। प्रेमचंद के साथ उनकी वैचारिक मित्रता और भिन्नता का सम्मान हिंदी साहित्य का एक स्वर्णिम अध्याय है। जहाँ प्रेमचंद अंतिम समय तक ईश्वर की सत्ता पर संशय व्यक्त करते रहे, वहीं जैनेंद्र अध्यात्म, धर्म और नैतिकता के सूक्ष्म सूत्रों में समाधान खोजते रहे।
प्रमुख उपलब्धियाँ और सम्मान
जैनेंद्र जी की साहित्य साधना को राष्ट्र ने भरपूर सम्मान दिया:
निष्कर्ष : अमिट विरासत
आज के खंडित समय में, जब व्यक्ति अपने ही भीतर अजनबी होता जा रहा है, जैनेंद्र कुमार का साहित्य और अधिक प्रासंगिक हो गया है। उन्होंने हमें सिखाया कि समाज को बदलने के लिए व्यक्ति के मन को समझना अनिवार्य है। 'मीमांसा' के इस विश्लेषण का मूल भाव यही है कि जैनेंद्र का साहित्य 'सर्वेषां हितम्' की भावना से ओतप्रोत है, क्योंकि वह मानव को उसकी पूर्णता और अपूर्णता के साथ स्वीकार करता है। वे अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे हैं।
24 दिसंबर 1988 को भले ही यह महान कथाकार पंचतत्व में विलीन हो गये किंतु उनकी भाषा की भंगिमा, उनके पात्रों का मानसिक संघर्ष और उनकी वैचारिक ठसक आज भी हिंदी साहित्य के आकाश में ध्रुवतारे की तरह प्रकाशमान हैं। उनके बिना आधुनिक हिंदी गद्य का इतिहास अधूरा है।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' की ओर से इस महान मनीषी को उनकी जयंती पर सादर नमन।
© वेब पत्रिका 'मीमांसा'
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