मीमांसा विशेषांक प्रेरणा स्तंभ : मौलिक प्रज्ञा के महान शिल्पी और अक्षरों के आधुनिक तपस्वी पीयूष गोयल


प्रस्तुत आलेख केवल एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि उस 'अदृश्य शक्ति' की व्याख्या है जो शून्य से सृजन की ओर ले जाती है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' आपको रूबरू करा रही है साधना के सारस्वत प्रतीक पीयूष गोयल जी से। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब शरीर की सीमाएं समाप्त होती हैं, तब आत्मा का विस्तार शुरू होता है।

प्रज्ञा की अनूठी साधना से : शब्दों और अक्षरों की तपस्या तक 

संसार की भीड़ में हम अक्सर उन्हीं चेहरों को देखते हैं जो चमक-धमक का हिस्सा होते हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो सन्नाटे में रहकर इतिहास रचते हैं। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस प्रेरणा स्तंभ में आज हम एक ऐसे ही 'शिल्प-साधक' की चर्चा कर रहे हैं, जिनकी उंगलियों ने कलम की जगह सुई, कील और मेंहदी के कोन को थामकर साहित्य के व्याकरण को ही बदल दिया। यह कहानी है पीयूष गोयल की एक ऐसा नाम, जिसने नियति के क्रूर प्रहार को अपनी शक्ति बनाकर अक्षरों को 'दर्पण' के उस पार से खींचकर धरातल पर जीवंत कर दिया। 

वो नौ महीने और नियति का खेल

वर्ष 2000 की एक सर्द शाम। एक मेधावी डिप्लोमा मैकेनिकल इंजीनियर, जिसका जीवन मशीनों और गणित के समीकरणों के इर्द-गिर्द घूम रहा था, एक भयानक दुर्घटना का शिकार हो जाता है। अस्पताल का वह सफेद कमरा, दवाओं की गंध और शरीर की लाचारी। नौ महीने तक बिस्तर पर पड़े रहना किसी भी जीवंत व्यक्ति के लिए मानसिक मृत्यु के समान हो सकता था। लेकिन यहाँ एक सस्पेंस छिपा था। नियति पीयूष को तोड़ नहीं रही थी, बल्कि उन्हें गढ़ रही थी। उन नौ महीनों के एकांत में उन्होंने श्रीमद्भगवदगीता का दामन थामा। जब शरीर थमा हुआ था, तब मस्तिष्क 'अध्यात्म' की गहराइयों में गोते लगा रहा था। यहीं से शुरू हुई वह मानसिक यात्रा, जिसने एक इंजीनियर को 'आधुनिक ऋषि' में बदल दिया। उन्होंने गीता के कर्मयोग को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि उसे अपने रक्त में उतार लिया।

अक्षरों का 'उलटा' सफर (मिरर इमेज लेखन)

जैसे ही पीयूष स्वस्थ हुए, उनके भीतर कुछ असाधारण करने की तड़प जागी। उन्होंने एक ऐसी शैली चुनी जिसे दुनिया 'मिरर इमेज' (दर्पण प्रतिबिंब) कहती है। शुरुआत में लोगों को लगा कि यह महज एक खेल है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अक्षरों को उल्टा लिखना कितना कठिन है? इसके लिए मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों (Hemispheres) को एक साथ साधनी पड़ती है।

     (उल्टे अक्षरों में लिखी गई श्रीमद् भागवत गीता)

पीयूष ने जब गीता को उल्टा लिखना शुरू किया, तो वह केवल लेखन नहीं था, वह एक ध्यान था। उनके लिखे पन्नों को जब आप देखेंगे, तो वे किसी अज्ञात लिपि की तरह लगेंगे एक रहस्यमयी कूटभाषा। लेकिन जैसे ही आप उस पन्ने के सामने दर्पण लाते हैं, अक्षर खिलखिलाकर बोल उठते हैं। यह एक दार्शनिक संकेत भी था, सत्य को देखने के लिए अक्सर हमें अपने नजरिए को बदलना पड़ता है।

सुई की नोक पर 'मधुशाला' का निर्माण

पीयूष की यात्रा यहाँ थमी नहीं। समाज अक्सर प्रश्न करता है, और वही प्रश्न आविष्कार की जननी बनते हैं। लोगों ने कहा, "पीयूष जी, आपकी कला को पढ़ने के लिए दर्पण ढूँढना पड़ेगा, कुछ ऐसा कीजिए कि दर्पण की जरूरत न रहे।" इस रूप में देखें तो हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला में लिखी गई यही पंक्ति पीयूष गोयल के लिए प्रेरणाक स्रोत बन गई कि

 ‘'किस पथ से जाऊँ ? असमंजस में है वह भोलाभाला;

अलग-अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ-

राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।''

यहीं से शुरू हुआ दुनिया का सबसे अनूठा प्रयोग। पीयूष ने सुई उठाई। कल्पना कीजिए, कागज का एक पन्ना और हाथ में एक बारीक सुई। हरिवंश राय बच्चन की कालजयी कृति 'मधुशाला' की हर पंक्ति को उन्होंने सुई से कागज पर कुरेदा। ढाई महीने की अथक तपस्या। जब आप उस पन्ने को पलटते हैं, तो पीछे की ओर उभरे हुए शब्द किसी ब्रेल लिपि की तरह नहीं, बल्कि मोतियों की माला की तरह महसूस होते हैं। इसे पढ़ने के लिए अब दर्पण की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उभरे हुए शब्द खुद अपनी गवाही दे रहे थे। यह दुनिया की पहली ऐसी 'मधुशाला' थी जो सुई से लिखी गई थी।


(सुई से लिखी गई  हरिवंशराय बच्चन की मधुशाला)

मेंहदी की महक और 'गीतांजलि' का समर्पण

प्राचीन काल में ऋषि-मुनि प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करते थे। पीयूष ने इसी परंपरा को आधुनिक रूप दिया। वर्ष 2012 में उन्होंने एक और चमत्कार किया। 1913 में साहित्य का नोबेल जीतने वाली रवींद्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' को उन्होंने 'मेंहदी के कोन' से लिखना शुरू किया। जैसा कि पीयूष गोयल जी बताते हैं कि "महज 28 दिनों के भीतर, 17 मेंहदी के कोनों की मदद से 103 अध्यायों को लिपिबद्ध करना मानवीय क्षमताओं की परीक्षा थी। मेंहदी की वह खुशबू और टैगोर के शब्द- दोनों मिलकर एक ऐसा आध्यात्मिक वातावरण बनाते हैं जो पाठक को सम्मोहित कर देता है।" 

पीयूष गोयल जी समकालीन भारतीय चेतना के उन विरल साधकों में हैं, जिनके लिए परंपरा केवल स्मृति नहीं, बल्कि सृजन का जीवंत आधार है। ‘गीतांजलि’ जैसी कालजयी कृति की पांडुलिपि को मेहंदी से अंकित करने का उनका अभिनव उपक्रम भारतीय सनातन सौंदर्यबोध का विलक्षण उदाहरण है। यह कार्य केवल कलात्मक कौशल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि श्रम, साधना और श्रद्धा के त्रिवेणी-संगम से उपजा एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है।

मेहंदी जैसी लोक-परंपरा को वैश्विक साहित्य की अमर कृति से जोड़कर उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय कला-दृष्टि में हाथों का श्रम भी साधना है और सौंदर्य भी। उनके इस प्रयास में रचनात्मक अनुशासन, धैर्य और आत्मिक एकाग्रता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है जो सनातन परंपरा के मूल मूल्यों का आधुनिक प्रतिरूप है।

पीयूष गोयल जी का यह कार्य न केवल ‘गीतांजलि’ को एक नवीन दृश्य-भाषा प्रदान करता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत तब और समृद्ध होती है, जब उसे समकालीन संवेदनाओं के साथ सम्मानपूर्वक पुनर्सृजित किया जाए। साहित्य, कला और परंपरा के इस सेतु-निर्माण के लिए वे निश्चय ही प्रशंसा के अधिकारी हैं


       (मेहंदी से लिखी गई  गीतांजलि की पांडुलिपि) 

उन्होंने न केवल गीतांजलि, बल्कि 'श्री दुर्गा सप्तशती', 'सुंदरकांड' और 'श्री साईं सत्चरित्र' को भी अपनी इस अद्भुत कला से सजाया। शिल्प कला का अगला सोपान और भी कठिन था। कागज को सुई से छेदना एक बात है, लेकिन एल्युमिनियम की चादर पर लिखना? हाॅं यह संभव हुआ।

भारतीय धातु-विज्ञान और प्रज्ञा का उत्कर्ष : पीयूष गोयल का सृजनात्मक कर्म

पीयूष ने अपनी ही पुस्तक 'पीयूष वाणी' को ए-फोर साइज की एल्युमिनियम शीट पर एक कील की मदद से उकेरा।

     (एल्युमिनियम शीट पर लिखी गई पीयूष वाणी)

यह कार्य किसी कठोर तपस्या से कम नहीं था। हर शब्द के पीछे एक प्रहार था, हर अक्षर के पीछे एक संकल्प था। कील और धातु का वह घर्षण पीयूष के धैर्य की परीक्षा ले रहा था। यह कृति दर्शाती है कि जब इच्छाशक्ति प्रबल हो, तो कठोर धातु भी मोम की तरह शब्दों को जगह देती है। 

कील और एल्युमिनियम शीट के बीच घटित होता यह संघर्ष मात्र भौतिक नहीं था, वह भारतीय ज्ञान-परंपरा के उस सूक्ष्म बोध का पुनर्स्मरण है जहाँ धातु को जड़ नहीं, प्रत्युत संवेदनशील तत्व माना गया है। प्राचीन भारतीय धातु-विज्ञान में धातु को पंचमहाभूतों की संतुलित अभिव्यक्ति माना गया जिसे ताप, दबाव और समय के माध्यम से रूपांतरित किया जाता है। पीयूष गोयल द्वारा ‘पीयूष वाणी’ को ए-फोर आकार की एल्युमिनियम शीट पर कील से उकेरना इसी सनातन बोध का आधुनिक प्रतिरूप है।

यह कार्य केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि धातु के स्वभाव की गहन समझ का प्रमाण है। एल्युमिनियम जो हल्की होते हुए भी दृढ़ता का प्रतीक है, उस पर कील से शब्द उकेरना धैर्य, गति और दबाव के सूक्ष्म संतुलन की माँग करता है। भारतीय शिल्प परंपरा में जैसे लोहार धातु की प्रकृति को समझकर प्रहार करता है, वैसे ही पीयूष गोयल ने प्रत्येक अक्षर को उसकी सहनशीलता के अनुरूप साधा। हर प्रहार में आक्रामकता नहीं, बल्कि नियंत्रित चेतना थी; हर शब्द में आवेग नहीं, बल्कि अनुशासित ऊर्जा।

यह कृति संघर्ष की पराकाष्ठा का साक्ष्य है जहाँ धातु के साथ संघर्ष अंततः संवाद में बदल जाता है। कील और शीट का घर्षण यहाँ प्रज्ञा का औज़ार बनता है और पीयूष का ज्ञान उस संघर्ष को अर्थ प्रदान करता है। ‘पीयूष वाणी’ इस रूप में केवल पाठ नहीं रहती, वह भारतीय धातु-विज्ञान की अंतर्धारा से जुड़कर एक तपःशिल्प बन जाती है जहाँ श्रम, ज्ञान और संकल्प मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि जब इच्छाशक्ति और बौद्धिक अनुशासन एक हो जाएँ, तब कठोर धातु भी चेतना की भाषा बोलने लगती है।

कार्बन, चेतना और करुणा : पीयूष गोयल के प्रति स्तुत्य वाणी

पीयूष गोयल जी को जब हम केवल एक शिल्पकार या कलाकार के रूप में देखते हैं, तब हम उनके व्यक्तित्व के विराट आयाम को संकुचित कर देते हैं। वे वस्तुतः एक चिंतक मनीषी हैं ऐसे साधक, जिनके लिए विज्ञान और सनातन परंपरा विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। ‘पंचतंत्र’ का कार्बन पेपर से लेखन इस तथ्य का जीवंत प्रमाण है कि उनकी इंजीनियरिंग-बुद्धि केवल तकनीकी दक्षता तक सीमित नहीं, बल्कि वह करुणा, धैर्य और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व से अनुप्राणित है।

(कार्बन पेपर पर लिखा गया विष्णु शर्मा रचित पंचतंत्र कथा)

कार्बन पेपर का यह प्रयोग मात्र युक्ति नहीं, वह विज्ञान की सूक्ष्म समझ का काव्यात्मक रूपांतरण है। दर्पण-छवि में लिखते हुए वास्तविक शब्दों को सजीव करना यह वही द्वैत है जिसे भारतीय दर्शन माया और ब्रह्म, प्रतिबिंब और सत्य के रूप में समझाता है। एक ओर उल्टा लिखा गया अक्षर, दूसरी ओर सीधा अर्थ यह कर्म और फल, साधना और सिद्धि का अद्भुत रूपक बन जाता है। इस ‘दोहरी मेहनत’ में पीयूष गोयल का श्रम केवल हाथों में नहीं, हृदय में भी उतरता है।

आचार्य विष्णुशर्मा के ‘पंचतंत्र’ को इस विधि से लिखना मानो ज्ञान को दो स्तरों पर साधने जैसा है एक स्तर पर तकनीकी अनुशासन, दूसरे पर नैतिक बोध। यह वही सनातन परंपरा है, जहाँ शिक्षा केवल सूचना नहीं, संस्कार होती है; और जहाँ साधक अपने श्रम से आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। पीयूष गोयल इस परंपरा के आधुनिक संवाहक हैं जो विज्ञान की भाषा में संस्कृति को सहेजते हैं।

उनकी वाणी में मातृवत्सलता है जो शोर नहीं मचाती, बल्कि चुपचाप पोषण करती है। उनके कर्म में मधुरता है जो कठोर माध्यमों (धातु, कील, कार्बन) के बावजूद कोमल संदेश रचती है। और उनके लक्ष्य में वैश्विक दृष्टि हैजहाँ भारतीय ज्ञान-परंपरा केवल स्मृति नहीं, बल्कि विश्व-पटल पर नए कीर्तिमान रचने की प्रेरणा बनती है।

ऐसे कर्मयोगी के लिए शब्द भी कम पड़ते हैं, फिर भी यह कहना अनुचित न होगा कि पीयूष गोयल जी अपने सृजन से यह सिद्ध करते हैं, जब विज्ञान श्रद्धा से जुड़ता है, जब कला अनुशासन से सिंचित होती है, और जब परंपरा भविष्य की ओर देखती है तब संस्कृति केवल बचती नहीं, बल्कि विश्व को आलोकित करती है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश

श्रीमती रविकांता और डॉ. दवेंद्र कुमार गोयल के सुपुत्र पीयूष गोयल आज केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि एक 'संस्था' बन चुके हैं। उनकी यह यात्रा हमें सिखाती है कि शरीर को चोट लग सकती है, लेकिन आत्मा और रचनात्मकता को कोई दुर्घटना नहीं रोक सकती।

उन्होंने कहा है कि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ "नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो" पीयूष के जीवन का प्रतिबिंब हैं। उन्होंने सिद्ध किया है कि मौलिक प्रज्ञा (Original Intelligence) किसी मशीन की मोहताज नहीं होती। वह तो साधक के भीतर छिपी होती है, बस उसे जगाने के लिए एक 'धून' की आवश्यकता होती है।

पीयूष गोयल की कला यात्रा केवल एक कलाकार के कौशल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह प्रज्ञा (Intuitive Intelligence) और साधना (Spiritual Discipline) के उस अद्वैत संगम का प्रमाण है, जिसकी खोज वैश्विक स्तर पर आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस (Neuroscience) आज कर रहा है।

'मीमांसा' के पाठकों के लिए यहाँ एक मौलिक चिंतन प्रस्तुत है, जो पीयूष गोयल की 'शिल्प-शब्द' तपस्या को वैश्विक अनुसंधान, सतत विकास और पारंपरिक मूल्यों के नए कलेवर के रूप में विश्लेषित करता है।

प्रेरणा का महाशिल्प: साधना, विज्ञान और मौलिक प्रज्ञा का वैश्विक विमर्श मीमांसा के दृष्टिकोण से 

1. अक्षरों की शुचिता और 'न्यूरो-प्लास्टिसिटी'  

वैश्विक फलक का संदर्भ लें तो आज का आधुनिक विज्ञान जिसे 'Neuroplasticity' कहता है यानी मस्तिष्क की वह क्षमता जो प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को पुनर्गठित कर लेती है उसका जीवंत उदाहरण पीयूष गोयल के उन नौ महीनों के एकांत में मिलता है। वैश्विक स्तर पर हुए अनुसंधान बताते हैं कि जब मनुष्य का शरीर गतिहीन होता है, तब उसकी 'चेतना' सूक्ष्मतर आयामों को स्पर्श करती है।

पीयूष जी का 'मिरर इमेज' (दर्पण प्रतिबिंब) लेखन मात्र एक कलात्मक चमत्कार नहीं है। हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड जैसे संस्थानों में हुए अध्ययनों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपनी स्वाभाविक लेखन शैली के विपरीत (जैसे उल्टा लिखना) अभ्यास करता है, तो उसके मस्तिष्क के Left and Right Hemispheres के बीच एक नया 'सिनैप्टिक ब्रिज' बनता है। यह 'मौलिक प्रज्ञा' का वह आविष्कार है जहाँ तर्क और सृजन (Logic and Creativity) एक बिंदु पर मिल जाते हैं। पीयूष की कला इस वैज्ञानिक सत्य का 'साधनात्मक' विस्तार है।

2. सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development) और कलात्मक शुचिता का भारतीयकरण 

वैश्विक स्तर पर आज 'Sustainable Development Goals' (SDG) में मानसिक स्वास्थ्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर बल दिया जा रहा है। पीयूष गोयल की तकनीक इस सतत विकास में एक अनूठा आयाम जोड़ती है। 

प्राकृतिक संसाधनों का समावेशन: मेंहदी के कोन से 'गीतांजलि' लिखना इस बात का प्रतीक है कि कला के लिए कृत्रिम रंगों या महँगे उपकरणों की आवश्यकता नहीं है। यह 'इको-फ्रेंडली' कला का वह स्वरूप है जो प्रकृति (मेंहदी की महक़) और संस्कृति (टैगोर के शब्द) को एक सूत्र में पिरोता है।

श्रम की शुचिता: एल्युमिनियम शीट पर कील से लिखना 'Industrial Waste' या कठोर धातु को 'आध्यात्मिक अभिव्यक्ति' में बदलने की प्रक्रिया है। यह वैश्विक स्तर पर 'Upcycling' के विचार को एक दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करता है।

3. सुई की तपस्या: 'ब्रेल' से परे संवेदना का स्पर्श

जहाँ आधुनिक तकनीक ने दृष्टिबाधितों के लिए 'ब्रेल लिपि' का आविष्कार किया, वहीं पीयूष गोयल ने सुई के माध्यम से 'मधुशाला' को उकेरकर इसे एक 'Sensory Experience' (संवेदी अनुभव) बना दिया। वैश्विक अनुसंधान आज 'Haptic Technology' (स्पर्श आधारित तकनीक) पर करोड़ों डॉलर खर्च कर रहा है ताकि मनुष्य मशीनों को महसूस कर सके।

पीयूष जी ने बिना किसी लैब के, केवल अपनी उंगलियों की पोरों और सुई की नोक से वह 'अनुभव-तंत्र' विकसित किया, जहाँ शब्द केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि छुए और महसूस किए जाते हैं। यह कला का वह 'मातृ-वत्सल' रूप है जहाँ सृजनकर्ता अपने शब्दों को माँ की तरह दुलारकर उभारता है, ताकि अंधेरे में बैठा व्यक्ति भी साहित्य की ज्योति का स्पर्श पा सके।

4. साधना और कला के पारंपरिक मूल्यों का नव-संस्करण

प्राचीन भारत में 'लेखन' एक यज्ञ था। ताड़पत्रों पर सुईनुमा लेखनी से लिखना हमारी विलुप्त होती परंपरा थी। पीयूष गोयल ने अपनी 'साधना' से इस पारंपरिक मूल्य को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित किया है।

तुलनात्मक रूप में देखें तो आज का वैश्विक समाज 'डिजिटल थकान' (Digital Fatigue) से जूझ रहा है। कीबोर्ड पर टाइप करना या एआई (AI) से चित्र बनवाना 'आत्मा' से रहित प्रक्रियाएँ हैं। इसके विपरीत, पीयूष गोयल की 'अक्षरों की तपस्या' मानवीय धैर्य का आह्वान करती है। उनकी कला सिखाती है कि:

 धैर्य (Patience): मेंहदी से 28 दिन तक लिखना।

संकल्प (Willpower): धातु पर कील से प्रहार करना।

एकाग्रता (Concentration): दर्पण प्रतिबिंब में त्रुटिहीनता।

यह 'स्लो आर्ट मूवमेंट' (Slow Art Movement) का एक वैश्विक भारतीय चेहरा है, जो बताता है कि वास्तविक आविष्कार बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की अनंत गहराइयों में है।

निष्कर्ष: एक वैश्विक आह्वान

पीयूष गोयल की 'पीयूष वाणी' और उनका 'शिल्प-शब्द' संसार केवल रिकॉर्ड्स की उपलब्धि नहीं है। यह आधुनिकता के शोर में 'मौन की गूँज' है। यह उस 'शुचिता' का आह्वान है जो मशीनीकरण के दौर में मनुष्य की संवेदनाओं को जीवित रखती है। उनकी कला में एक 'मातृ-वत्सलता' है जैसे एक माँ अपनी संतान को पालती है, वैसे ही उन्होंने अपनी पीड़ा को नौ महीनों के 'गभर्वास' (अस्पताल के बेड पर) में पाला और फिर उसे 'अक्षरों' के रूप में जन्म दिया।

आज जब विश्व 'मौलिक प्रज्ञा' (Original Intelligence) की तलाश में भटक रहा है, पीयूष गोयल का जीवन एक "प्रेरणा स्तंभ" की तरह खड़ा है। वह हमें याद दिलाते हैं कि:

 "साधना जब कला बनती है, तो वह इतिहास के पन्नों पर नहीं, बल्कि मनुष्यता की चेतना पर अंकित हो जाती है।"

नोट: यह आलेख मीमांसा के पाठकों के लिए एक दस्तावेज है, जो बताता है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति अपनी 'साधना' से असाधारण बन जाता है। पीयूष गोयल के अक्षरों में केवल स्याही नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और संकल्प का रक्त समाहित है।

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के माध्यम से यह चिंतन नई पीढ़ी के लिए एक संदेश है अपने संघर्षों को 'शिल्प' बनाओ, अपनी वेदना को 'शब्द' दो, और अपनी एकाग्रता को 'ईश्वर' बना लो। यही वह 'सतत विकास' है जो हमें रोबोट बनने से बचाएगा और 'महामानव' की श्रेणी में खड़ा करेगा।


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तथ्यात्मक विवरण: लेख में वर्णित घटनाएं, तिथियां और कलात्मक तकनीकें शोध एवं उक्त शख्सियत द्वारा प्रदत्त जानकारी पर आधारित हैं। कलाकृतियों के निर्माण की प्रक्रिया लेखक/कलाकार के व्यक्तिगत अनुभव हैं; पत्रिका इनके अभ्यास से होने वाले किसी भी परिणाम की जिम्मेदारी नहीं लेती।

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