वेब पत्रिका 'मीमांसा' संपादकीय जयंती विशेषांक आलेख : आधुनिक भारत के 'भाषा-ऋषि' सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन भाषा एवं लोक बोलियों के अनन्य उपासक।


आज 7 जनवरी है एक ऐसी विभूति का जन्मदिवस, जिसने सात समंदर पार से आकर भारतीय मानस और यहाँ की माटी की बोलियों को वह सम्मान दिलाया, जिसकी वे हकदार थीं। आज 'मीमांसा' के इस जीवनी विशेषांक में हम आधुनिक भारत के प्रथम भाषा वैज्ञानिक, महान प्राच्यविद्या विशारद और भारतीय बोलियों के अनन्य उपासक सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन की 175वीं जयंती पर उन्हें कोटिशः श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 

इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सीमाओं के बंधन तोड़कर मानवता और ज्ञान के सार्वभौमिक दूत बन जाते हैं। सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन एक ऐसा ही नाम है। डब्लिन (आयरलैंड) की ठंडी हवाओं में पले-बढ़े इस महापुरुष ने गंगा-यमुना की धाराओं और बिहार के खेतों-खलिहानों में गूँजने वाली लोक-बोलियों को अपनी आत्मा का हिस्सा बना लिया। 'मीमांसा' के मूल्यों जिज्ञासा, शोध और सत्य के अन्वेषण को यदि किसी एक व्यक्तित्व में चरितार्थ होते देखना हो, तो ग्रियर्सन का जीवन हमारे लिए एक प्रकाश-स्तंभ है।

जॉर्ज ग्रियर्सन केवल एक ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक अधिकारी (I.C.S.) नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे 'साधक' थे, जिन्होंने फाइलों के अंबार के बीच से भारतीय जन-भाषाओं की खुशबू को पहचाना। 1851 में आयरलैंड में जन्मे ग्रियर्सन ने जब भारत की धरती पर कदम रखा, तो उन्होंने यहाँ की विविधता को समस्या नहीं, बल्कि एक संपदा माना।

अमर कीर्ति-स्तंभ: 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया'

ग्रियर्सन का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है उनके महती कार्य 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' (भारतीय भाषाई सर्वेक्षण) के लिए। 21 जिल्दों में फैला यह सर्वेक्षण केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत का भाषाई मानचित्र है। उन्होंने 179 भाषाओं और 544 बोलियों का जो सूक्ष्म विश्लेषण किया, वह आज भी भाषाविज्ञान के छात्रों के लिए 'वेद' के समान है।

 "बुद्ध और अशोक के शिलालेखों के बाद, ग्रियर्सन का सर्वेक्षण ही वह सेतु है जो भारत की लोक-भाषाओं को शास्त्रीय गरिमा प्रदान करता है।"

हिंदी और लोक-साहित्य के उन्नायक

ग्रियर्सन का हृदय ब्रज, अवधी, मैथिली और भोजपुरी जैसी बोलियों के लिए धड़कता था। वे संभवतः पहले अंग्रेज विद्वान थे जिन्होंने महाकवि तुलसीदास और विद्यापति के साहित्य के मर्म को वैश्विक पटल पर रखा। 'द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान' लिखकर उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की ठोस नींव रखी। 'बिहार पेजेंट लाइफ' के माध्यम से उन्होंने यहाँ के किसानों और ग्रामीण जनजीवन का जो सजीव चित्रण किया, वह उनकी गहरी संवेदनशीलता का परिचायक है।

एक विदेशी का भारतीय अनुराग

ग्रियर्सन का भारत प्रेम केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आत्मिक था। उन्होंने कश्मीरी, मैथिली और बिहारी बोलियों के व्याकरण और शब्दकोश तैयार किए ताकि ये भाषाएँ काल के कपाल पर अमिट हो सकें। नागरी प्रचारिणी सभा के मानद सदस्य के रूप में उनका योगदान हिंदी जगत कभी नहीं भूल सकता। भारत सरकार द्वारा उनकी स्मृति में स्थापित 'डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कार' आज भी उन विदेशी विद्वानों को दिया जाता है जो हिंदी की सेवा में रत हैं।

भारतीय वाङ्मय के अनन्य 'साधक' और 'सर्जक'

रचनात्मक संसार : जहाँ लोक-धूनें शास्त्र बन गईं
ग्रियर्सन का रचनात्मक कार्य केवल शुष्क अकादमिक लेखन नहीं था, बल्कि वह एक 'सरस' अनुराग की गाथा थी। उन्होंने सरकारी पद की गरिमा और व्यस्तता के बीच भी भारतीय लोक-संस्कृति के उन रत्नों को खोज निकाला, जिन्हें समय की धूल ने ढक दिया था।
उनका कार्य 'बिहार पेजेंट लाइफ' (Bihar Peasant Life) केवल एक कैटलॉग नहीं है, बल्कि वह बिहार के ग्रामीण जीवन का एक सजीव महाकाव्य है। इसमें उन्होंने हल की नोक से लेकर बैलगाड़ी के पहिए तक, और किसान के घर के चूल्हे से लेकर खेतों में गाए जाने वाले गीतों तक का इतना सूक्ष्म वर्णन किया है कि पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो हम 19वीं सदी के किसी भारतीय गाँव की गलियों में टहल रहे हों।
उनकी लेखनी की सरसता का प्रमाण उनके द्वारा संकलित लोकगीतों में मिलता है। उन्होंने राजा गोपीचंद की कथा और उत्तरी बंगाल के लोकगीतों को जिस संवेदनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया, उसने यह सिद्ध कर दिया कि एक 'विदेशी' भी भारतीय लोक-हृदय की धड़कन को समझ सकता है। 'मैथिली ग्रामर' और 'बिहारी भाषाओं के सात व्याकरण' जैसे ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने उन बोलियों को व्याकरणिक अनुशासन दिया, जिन्हें तब तक केवल 'गंवारू' समझा जाता था।

भक्ति काल के बारे में ग्रियर्सन का मत 

हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्ति काल को 'स्वर्ण युग' घोषित करने की पृष्ठभूमि तैयार करने में ग्रियर्सन का योगदान अद्वितीय है। जब उस समय के कई विद्वान भक्ति आंदोलन को केवल बाहरी प्रभावों या निराशा की उपज मान रहे थे, तब ग्रियर्सन ने एक मौलिक और क्रांतिकारी स्थापना दी।
उन्होंने भक्ति काल के अचानक उदय को 'बिजली की कौंध' (Like a flash of lightning) के समान बताया। ग्रियर्सन का मानना था कि 15वीं और 16वीं शताब्दी में भारत में जो भक्ति की लहर उठी, उसने पूरे देश के मानसिक और आध्यात्मिक धरातल को आलोकित कर दिया। यद्यपि उन्होंने भक्ति के कुछ तत्वों पर ईसाइयत के प्रभाव की चर्चा की (जिससे बाद में आचार्य शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी ने असहमति जताई), लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने तुलसी और जायसी जैसे कवियों को विश्व-साहित्य के समकक्ष खड़ा किया।
ग्रियर्सन ने तुलसीदास को 'बुद्ध के बाद भारत का सबसे बड़ा लोक-नायक' कहा। उनकी दृष्टि में तुलसी का 'रामचरितमानस' केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि उत्तर भारत के करोड़ों लोगों के जीवन का नैतिक आधार स्तंभ था। 'नोट्स ऑन तुलसीदास' लिखकर उन्होंने तुलसी के काव्य-शिल्प और उनकी दार्शनिकता को एक नए दृष्टिकोण से दुनिया के सामने रखा।

हिंदी साहित्य के इतिहास का कालक्रम: 'द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान'

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा में ग्रियर्सन की पुस्तक 'द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान' (1888 हालांकि कुछ जगहों में 1889 भी दिया गया है; पाठक अपनी विवेक का प्रयोगकरें)  मील का पत्थर है। यह ग्रंथ केवल कवियों की सूची नहीं थी, बल्कि हिंदी साहित्य के इतिहास को वैज्ञानिक पद्धति से वर्गीकृत करने का पहला गंभीर प्रयास था।  'एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल' की पत्रिका के एक विशेषांक रूप में साहित्य जगत में हलचल मचा दी। विडंबना यह थी कि हिंदी की अस्मिता को पहचान दिलाने वाली यह अमर कृति अंग्रेजी में लिखी गई थी।

ग्रियर्सन ने पहली बार कवियों को वर्णमाला के बजाय कालक्रमानुसार वर्गीकृत करने का 'साहसी प्रयोग' किया। उन्होंने बिखरे हुए साहित्य को ग्यारह अध्यायों में बाँटकर उसे एक तार्किक ढांचा प्रदान किया। 'मीमांसा' मानती है कि यह पुस्तक केवल इतिहास नहीं, बल्कि हिंदी के गौरव को पुनः खोजने वाला एक वैश्विक दस्तावेज़ है।

ग्रियर्सन के काल-विभाजन का योगदान:

नामकरण की शुरुआत: उन्होंने इतिहास को विभिन्न कालखंडों में विभाजित किया, जैसे :-

ग्रियर्सन के 11 कालखंड (संक्षेप में):-

1.चारण काल (Charan Kal): 700-1400 ईस्वी
2.15वीं सदी का धार्मिक पुनर्जागरण (Religious Renaissance of the 15th Century)
3.जायसी की प्रेम-कविता (Prem-Kavya of Jayasi)
4.भक्ति-काल (Bhakti-Kal)
5.राम-काव्य (Ram-Kavya)
6.कृष्ण-काव्य (Krishna-Kavya)
7.मुगल दरबार (Mughal Darbar) (1526-1707 ईस्वी)
8.अठारहवीं शताब्दी (18th Century) (1700-1800 ईस्वी)
9.कम्पनी के शासन में हिन्दुस्तान (Hindustan under the Company's Rule) (1800-1870 ईस्वी)
10.विक्टोरिया के शासन में हिन्दुस्तान (Hindustan under Queen Victoria) (1870-1890 ईस्वी)
11.नई धारा (New Era) (1870-1890 ईस्वी के बाद) 



विशुद्ध हिंदी का दृष्टिकोण: उन्होंने उर्दू-फारसी मिश्रित भाषा को हिंदी साहित्य से अलग मानकर 'वर्नाक्युलर' यानी जनभाषा के साहित्य पर ध्यान केंद्रित किया।
यद्यपि उनके काल-विभाजन में कुछ विसंगतियाँ थीं, लेकिन उन्होंने ही वह 'ब्लूप्रिंट' तैयार किया, जिस पर आगे चलकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपना सुदृढ़ इतिहास-भवन खड़ा किया।

ग्रियर्सन का जीवन और 'मीमांसा' के मूल्य

'मीमांसा' का अर्थ है - गहन विचार और तर्कसंगत विवेचन। ग्रियर्सन का संपूर्ण जीवन इसी मीमांसा का जीवंत रूप था। एक ब्रिटिश आई.सी.एस. अधिकारी के पास सत्ता, प्रभाव और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनकी आत्मा 'प्राच्यविद्या' (Orientalism) की खोज में रमी थी।

सत्य के प्रति निष्ठा: जब ग्रियर्सन ने 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' का कार्य हाथ में लिया, तो उन्होंने इसे केवल एक सरकारी प्रोजेक्ट नहीं माना। उन्होंने गाँव-गाँव से जानकारी जुटाई, लोगों से बात की और 179 भाषाओं एवं 544 बोलियों का ऐसा दस्तावेजीकरण किया जो आज भी दुनिया के किसी भी अन्य देश में दुर्लभ है।

सांस्कृतिक समन्वय: ग्रियर्सन एक ऐसे सेतु थे जिन्होंने पश्चिम को पूर्व की गहराई से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि भारत केवल सपेरों या जादूगरों का देश नहीं है, बल्कि यह महान दार्शनिकों, संतों और श्रेष्ठ कवियों की भूमि है।

अथक परिश्रम: सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अगले 30 वर्षों तक आयरलैंड में बैठकर भारतीय भाषाओं के संकलन और संपादन का कार्य किया। यह उनकी ज्ञान के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का परिचायक है।

उपसंहार: एक ऋणी राष्ट्र की श्रद्धांजलि

आज जब हम अपनी मातृभाषाओं को भूलकर वैश्विकता की अंधी दौड़ में शामिल हैं, तब ग्रियर्सन का जीवन हमें याद दिलाता है कि अपनी बोलियों में ही हमारी संस्कृति की आत्मा बसती है। ग्रियर्सन एक ऐसे 'सेतु' थे जिन्होंने पूर्व और पश्चिम को ज्ञान के धरातल पर जोड़ा।

भारतीय भाषा के अनन्य साधक ऋषि ग्रियर्सन ने हमें हमारी ही उन विरासतों से परिचित कराया जिन्हें हम भूलते जा रहे थे। उन्होंने लोक-भाषाओं को वह 'अकादमिक सम्मान' दिलाया जो केवल संस्कृत या अंग्रेजी को प्राप्त था। आज जब हम अपनी क्षेत्रीय बोलियों - मैथीली, मगही, भोजपुरी, ब्रज, अवधी पर गर्व करते हैं, तो कहीं न कहीं हमारे गौरव के बीज ग्रियर्सन की उसी तपस्या में छिपे हैं।

'मीमांसा' वेब पत्रिका के इस जीवनी विशेषांक के माध्यम से हम आज संकल्प लेते हैं कि हम अपनी भाषाई विविधता का संरक्षण करेंगे। ग्रियर्सन का जीवन हमें सिखाता है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति की वाहिका होती है।

मीमांसा' परिवार की ओर से इस हिंदी और भारतीय भाषाओं के उस महान भाषा-शिल्पी और लोक-चेतना के संरक्षक को उनकी जयंती पर शत-शत नमन। जिसने भारतीय संस्कृति के दीप को वैश्विक स्तर पर प्रज्वलित किया।


जयंती विशेषांक/संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 


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'मीमांसा' वेब पत्रिका के इस जीवनी विशेषांक में प्रकाशित आलेख 'जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन: एक श्रद्धांजलि' पूर्णतः शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। लेख में प्रस्तुत तथ्य विकिपीडिया एवं अन्य ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित हैं। यद्यपि सूचना की सटीकता सुनिश्चित करने का हरसंभव प्रयास किया गया है, तथापि पाठकों से अनुरोध है कि वे शोध कार्यों के लिए मूल ऐतिहासिक ग्रंथों का संदर्भ भी अवश्य लें। लेख में व्यक्त विचार इतिहासविदों के विश्लेषण पर आधारित हैं, जिनका उद्देश्य किसी भी समुदाय या विचारधारा की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

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