वेब पत्रिका 'मीमांसा' स्वदेश-स्वर विशेषांक उद्देशिका : अपनी माटी की सुवास और विविध बोलियों का वात्सल्य (भारतीय वाङ्मय और भाषाओं का अनवरत वैचारिक अनुष्ठान)
प्रस्तावना : हृदय की भाषा और आत्मीयता का सेतु
साहित्य मात्र अक्षरों का विन्यास नहीं है; यह तो उस लोनी (मक्खन) की तरह है जो समाज के अनुभवों के मंथन से निकलता है। जब हम अपनी मातृभूमि की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि यहाँ की हर पगडंडी, हर नदी और हर पहाड़ की अपनी एक बोली है, अपनी एक गाथा है। भारत जैसे विशाल और ममतामयी देश में, जहाँ 'कोस-कोस पर पानी बदले और चार कोस पर वाणी', वहाँ साहित्य ही वह सूत्र है जो हमें एक-दूसरे के हृदय से जोड़ता है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' का नवीन स्तंभ 'स्वदेश-स्वर' उसी वात्सल्यमयी चेतना का आह्वान है, जो हमें अपनी ही माटी की उन सुरीली ध्वनियों से मिलवाएगा, जिन्हें हम अक्सर भाषाई सीमाओं के कारण सुन नहीं पाते।
विविधता का पालना और एकता की लोरी
हमारी भारतीय संस्कृति एक ऐसी माँ के समान है जिसके आँचल में २२ से अधिक भाषाएँ अपनी-अपनी मिठास लेकर खेल रही हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज ये भाषाएँ केवल प्रशासनिक शब्दकोश का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये हज़ारों वर्षों की स्मृतियों, संघर्षों, त्योहारों और प्रेम की धरोहर हैं। हिंदी हमारी अपनी है, हमारा गौरव है, किंतु हमारी अन्य बहन भाषाएँ चाहे वह तमिल की प्राचीन गरिमा हो, बांग्ला की माधुर्यपूर्ण कोमलता हो, या मराठी की ओजस्वी वीरता वे भी उसी भारत-माता के मुख की आभा हैं।
अक्सर हम पश्चिम की ओर निहारते हैं, वैश्विक क्षितिज की चकाचौंध में दूर देश के रचनाकारों को पढ़ते हैं, जो कि उचित भी है। किंतु, क्या यह विडंबना नहीं कि हम अपने ही पड़ोसी प्रांत की साहित्यिक खुशबू से महरूम रह जाते हैं? 'स्वदेश-स्वर' इसी दूरी को मिटाने की एक ममतामयी पहल है। यह एक माँ का अपने बच्चों को एक साथ बैठकर प्रेम-भोज कराने जैसा अनुष्ठान है।
अक्षर-अक्ष में समाहित राष्ट्र की आत्मा
जब हम मलयालम के किसी कवि की पंक्तियों को पढ़ते हैं, तो हमें उसमें वही दर्द और वही छटपटाहट सुनाई देती है जो उत्तर भारत के किसी गाँव के चौपाल पर सुनाई देती है। जब हम असमिया के 'बोरगीत' सुनते हैं या पंजाबी की 'हीर' की तान सुनते हैं, तो भाषा भले ही समझ न आए, पर उसका 'स्वर' सीधे रूह को छूता है। यही वह 'स्वदेश-स्वर' है जिसे 'मीमांसा' अपने इस विशेष स्तंभ के माध्यम से मुखरित करना चाहती है।
यह स्तंभ केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं होगा, बल्कि यह एक 'समावेशी मीमांसा' होगी। समालोचना का अर्थ यहाँ किसी को छोटा या बड़ा दिखाना नहीं, बल्कि सुचितापूर्ण ढंग से उस रचना की गहराई में उतरना है। जैसे एक माँ अपनी संतान के गुणों को संसार के सामने गर्व से रखती है, वैसे ही यह स्तंभ भारतीय भाषाओं के उन रत्नों को तराशकर हिंदी जगत् के सामने लाएगा।
कालजयी रचनाकार: स्मृतियों का तर्पण
'स्वदेश-स्वर' का एक मुख्य पड़ाव उन महान ऋषियों (साहित्यकारों) की जन्मजयंती और पुण्यतिथि का स्मरण होगा, जिन्होंने अपने रक्त से साहित्य को सींचा है। चाहे वह सुब्रमण्यम भारती की राष्ट्रभक्ति हो, कबीर की निर्भीकता हो, या महाश्वेता देवी की संघर्षशीलता; ये सभी व्यक्तित्व हमारे वैचारिक पुरखे हैं। उनकी स्मृतियों को केवल पंचांग के पन्नों तक सीमित न रखकर, उनके कृतित्व पर गहन विमर्श करना हमारा लक्ष्य है।
जब हम किसी महान कवि की पुण्यतिथि पर उसकी रचनाओं की मीमांसा करेंगे, तो वह केवल एक श्रद्धांजलि नहीं होगी, बल्कि वह आने वाली पीढ़ी के लिए एक पाथेय होगा। हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि एक कन्नड़ उपन्यासकार या एक कश्मीरी कवयित्री ने अपने समय के सच को किस प्रकार अपनी संवेदनाओं में ढाला।
सुचिता और समावेशिता: साहित्य का धर्म
आज के दौर में जहाँ विमर्श अक्सर खंडित और विभाजित होने लगा है, 'स्वदेश-स्वर' अपनी सुचिता और शुचिता (पवित्रता) को बनाए रखने का संकल्प लेता है। हमारा दृष्टिकोण समावेशी होगा जहाँ हाशिये की आवाजों को भी वही सम्मान मिलेगा जो मुख्यधारा को प्राप्त है। डोगरी, संथाली, बोडो, और कोंकणी जैसी भाषाओं का सौंदर्य भी इस स्तंभ की शोभा बढ़ाएगा।
यह स्तंभ एक ऐसा 'वैचारिक अनुष्ठान' है जहाँ हम भाषाई अहंकार को त्यागकर, जिज्ञासु बनकर एक-दूसरे से सीखेंगे। अनुवाद यहाँ मात्र शब्दों का रूपांतरण नहीं होगा, बल्कि वह भावनाओं का सेतु होगा। एक भाषा की सुगंध जब दूसरी भाषा के आँगन में प्रवेश करती है, तो वह पूरे वातावरण को अधिक पवित्र बना देती है।
हमारा संकल्प: एक अटूट संवाद
'मीमांसा' के इस नए सोपान का संकल्प अत्यंत दृढ़ और भावुक है। हम चाहते हैं कि हिंदी पाठक जब इस स्तंभ को पढ़ें, तो उन्हें महसूस हो कि केरल के समुद्र तट पर बैठा कवि और लद्दाख की पहाड़ियों में गीत लिखता गीतकार, दोनों उनके अपने हैं। मलयालम की गहराई, बांग्ला की मिठास, ओड़िया की सरलता और गुजराती का जीवट-इन सब का संगम ही 'स्वदेश-स्वर' है।
यह स्तंभ उन सभी सुधी पाठकों और चिंतकों के लिए एक आमंत्रण है, जो भारतीय वाङ्मय की इस विशाल सरिता में डुबकी लगाना चाहते हैं। आइए, हम सब मिलकर अपनी इन २२ भाषाओं के मोतियों को पिरोकर एक ऐसी माला बनाएँ जो भारत-भारती के कंठ का हार बने।
उपसंहार: माटी का स्वर, जन-जन का स्वर
अंततः, 'स्वदेश-स्वर' कोई निर्जीव शीर्षक नहीं है; यह एक जीवित स्पंदन है। यह उस भारत की आवाज़ है जो विविधता में ही अपनी शक्ति ढूंढता है। यह उस माँ की ममता का विस्तार है जो अपने हर बच्चे की बोली में प्यार ढूंढ लेती है। 'मीमांसा' का यह प्रयास तभी सफल होगा जब हम इन विभिन्न भाषाओं के माध्यम से एक-दूसरे के और निकट आएंगे।
आइए, इस अनुष्ठान में सहभागी बनें। अपनी भाषाओं का सम्मान करें, उनके लेखकों को पढ़ें, और उस असीम प्रेम को महसूस करें जो हमारी मिट्टी के कण-कण में बसा है। 'स्वदेश-स्वर' अब आपका अपना स्तंभ है, अपनी जड़ों की ओर लौटने का एक मधुर निमंत्रण है।
अस्वीकरण एवं कॉपीराइट चेतावनी
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इस विशेषांक में प्रकाशित विचार पत्रिका का उद्देश्य केवल भारतीय भाषाओं और साहित्य का संवर्धन करना है।
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