वेब पत्रिका 'मीमांसा' के विश्व-क्षितिज विशेषांक में : लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई "सर्वनाश के सन्नाटे में सौंदर्य की खोज"



साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि वह दर्पण है जिसमें संपूर्ण मानवता अपना चेहरा देखती है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' ने अपने विशेष स्तंभ 'विश्व-क्षितिज' के माध्यम से दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य को आपकी अपनी भाषा में, सरल और प्रभावशाली ढंग से परोसने का संकल्प लिया है। लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई जैसे वैश्विक मनीषियों के विचारों को आप तक पहुँचाना इसी मुहिम का एक हिस्सा है। यह यात्रा आपके बिना अधूरी है। हम चाहते हैं कि आप न केवल इन लेखों को पढ़ें, बल्कि अपनी प्रतिक्रियाओं, आलोचनाओं और सुझावों के माध्यम से इस संवाद को जीवंत बनाएँ।
आज की मीमांसा के प्रतिनिधि स्तंभ "विश्व-क्षितिज" में हंगरी के उस शब्द-शिल्पी की गाथा, जिसने 2025 में साहित्य के नोबेल शिखर को छुआ।

साहित्य की दुनिया में कुछ लेखक ऐसे होते हैं जो केवल कहानियाँ नहीं सुनाते, बल्कि पाठक के भीतर एक नया ब्रह्मांड रचते बसाते हैं। हंगरी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार और पटकथा लेखक लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई (László Krasznahorkai) इसी श्रेणी के विरल रचनाकार हैं। वर्ष 2025 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार की घोषणा ने न केवल उनके जटिल गद्य को वैश्विक मान्यता दी है, बल्कि हंगरी के साहित्य को 2002 में इमरे कर्टेज़ के बाद दूसरी बार इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजा है।

एक दार्शनिक की यात्रा : जिउला से स्टॉकहोम तक

5 जनवरी 1954 को हंगरी के जिउला में जन्मे क्रास्ज़्नाहोरकाई का जीवन किसी उपन्यास के नायक जैसा ही विविधतापूर्ण रहा है। एक वकील पिता और सामाजिक कार्यकर्ता माँ की संतान लास्ज़लो ने शुरुआत में कानून की पढ़ाई की, लेकिन उनका मन संगीत और साहित्य की ओर अधिक झुका रहा। उन्होंने पियानो वादक के रूप में जैज़ बैंड्स में काम किया और यहाँ तक कि एक समय में उन्होंने चरवाहे और खदान मजदूर के रूप में भी जीविकोपार्जन किया। शायद यही कारण है कि उनकी रचनाओं में जीवन की धूल, पसीना और दार्शनिक गहराई एक साथ दिखाई देती है।

जटिल गद्य और 'एक-वाक्य' की जादूगरी

अक्सर लोग वैश्विक साहित्य की जटिलता से घबराते हैं, लेकिन क्रास्ज़्नाहोरकाई की लेखनी एक ऐसी भूलभुलैया है जिसमें खो जाने का अपना एक अलग आनंद है। उनकी पहचान उनके बेहद लंबे, घुमावदार वाक्यों और कई पन्नों तक चलने वाले अनुच्छेदों (Paragraphs) से है। आलोचक इसे 'अपोकैलिप्टिक' (सर्वनाशकारी) और 'विषादी' (Melancholic) कहते हैं, लेकिन यह विषाद पाठक को हताश नहीं करता, बल्कि अस्तित्व के गहरे सत्यों से साक्षात्कार कराता है।

नोबेल समिति ने उन्हें पुरस्कृत करते हुए बिल्कुल सही कहा है : 

 "उनकी उन प्रभावशाली और दूरदर्शी कृतियों के लिए, जो सर्वनाशकारी भय के बीच भी कला की शक्ति की पुष्टि करती हैं।"

प्रमुख कृतियाँ : समय और सभ्यता का दर्पण

उनकी पहली ही कृति 'सैटान्टैंगो' (1985) ने उन्हें विश्व पटल पर स्थापित कर दिया था। इसके बाद 'द मेलन्कॉली ऑफ रेजिस्टेंस' (The Melancholy of Resistance) जैसी कालजयी रचना आई, जिसे पश्चिमी सभ्यता के पतन पर एक भविष्यसूचक कटाक्ष माना जाता है। उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियाँ जैसे 'वॉर एंड वॉर', 'सेइबो देयर बिलो' और 'द वर्ल्ड गोज़ ऑन' मानवीय भ्रम और नैतिक पतन की परतों को खोलती हैं।

यह दिलचस्प है कि क्रास्ज़्नाहोरकाई का संबंध केवल किताबों तक सीमित नहीं रहा। निर्देशक बेला टार (Béla Tarr) के साथ उनके सहयोग ने सिनेमा को भी 'सैटान्टैंगो' और 'द ट्यूरिन हॉर्स' जैसी उत्कृष्ट फ़िल्में दी हैं, जो उनके साहित्य की दृश्य-गहनता को दर्शाती हैं।

वैश्विक दृष्टि और मानवीय सरोकार

क्रास्ज़्नाहोरकाई की दृष्टि केवल हंगरी तक सीमित नहीं रही। 1990 के दशक में मंगोलिया, चीन और जापान की उनकी यात्राओं ने उनके लेखन में सुदूर पूर्व के सौंदर्यशास्त्र और दर्शन को पिरो दिया। वे एक ऐसे लेखक हैं जो आज के राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी मुखर रहते हैं। यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के समय उनकी टिप्पणियाँ और हंगरी की सरकार की नीतियों के प्रति उनका तार्किक विरोध यह दर्शाता है कि वे केवल एकांत के रचनाकार नहीं, बल्कि एक सजग नागरिक भी हैं।

क्यों पढ़ें क्रास्ज़्नाहोरकाई को?

पाठकों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि जिस लेखक को 'कठिन' कहा जाता है, उसे क्यों पढ़ा जाए? इसका उत्तर उनकी कला में छिपा है। वे हमें सिखाते हैं कि जब दुनिया बिखर रही हो, जब नैतिक मूल्य समाप्त हो रहे हों, तब केवल कला और सौंदर्य ही वह सूत्र हैं जो हमें मनुष्य बनाए रखते हैं। उनका गद्य एक बहती हुई नदी की तरह है, शुरुआत में शायद इसकी गहराई डराए, लेकिन एक बार जब आप इसमें उतरते हैं, तो यह आपको आत्म-साक्षात्कार के नए तटों पर ले जाती है।
2015 में मैन बुकर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बाद अब 2025 का नोबेल पुरस्कार इस महान लेखक की साधना का उचित सम्मान है। लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई का साहित्य हमें याद दिलाता है कि निराशा के अंधेरे में भी शब्दों की एक मशाल जलती रहती है।


विश्व -क्षितिज/ संपादकीय विशेषांक 
अमन कुमार होली 
© संपादक, मीमांसा

अस्वीकरण (Disclaimer) :
इस स्तंभ में प्रस्तुत जानकारी विभिन्न वैश्विक स्रोतों, विकिपीडिया और आधिकारिक साहित्यिक अभिलेखों पर आधारित है। यद्यपि हम सूचना की सटीकता और सुस्पष्टता सुनिश्चित करने का हरसंभव प्रयास करते हैं, फिर भी अनुवाद की प्रकृति और साहित्यिक व्याख्याओं के कारण कुछ भिन्नता संभव है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के दार्शनिक और व्यक्तिगत दृष्टिकोण को दर्शाते हैं, जिनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि केवल अकादमिक और साहित्यिक विमर्श को बढ़ावा देना है।
 
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