वेब पत्रिका 'मीमांसा' के विश्व-क्षितिज विशेषांक में आज अर्थहीनता के मरुस्थल में अर्थ की तृष्णा: 'वेटिंग फॉर गोडो' और विसंगति का रंगमंच ।
साहित्य जब तर्क और कथानक की सीमाओं को तोड़कर सीधे मानवीय अस्तित्व के अंतर्विरोधों से टकराता है, तो 'विसंगति का रंगमंच' जन्म लेता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपजी निराशा और वैचारिक शून्यता को सैमुअल बेकेट ने अपनी कालजयी कृति 'वेटिंग फॉर गोडो' (Waiting for Godot) के माध्यम से अमर कर दिया।
प्रस्तुत आलेख में स्तंभकार अभिषेक यादव ने बेकेट के उस 'अब्सर्ड' संसार का सूक्ष्म विश्लेषण किया है, जहाँ प्रतीक्षा ही नियति है। यह लेख हमें बताता है कि व्लादिमीर और एस्ट्रागन का अंतहीन इंतज़ार केवल एक नाटक नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य की उस शाश्वत छटपटाहट का प्रतिबिंब है, जो अर्थहीनता के मरुस्थल में अर्थ की एक बूंद तलाश रहा है।
प्रस्तावना: एक खामोश धमाका
5 जनवरी, 1953 की वह शाम पेरिस के 'थिएटर ऑफ बेबीलोन' के लिए सामान्य नहीं थी। मंच पर न तो कोई भव्य सजावट थी, न कोई वीरतापूर्ण नायक और न ही कोई सुगठित कहानी। वहाँ था तो बस एक ठूंठ पेड़ और फटेहाल हाल में दो इंसान व्लादिमीर और एस्ट्रागन। जब पर्दा गिरा, तो नाटक के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जुड़ चुका था जिसने अरस्तू के 'कथानक' और 'तर्क' के सदियों पुराने प्रतिमानों को ध्वस्त कर दिया। सैमुअल बेकेट की कालजयी कृति 'वेटिंग फॉर गोडो' ने न केवल आधुनिक रंगमंच को एक नई भाषा दी, बल्कि 'थिएटर ऑफ द अब्सर्ड' (विसंगति का रंगमंच) को विश्व की साझा चेतना का हिस्सा बना दिया।
विसंगति का दर्शन: जब शब्द मौन हो जाते हैं
द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका ने मानवता के भीतर एक गहरा घाव छोड़ दिया था। व्यवस्था, प्रगति और यहाँ तक कि ईश्वर से भी मनुष्य का विश्वास डगमगा चुका था। बेकेट ने इसी आंतरिक शून्य और मानसिक आघात को मंच पर मूर्तरूप दिया। 'वेटिंग फॉर गोडो' में बाह्य स्तर पर कुछ भी घटित नहीं होता। पात्र एक रहस्यमयी 'गोडो' की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो कभी नहीं आता।
यह प्रतीक्षा दरअसल उस शाश्वत मानवीय तलाश का प्रतीक है, जहाँ इंसान अपने अस्तित्व का कोई ठोस अर्थ ढूंढना चाहता है, लेकिन उत्तर में उसे केवल नियति की गहरी चुप्पी मिलती है।
"हमेशा कुछ न कुछ मिल ही जाता है, जिससे हमें लगता है कि हम जीवित हैं।"
बेकेट का यह संवाद मनुष्य की विवशता और उसके भीतर मरती-जीती उम्मीदों के बीच के द्वंद्व को बड़ी ही कोमलता से छू लेता है।
शिल्प का विद्रोह: मौन और पुनरावृत्ति की गूँज
परंपरागत नाटकों में संवाद कहानी के रथ को आगे बढ़ाते हैं, लेकिन बेकेट के यहाँ संवाद गोल-गोल घूमते हैं। यहाँ शब्द अर्थ पैदा नहीं करते, बल्कि अर्थहीनता के बोध को और गहरा कर देते हैं। इस नाटक में 'मौन' (Pause) की भूमिका शब्दों से कहीं अधिक प्रभावशाली है।
पात्रों का बार-बार अपने जूते उतारना, टोपियाँ बदलना या आत्महन्ता (Suicide) विचार करना ये महज क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि उस ऊब और एकरसता (Monotony) का चित्रण हैं, जिसे आधुनिक मनुष्य अपनी दिनचर्या में ढो रहा है। यह हमारे भीतर के उस अकेलेपन का दर्पण है, जहाँ हम भीड़ में होकर भी एकाकी हैं।
वैश्विक संदर्भ: आखिर कौन है यह 'गोडो'?
पिछले सात दशकों में 'गोडो' के स्वरूप को लेकर अनगिनत व्याख्याएँ की गईं। किसी के लिए वह ईश्वर है, किसी के लिए मृत्यु, तो किसी के लिए कोई राजनैतिक क्रांति या सुखद भविष्य। अल्जीरिया के युद्धबंदियों से लेकर साराजेवो के पीड़ितों तक, जहाँ-जहाँ संघर्ष और प्रतीक्षा रही, वहाँ इस नाटक की अनुगूँज सुनाई दी। यह रचना सिद्ध करती है कि जब साहित्य स्थानीय सीमाओं को लांघकर 'मानवीय स्थिति' (Human Condition) पर विमर्श करता है, तभी वह वैश्विक बनता है।
आज की प्रासंगिकता: डिजिटल युग का छलावा
आज के सूचना-क्रांति के युग में, बेकेट का यह विमर्श और भी प्रासंगिक हो उठता है। हम सब भी किसी न किसी 'गोडो' के इंतज़ार में हैं; कभी मोबाइल के एक नोटिफिकेशन के रूप में, तो कभी सफलता के किसी भ्रामक पैमानों के रूप में। हमारे पास संवाद के साधन तो बहुत हैं, पर संवाद की गहराई लुप्त हो रही है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के माध्यम से हमें यह आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है कि क्या हमने भी अपने जीवन को एक 'अब्सर्ड' (विसंगतिपूर्ण) इंतज़ार में तो नहीं तब्दील कर दिया है?
निष्कर्ष: घने अंधेरे में साझी उम्मीद
यद्यपि बेकेट का संसार पहली दृष्टि में निराशावादी लग सकता है, किंतु इसके भीतर एक अनूठी जिजीविषा छिपी है। व्लादिमीर और एस्ट्रागन का अंत तक एक-दूसरे का साथ न छोड़ना और हर विफल शाम के बाद अगली सुबह फिर उसी स्थान पर जुटने का संकल्प लेना, मनुष्य की कभी न हारने वाली प्रवृत्ति का परिचायक है। 'वेटिंग फॉर गोडो' हमें सिखाता है कि भले ही मंजिल अनिश्चित हो, पर साथ मिलकर 'प्रतीक्षा' करने की यह मानवीय प्रक्रिया ही हमें जीवित और मनुष्य बनाए रखती है। वेटिंग फॉर गोडो (Waiting for Godot) आयरिश नाटककार और लेखक सैमुअल बेकेट द्वारा लिखित एक ट्रेजिकोमेडी नाटक है, जो पहली बार 1952 में लेस एडिशन्स डी मिनुइट द्वारा प्रकाशित किया गया था।
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विश्व-क्षितिज/ स्तंभ
स्तंभकार : अभिषेक यादव
(पूर्व छात्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय)
लेखक परिचय
अभिषेक यादव हिंदी साहित्य और रंगमंच के एक सजग अध्येता हैं। 'सर्वविद्या की राजधानी' कहे जाने वाले काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग से शिक्षित अभिषेक के लेखन में बनारसी विद्वत्ता और आधुनिक वैश्विक विमर्श का एक अनूठा समन्वय दिखता है।
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