संपादकीय: विश्व भाषा हिन्दी और युग चेतना का उत्कर्ष संपादक की कलम से...

विश्व हिंदी दिवस के पावन अवसर पर वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह विशेष संपादकीय आलेख हिंदी की गौरवशाली यात्रा, उसकी वैज्ञानिक नींव और भविष्य की वैश्विक संभावनाओं को समर्पित है।


आज 10 जनवरी है। समूचा विश्व 'विश्व हिंदी दिवस' के उत्सव में सराबोर है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस वैश्विक चेतना का प्रतीक है जो सात समंदर पार बसे भारतीय प्रवासियों से लेकर विदेशी विश्वविद्यालयों के शोध केंद्रों तक हिंदी की गूँज को प्रतिध्वनित करती है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस विशेष अंक में हम हिंदी को केवल एक भाषा के रूप में नहीं, बल्कि एक 'युग चेतना' और 'वैज्ञानिक विरासत' के रूप में देख रहे हैं।

विरासत से भविष्य तक: एक जीवंत यात्रा

हिंदी की यात्रा प्राचीन भारत की सांस्कृतिक जड़ों से निकलकर डिजिटल युग के कीबोर्ड तक पहुँचने की महागाथा है। संस्कृत की कोख से जन्मी और पालि, प्राकृत, अपभ्रंश व अवहट्ट की राहों से गुजरी यह भाषा आज दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है।

हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी समावेशिता (Inclusivity) है। इसने न केवल संस्कृत के तत्सम शब्दों को सहेजा, बल्कि अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी और स्थानीय बोलियों के शब्दों को भी बड़े लाड़ से अपनाया। आज 'बाजार' से लेकर 'सॉफ्टवेयर' तक हिंदी के अपने शब्द बन चुके हैं। यही लचीलापन उसे भविष्य की भाषा बनाता है।

बाजार की भाषा से ज्ञान की भाषा तक: 

आज हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं रही। यह विज्ञापन, मनोरंजन, और अब 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) की भाषा बन रही है। गूगल और मेटा जैसे वैश्विक संस्थान मान चुके हैं कि हिंदी भाषी बाजार को नजरअंदाज करना नामुमकिन है।

देवनागरी: विज्ञान और ध्वन्यात्मकता का संगम

अक्सर लोग प्रश्न करते हैं कि क्या हिंदी आधुनिक विज्ञान के लिए उपयुक्त है? उत्तर इसकी लिपि देवनागरी में छिपा है। देवनागरी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में से एक है।

 ध्वनि और रूप का सामंजस्य: देवनागरी की सबसे बड़ी वैज्ञानिकता यह है कि हम जैसा बोलते हैं, वैसा ही लिखते हैं। यहाँ 'Silent' अक्षरों का कोई भ्रम नहीं है।

वर्णमाला का वर्गीकरण: अगर आप देवनागरी की वर्णमाला (क, ख, ग, घ...) को देखें, तो यह उच्चारण स्थान (कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य, ओष्ठ्य) के आधार पर व्यवस्थित है। यह वर्गीकरण आधुनिक भाषा विज्ञान (Linguistics) के सिद्धांतों पर खरा उतरता है।

"देवनागरी लिपि का प्रत्येक अक्षर एक निश्चित वैज्ञानिक ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है, जो इसे डिजिटल कोडिंग और स्पीच-टू-टेक्स्ट तकनीक के लिए सबसे सटीक बनाता है।"

युग चेतना और हिंदी का उत्तरदायित्व

साहित्य समाज का दर्पण होता है, लेकिन भाषा उस दर्पण की चमक होती है। आज की युग चेतना 'ग्लोबल' होने के साथ-साथ 'लोकल' होने की भी है। हिंदी इस संक्रमण काल में एक सेतु का काम कर रही है।

प्रवासी भारतीयों की धड़कन: मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और त्रिनिदाद जैसे देशों में हिंदी ने भारतीय संस्कृति को जीवित रखा है। वहाँ 'रामचरितमानस' केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि पहचान का आधार है।

युवा पीढ़ी और हाइब्रिड हिंदी: आज का युवा 'हिंग्लिश' बोलता जरूर है, लेकिन अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए वह हिंदी कविताओं और रील्स की ओर ही मुड़ता है। यह हिंदी का नया 'अवतार' है, जो समय के साथ खुद को ढाल रहा है।

भविष्य की चुनौतियाँ और हमारा संकल्प

विश्व हिंदी दिवस मनाना तब सार्थक होगा जब हम हिंदी को केवल भावनाओं से निकालकर 'रोजगार और शोध' की भाषा बनाएंगे। हमें ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा।
'मीमांसा' का यह आह्वान है कि:
 * हम हिंदी को 'अनुवाद' की भाषा न रहने दें, बल्कि 'मौलिक सृजन' की भाषा बनाएं।
 * देवनागरी लिपि के सौंदर्य को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अधिक से अधिक प्रयुक्त करें।
 * हिंदी को गर्व के साथ बोलें, हीनभावना के साथ नहीं।

संपादकीय: 'मीमांसा' का आह्वान और मौलिक चिंतन का उपक्रम

वेब पत्रिका 'मीमांसा' का मूल उद्देश्य केवल सूचनाओं का संप्रेषण नहीं, बल्कि हिंदी के माध्यम से उस 'मौलिक चिंतन' को पुनर्जीवित करना है, जो कभी वैश्विक ज्ञान-शिखर पर प्रतिष्ठित था। आज जब दुनिया 'सूचना के विस्फोट' से जूझ रही है, तब हिंदी संवाद की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। हमारा मानना है कि कोई भी राष्ट्र अपनी मौलिक भाषा में ही सर्वश्रेष्ठ नवाचार (Innovation) कर सकता है।

हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना का डीएनए (DNA) है। 'मीमांसा' आप सभी पाठकों और लेखकों का आह्वान करती है कि हम अनुवाद की बैसाखियों को छोड़कर अपनी भाषा में सोचना और रचना शुरू करें। जब हम देवनागरी में कोई विचार बुनते हैं, तो उसमें हमारी मिट्टी की सुगंध और हजारों वर्षों का अनुभव समाहित होता है।
विश्व विरासत में हिंदी का योगदान केवल प्राचीन ग्रंथों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आज आवश्यकता है कि हम आधुनिक विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और खगोल विज्ञान जैसे विषयों पर हिंदी में मौलिक शोध प्रस्तुत करें। 'मीमांसा' इस दिशा में एक 'बौद्धिक मंच' बनने के लिए प्रतिबद्ध है, जहाँ तर्क और संवेदना का संगम हो। आइए, हम अपनी लिपि की वैज्ञानिकता और भाषा की गहराई को आत्मसात करते हुए एक ऐसी वैचारिक क्रांति का सूत्रपात करें, जो विश्व पटल पर हिंदी को 'ज्ञान की अनिवार्य भाषा' के रूप में स्थापित कर सके।

उपसंहार

हिंदी केवल भारत की नहीं, मानवता की भाषा है। इसमें कबीर की फक्कड़ता है, मीरा का प्रेम है, निराला का विद्रोह है और आज के दौर की स्टार्टअप वाली ऊर्जा है। 'मीमांसा' के इस अंक के माध्यम से हम उस 'हिन्दी' को नमन करते हैं जो हमें जोड़ती है, जो हमें भारतीय होने का गौरव दिलाती है।

आइए, इस विश्व हिंदी दिवस पर संकल्प लें कि हम अपनी विरासत को आधुनिकता के पंख देंगे और देवनागरी के अक्षरों में भविष्य का इतिहास लिखेंगे।
जय हिंदी, जय नागरी!


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