वेब पत्रिका 'मीमांसा' जयंती विशेषांक संपादकीय आलेख : मधुरेश हिंदी कथा-आलोचना के अक्षय वट और शुचिता के प्रहरी

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के लिए आज का दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक वैचारिक उत्सव है। हिंदी कथा-आलोचना के अक्षय वट व शिखर पुरुष, संतुलित दृष्टि के प्रणेता और साहित्य की शुचिता के प्रहरी मधुरेश जी की जयंती पर यह विशेषांक निकालते हुए हम गर्व और कृतज्ञता का अनुभव कर रहे हैं। 10 जनवरी 1939 को बरेली की धरती पर जन्मे रामप्रकाश शंखधार, जिन्हें दुनिया 'मधुरेश' के नाम से जानती है, ने पाँच दशकों तक अपनी लेखनी से हिंदी उपन्यास और कहानी की जिस तरह 'मीमांसा' की, वह अद्वितीय है। उन्होंने अपनी लेखनी से आलोचना को केवल विवाद नहीं, बल्कि 'संवाद' और 'शुचिता' का माध्यम बनाया।



आज जब साहित्यिक जगत 'मठाधीशों' की संकीर्णताओं, गुटबाजी की काई और अकादमिक जगत की 'कट-पेस्ट' संस्कृति से जूझ रहा है, तब मधुरेश जैसे साधक का स्मरण केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक वैचारिक आवश्यकता है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' अपने इस जयंती विशेषांक के माध्यम से हिंदी कथा-समीक्षा के उस 'अक्षय वट' को नमन करती है, 

संतुलित दृष्टि और ऋषि परंपरा का निर्वाह

उनका लेखन एक अनवरत चिंतन की ऋषि परंपरा का साक्ष्य रहा है। उन्होंने आलोचना को कभी भी व्यक्तिगत आक्षेपों का हथियार नहीं बनाया। उनकी शैली में वह संतुलन है जिसकी आज घोर कमी है। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि 'खुली, उदार और संतुलित' है, जो किसी वैचारिक आग्रह के बोझ तले दबकर सत्य का गला नहीं घोंटती।

कथा-समीक्षा की गंगा: भगीरथ प्रयास

जिस प्रकार भगीरथ ने गंगा का अवतरण किया, मधुरेश जी ने हिंदी कहानी और उपन्यास की समीक्षा को एक नया धरातल दिया। उनकी कृतियाँ 'हिन्दी कहानी: अस्मिता की तलाश' और 'नयी कहानी: पुनर्विचार' केवल पुस्तकें नहीं, बल्कि हिंदी कथा-साहित्य की 'रीढ़' हैं।

उपन्यास समीक्षा: 'शिनाख्त' और 'समय, समाज और उपन्यास' जैसी कृतियों के माध्यम से उन्होंने ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यासों की जो 'शिनाख्त' की, वह उनकी मौलिक प्रज्ञा का प्रमाण है।

उपेक्षितों का उद्धार: उन्होंने डॉ. रामविलास शर्मा जैसे दिग्गजों से सम्मानजनक असहमति जताते हुए रांगेय राघव, राहुल सांकृत्यायन और शिवदान सिंह चौहान जैसे उपेक्षित रचनाकारों का उचित मूल्यांकन किया। यह उनकी साहित्यिक ईमानदारी ही थी जिसने उन्हें 'यशपाल का प्रामाणिक भाष्यकार' बनाया।

विद्रूपताओं के विरुद्ध एक मौन क्रांति

आज के दौर में जहाँ 'मठाधीश संस्कृति' यह तय करती है कि किसे पढ़ा जाए और किसे सराहा जाए, मधुरेश जी का लेखन एक 'खुले द्वार' की तरह है। उन्होंने प्रगतिशील मूल्यों की रक्षा करते हुए भी कभी 'चमत्कारप्रियता' या 'चाटुकारिता' को स्थान नहीं दिया।

उनकी आलोचना का संकट आज के समय का संकट है जहाँ श्रम और निष्ठा को हाशिए पर धकेला जा रहा है।

उनका लेखन गिलहरी प्रयास की उस भावना से ओतप्रोत है, जहाँ छोटा-छोटा योगदान भी एक विशाल सेतु का निर्माण करता है। उन्होंने न केवल महान लेखकों पर विचार किया, बल्कि 'परिकथा' के नवलेखन और युवा कहानीकारों के चेहरों को भी अपनी समीक्षा में जगह दी।

विद्या और शिल्प का संगम

मधुरेश जी ने आलोचना को 'शिल्प' की तरह गढ़ा है। उनके संस्मरणों का संग्रह 'यह जो आईना है' लेखकीय ईमानदारी का वह दर्पण है, जिसमें साहित्यकार का निश्छल रूप दिखाई देता है।

वर्तमान दौर में मधुरेश की शैली का पुनर्पाठ क्यों जरूरी है?  

आज जब आलोचना का परिदृश्य धुंधला रहा है, मधुरेश जी की शैली का पुनर्पाठ अनिवार्य हो गया है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

वस्तुनिष्ठता बनाम गुटबंदी: आज की आलोचना अक्सर 'परस्पर प्रशंसा' या 'निजी द्वेष' का माध्यम बन गई है। मधुरेश जी ने सिखाया कि आलोचक का धर्म कृति के प्रति ईमानदार होना है, रचनाकार के प्रति नहीं।

गहन अध्ययन की संस्कृति: 'इंस्टेंट' सोशल मीडिया समीक्षाओं के युग में, मधुरेश जी का वह धैर्य दुर्लभ है जहाँ वे एक-एक कृति की 'शिनाख्त' करते थे। उनकी पुस्तक 'शिनाख्त' और 'ऐतिहासिक उपन्यास: इतिहास और इतिहास-दृष्टि' प्रमाण हैं कि आलोचना केवल टिप्पणी नहीं, बल्कि एक श्रमसाध्य साधना है।

शुचितापूर्ण विमर्श: मधुरेश जी ने साहित्य में नैतिकता और मूल्यों की बात की। उन्होंने प्रगतिशील विचारों की प्रशंसा की तो चमत्कारप्रियता की निंदा भी की। वर्तमान के 'वैचारिक भटकाव' में उनका संतुलित दृष्टिकोण हमें पुनः साहित्य के मूल उद्देश्यों से जोड़ता है।

'मीमांसा' की दृष्टि: एक महान मीमांसक को नमन
वेब पत्रिका 'मीमांसा' स्वयं को मधुरेश जी की उस 'साधुता' और 'साधना' की विरासत का उत्तराधिकारी मानती है, जहाँ साहित्य को समाज का दर्पण और आलोचक को उसका विवेक माना गया है।
"मधुरेश जी एक ऐसे आलोचक रहे हैं जिनके लिए 'आलोचना सदैव एक संभावना' थी। उन्होंने कभी अंतिम सत्य का दावा नहीं किया, बल्कि पाठकों के लिए विमर्श के नए द्वार खोले।"

हमारी पत्रिका उन्हें एक ऐसे 'संस्था-पुरुष' के रूप में देखती है जिसने बरेली और बदायूँ जैसे कस्बाई शहरों में रहकर भी अखिल भारतीय स्तर के साहित्यिक मानक स्थापित किए। 'मीमांसा' उनके द्वारा रचित 'आलोचना की प्रतिवाद संस्कृति' को आगे ले जाने का संकल्प लेती है।

उपसंहार

मधुरेश जी ने अपने आत्मकथात्मक लेखन 'आलोचक का आकाश' में जिस खुलेपन की बात की है, वही खुलापन आज के विमर्श की आवश्यकता है। यह जयंती विशेषांक उनके कृतित्व के विभिन्न आयामों—कहानी समीक्षा, उपन्यास विश्लेषण और उनके संस्मरणों—पर केंद्रित है।
हमारा मानना है कि जब तक हिंदी उपन्यास और कहानी पर बात होगी, मधुरेश जी की 'मीमांसा' के बिना वह अधूरी रहेगी। इस महान मीमांसक को 'मीमांसा' परिवार की ओर से शत-शत नमन।

- संपादक मंडल
वेब पत्रिका 'मीमांसा'

'मीमांसा' का यह उपक्रम मधुरेश जी के उसी अनवरत चिंतन को समर्पित है। हम विश्वविद्यालय की युवा पीढ़ी, प्रोफेसरों और शोधार्थियों का आह्वान करते हैं कि वे मधुरेश जी के 'संतुलित दृष्टिकोण' को अपनाएं ताकि अकादमिक जगत की गंदगी को साफ कर साहित्यिक शुचिता की गंगा को पुनः प्रवाहित किया जा सके।

मधुरेश जी का रचना-संसार हमें सिखाता है कि:
आलोचना केवल दोष निकालना नहीं, बल्कि 'सार्थक की पहचान' करना है।
वैचारिक मतभेद के बावजूद संवाद की संस्कृति जीवित रहनी चाहिए।
साहित्यिक ईमानदारी ही लेखक का वास्तविक 'अक्षय पात्र' है।
'मीमांसा' परिवार की ओर से हिंदी के इस यशस्वी कथा-आलोचक को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन।


अस्वीकरण (Disclaimer)

इस विशेषांक में प्रकाशित विचार लेखकों के निजी मत हैं, जिनसे संपादक मंडल की पूर्ण सहमति अनिवार्य नहीं है। ऐतिहासिक तथ्यों एवं संदर्भों की प्रामाणिकता हेतु यथासंभव सावधानी बरती गई है, तथापि किसी भी अनजानी त्रुटि के लिए पत्रिका उत्तरदायी नहीं होगी। यह अंक पूर्णतः साहित्यिक एवं अकादमिक विमर्श के उद्देश्य से प्रकाशित है।

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