सन्त साहित्य के प्रदीप्त महाप्राण : आचार्य परशुराम चतुर्वेदी और उनका रचना-संसार
प्रिय पाठकों, आज जब हम आचार्य परशुराम चतुर्वेदी विशेषांक लेकर आपके सम्मुख उपस्थित हैं, तो यह केवल एक विद्वान का स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि वेब पत्रिका 'मीमांसा' की उस प्रतिबद्धता का नवीनीकरण है जो सत्य और नैतिक जीवन-मूल्यों को साहित्य का केंद्र मानती है।
भारतीय साहित्य के आकाश में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी एक ऐसे नक्षत्र हैं, जिनकी आभा ने सन्त काव्य की उन गलियों को आलोकित किया जो वर्षों से उपेक्षित और धूल-धूसरित थीं। एक सजग अन्वेषक, निष्पक्ष आलोचक और गम्भीर अध्येता के रूप में चतुर्वेदी जी ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में जो स्थान बनाया है, वह अप्रतिम है। उनका रचना-कर्म केवल पाण्डित्य का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि वह भारतीय संस्कृति की उस अंतर्धारा की खोज है जो मानवता, प्रेम और साधना के सूत्रों से बनी है।
व्यक्तित्व का उदय : बलिया की माटी से वैचारिक शिखर तक
25 जुलाई, 1894 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के जवहीं गाँव में जन्मे परशुराम चतुर्वेदी की प्रारम्भिक शिक्षा महाजनी पद्धति पर हुई, जिसने उनके भीतर व्यावहारिक समझ विकसित की। साथ ही संस्कृत के अभ्यास ने उन्हें भारतीय वाङ्मय की जड़ों से जोड़ा। उच्च शिक्षा के लिए वे कायस्थ पाठशाला (इलाहाबाद) और वाराणसी गए। 1925 में बलिया में वकालत प्रारम्भ करने वाले चतुर्वेदी जी ने कानून की बारीकियों को साहित्य की तार्किकता में बदल दिया। उनका मानना था कि कानून का ज्ञान साहित्य के विश्लेषण में सहायक होता है।
उनका व्यक्तित्व सहज, सरल और स्नेहिल था। गौरवर्ण, मध्यम कद और सघन सफेद मूँछों वाला वह व्यक्तित्व वास्तव में 'सन्त हृदय' था। उन्होंने कभी किसी सम्प्रदाय का झंडा नहीं थामा, बल्कि मुक्त चिन्तन के पक्षधर रहे।
रचना-संसार : एक विराट शोध-यात्रा
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का रचना-कर्म इतना व्यापक है कि वह सन्त साहित्य का विश्वकोष बन जाता है। उनकी कृतियों में न केवल सूचनाएँ हैं, बल्कि उनमें 'अनुभूति की गहराई' और 'सांस्कृतिक अन्वेषण' का अद्भुत संगम है।
आइए, उनकी प्रमुख कृतियों और उनके वैचारिक अवदान पर विस्तार से चर्चा करें:
1. सन्त परम्परा का महाभाष्य: 'उत्तरी भारत की सन्त परम्परा'
1951 में प्रकाशित यह ग्रन्थ चतुर्वेदी जी की कीर्ति का अक्षय स्तम्भ है। इसके बिना सन्त साहित्य का कोई भी शोध अपूर्ण है। इसमें उन्होंने सनातन सन्तों से लेकर सूफियों, नाथ पंथियों, जंगम-जोगड़ों और निर्गुण-सगुण धाराओं का ऐसा समन्वित चित्र खींचा कि आचार्य विनोबा भावे भी इसकी प्रशंसा किए बिना न रह सके। इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि उन्होंने इसमें महात्मा गांधी को 'आखरी सन्त' मानकर सन्त परम्परा को आधुनिक युग से जोड़ दिया।
2. प्रेम की दार्शनिक मीमांसा: 'हिन्दी काव्य-धारा में प्रेम-प्रवाह' और 'मध्यकालीन प्रेम-साधना'
चतुर्वेदी जी ने समाज में प्रेम के सांस्कृतिक महत्त्व को पहचाना। 'हिन्दी काव्य-धारा में प्रेम-प्रवाह' (1952) और 'मध्यकालीन प्रेम-साधना' (1952) के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारतीय प्रेम-साधना केवल इन्द्रियगत नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक ऊँचाई छूने का सोपान है। 'भारतीय प्रेमाख्यान की परम्परा' में उन्होंने इस विधा के क्रमिक विकास का सूक्ष्म विश्लेषण किया।
3. कबीर साहित्य के मर्मज्ञ: 'कबीर साहित्य की परख' और 'कबीर साहित्य चिन्तन'
कबीर चतुर्वेदी जी के प्रिय विषय थे। 'कबीर साहित्य की परख' (1954) और 'कबीर साहित्य चिन्तन' के माध्यम से उन्होंने कबीर की सधुक्कड़ी भाषा और उनके अक्खड़पन के पीछे छिपी करुणा और तार्किकता को समाज के सामने रखा। उन्होंने कबीर को मात्र एक विद्रोही कवि नहीं, बल्कि एक युगदृष्टा सन्त के रूप में प्रतिष्ठित किया।
4. सम्पादन और शोध की गहनता
चतुर्वेदी जी ने लुप्तप्राय साहित्य को सहेजने का महान कार्य किया। 'मीराबाई की पदावली', 'सूफी काव्य-संग्रह', 'सन्त काव्य', और 'दादू ग्रन्थावली' का सम्पादन करके उन्होंने मीरा, दादू और सूफी कवियों के प्रामाणिक पाठ पाठकों को उपलब्ध कराए। 'बौद्ध सिखों के चर्यापद' के माध्यम से उन्होंने सन्त साहित्य की उन जड़ों को खोजा जो सिद्धों और नाथों तक जाती थीं।
5. सांस्कृतिक एवं धार्मिक विमर्श
उनकी दृष्टि केवल सन्त साहित्य तक सीमित नहीं थी। 'वैष्णव धर्म' और 'भक्ति साहित्य में मधुरोपासना' में उन्होंने भक्ति आन्दोलन के शास्त्रीय और व्यावहारिक पक्षों की व्याख्या की। 'मानस की रामकथा' के जरिए उन्होंने लोक-मंगल की भावना को रेखांकित किया। 'भारतीय साहित्य की सांस्कृतिक रेखाएँ' और 'बौद्ध साहित्य की सांस्कृतिक झलक' उनके व्यापक अध्ययन का प्रमाण हैं, जहाँ वे साहित्य को संस्कृति के आईने में देखते हैं।
6. वैचारिक निबन्ध और समीक्षा
'नव-निबन्ध' (1951), 'साहित्य-पथ', और 'सन्त साहित्य की भूमिका' जैसी कृतियाँ उनके गम्भीर गद्य-लेखन का प्रमाण हैं। उन्होंने 'मध्यकालीन शृंगारिक प्रवृत्तियाँ' और 'रहस्यवाद-भाषण' के माध्यम से मध्यकाल के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला जो अक्सर विवादित रहे। 'हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास' के सम्पादन में उनका योगदान अविस्मरणीय है।
7. लोक सेवा और गृहस्थ आदर्श
'गार्हस्थ्य जीवन और ग्राम सेवा' जैसी कृति यह सिद्ध करती है कि वे केवल पुस्तकालयों के विद्वान नहीं थे। वे समाज की इकाई गाँव और परिवार के सुधार के प्रति भी उतने ही सचेत थे। डॉ. सदानन्द प्रसाद गुप्त के अनुसार, उन्होंने गृहस्थ जीवन में रहकर एक आदर्श प्रस्तुत किया कि साधना और संसार साथ-साथ चल सकते हैं।
दार्शनिक दृष्टि और मानवतावाद
डॉ. हरिशंकर मिश्र के अनुसार, चतुर्वेदी जी 'विभूति' थे। उनमें साहित्यिक अभिरुचि ईश्वर प्रदत्त थी। वे नियमित गंगा स्नान करने वाले और कर्मकाण्डों का पालन करने वाले व्यक्ति थे, किन्तु उनका उद्देश्य रूढ़िवादिता नहीं, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों का विकास था। उनका मानवतावादी दृष्टिकोण उन्हें कबीर और दादू दयाल के निकट ले गया। वे 'सामंजस्य' की प्रतिमूर्ति थे।
वे मानते थे कि सन्त साहित्य सम्पूर्ण भारत की साझी धरोहर है। उनकी तार्किकता और शोध दृष्टि ने सन्त साहित्य को वह शास्त्रीय गरिमा प्रदान की, जिससे वह अकादमिक जगत में ऊँचे आसन पर प्रतिष्ठित हो सका।
उपसंहार: सन्त मरा क्या रोइए...
3 जनवरी, 1979 विकीपीडिया के अनुसार (राजकमल प्रकाशन के अनुसार 1जनवरी) को जब इस मनीषी का महाप्रयाण हुआ, तो साहित्य जगत ने उसे एक सन्त की विदाई के रूप में देखा। 'सन्त मरा क्या रोइए जो अपनो घर जाय' यह युक्ति उन पर पूर्णतः चरितार्थ होती है।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने अपनी लेखनी से जो सांस्कृतिक आभा बिखेरी है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव मार्गदर्शक रहेगी। 'मीमांसा' पत्रिका के इस विशेषांक के माध्यम से हम उस महान अन्वेषक को नमन करते हैं, जिन्होंने भारतीय सन्त परम्परा के बिखरे हुए सूत्रों को एक माला में पिरोकर हमें अपनी जड़ों से परिचित कराया। उनका अवदान हिन्दी साहित्य की अमर थाती है।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' ऐसे महान परंपरा और संस्कृति व साहित्य के ध्वजवाहक की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती है।
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अस्वीकरण: इस विशेष अंक में समाहित लेख, विचार और विश्लेषण आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के विराट व्यक्तित्व एवं उनके साहित्यिक अवदान के प्रति एक श्रद्धापूर्ण मूल्यांकन हैं। संपादकीय टीम ने ऐतिहासिक तथ्यों, तिथियों और संदर्भों (जैसे जन्म एवं निर्वाण तिथि) की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध शोधपरक स्रोतों और प्रतिष्ठित प्रकाशनों का सहारा लिया है। तथापि, विभिन्न स्रोतों में मतांतर की स्थिति में पाठक विवेक का प्रयोग करें। यहाँ व्यक्त विचार 'मीमांसा' की साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता और विद्वानों के प्रति सम्मान का प्रतीक हैं। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि सन्त साहित्य की दार्शनिक विरासत को जन-जन तक पहुँचाना है।
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