वेब पत्रिका 'मीमांसा' पुण्यतिथि विशेषांक संपादकीय आलेख "स्मृति-शेष : दूधनाथ सिंह साठोत्तरी साहित्य के जाग्रत प्रहरी"


साहित्य की दुनिया में कुछ नाम केवल रचनाकार के तौर पर नहीं, बल्कि एक 'हस्तक्षेप' के रूप में दर्ज होते हैं। दूधनाथ सिंह एक ऐसा ही नाम है। वे हिंदी साहित्य के उस दौर के प्रतिनिधि स्तंभ थे, जिन्होंने परंपरा की रूढ़ियों को तोड़कर आधुनिकता के नए प्रतिमान गढ़े। आज उनकी पुण्यतिथि पर, साहित्य जगत उन्हें एक प्रखर आलोचक, संवेदनशील कवि और बेबाक कथाकार के रूप में याद कर रहा है।

जीवन-यात्रा: संघर्ष से सृजन तक

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के 'सोबन्था' गाँव के एक किसान परिवार में जन्में दूधनाथ सिंह का बचपन एकाकीपन और संघर्षों की छांव में बीता। अल्पायु में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद, उनके भीतर जो अकेलापन पनपा, उसने उन्हें जीवन के प्रति एक गहरी अंतर्दृष्टि दी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने कलकत्ता में अध्यापन और पत्रकारिता की गलियों से होते हुए पुनः इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अपनी सेवाएं दीं। वे ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह और रवींद्र कालिया के साथ ‘हिंदी के चार यार’ की उस चौकड़ी का हिस्सा थे, जिसने साठोत्तरी कहानी को एक नई दिशा दी।

तिथि का विरोधाभास: विद्वानों और विभिन्न स्रोतों के बीच दूधनाथ जी के देहावसान की तिथि को लेकर एक तकनीकी मतभेद दिखाई देता है। जहाँ 'हिंदवी' (रेख़्ता) जैसी प्रतिष्ठित वेबसाइट उनके निधन की तिथि 11 जनवरी 2018 दर्ज करती है, वहीं 'विकिपीडिया' पर यह 12 जनवरी 2018 अंकित है। यद्यपि स्मृतियों के कैनवास पर उनके जाने की रिक्तता एक समान है, किंतु शोधपरक दृष्टिकोण से इस भिन्नता का उल्लेख प्रासंगिक है।

रचनाकर्म: विसंगतियों के विरुद्ध शंखनाद

दूधनाथ सिंह का रचना-संसार अत्यंत व्यापक है। उनके उपन्यासों : आखिरी कलाम, निष्कासन और नमो अन्धकारम ने सत्ता, समाज और व्यक्ति के द्वंद्व को बड़ी शिद्दत से उकेरा है। 'सपाट चेहरे वाला आदमी' और 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे' जैसे कहानी संग्रहों के माध्यम से उन्होंने मध्यमवर्गीय परिवार की नैतिक गिरावट और मानसिक विसंगतियों को चुनौती दी।
उनका नाटक 'यम-गाथा' आज भी रंगमंच की दुनिया में एक मील का पत्थर माना जाता है, जो मिथकों के सहारे सामंतवाद और राजनीति की क्रूरता पर सवाल खड़ा करता है। आलोचना के क्षेत्र में उन्होंने 'निराला: आत्महन्ता आस्था' लिखकर निराला के व्यक्तित्व को देखने का एक नया नजरिया पेश किया।

       राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनकी रचनाएं 

लेखन शैली और प्रभाव

उनकी भाषा में एक विशेष प्रकार की 'धार' थी। वे लोकपक्षधरता के हिमायती थे, लेकिन उनकी संवेदनाएं बहुत सूक्ष्म थीं। दूधनाथ जी का लेखन 'कालधर्मी' न होकर 'मानस-धर्मी' था। वे पात्रों के बाहरी क्रियाकलापों से अधिक उनके भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्वों को पकड़ने में माहिर थे। उनकी शैली में एक ओर संस्मरणों की तरलता (जैसे: लौट आ ओ धार) है, तो दूसरी ओर आलोचना की कठोर तार्किकता।

मीमांसा का विश्लेषण: पुनर्पाठ क्यों जरूरी?

आज के दौर में जब समाज वैचारिक ध्रुवीकरण और नैतिक संकटों से जूझ रहा है, दूधनाथ सिंह का पुनर्पाठ अनिवार्य हो जाता है। उनके लेखन में निहित 'विद्रोही चेतना' हमें सिखाती है कि लेखक का काम केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सत्ता और समाज की विद्रूपताओं के सामने आईना रखना है। 'मीमांसा' का यह अंक उन्हें केवल श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं है, बल्कि उनकी उस निर्भीक दृष्टि को पुनः आत्मसात करने के लिए है, जिसने कभी किसी भी प्रकार के 'अंधकार' से समझौता नहीं किया।

पुण्यतिथि विशेषांक/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
© संपादक 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 


डिस्क्लेमर एवं कॉपीराइट चेतावनी:

डिस्क्लेमर: इस आलेख में प्रस्तुत जानकारी विकिपीडिया, हिंदवी और अन्य विश्वसनीय साहित्यिक स्रोतों पर आधारित है। जन्म और मृत्यु की तिथियों में भिन्नता उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों के विरोधाभास के कारण है। 'मीमांसा' पत्रिका का उद्देश्य तथ्यपरक विमर्श को बढ़ावा देना है।

कॉपीराइट चेतावनी: यह संपादकीय लेख 'मीमांसा' वेब पत्रिका की बौद्धिक संपदा है। इसका किसी भी रूप में पुनरुत्पादन, वितरण या व्यावसायिक उपयोग बिना संपादक की लिखित अनुमति के दंडनीय अपराध माना जाएगा। उद्धरण के रूप में उपयोग करने पर पत्रिका का संदर्भ देना अनिवार्य है। अन्यथा कॉपीराइट उलंघन पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति और संस्था के विरुद्ध कठोर कानूनी कारवाई की जाएगी। वेब पत्रिका 'मीमांसा' साहित्यिक चोरी करने वालों पर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाती है।


©2026, वेब पत्रिका 'मीमांसा'। सर्वाधिक सुरक्षित 

Comments

Popular posts from this blog

भारतीय साहित्यों में नायिका भेद और वर्तमान नारी अस्मिता - वेब पत्रिका 'मीमांसा' का वागेश्वरी स्तंभ विशेषांक।

व्यवस्था की विसंगतियों का दरबारी चितेरा : श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी की शाश्वत गूँज

संपादकीय : साहित्यिक शुचिता की मीमांसा और 'दिनकर' के नाम पर "ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं" के छद्म प्रसार का सत्य