देह की देहरी से चैतन्य के आकाश तक काम व समाधि की सनातन विमर्श। वेब पत्रिका 'मीमांसा' विमर्श-स्तंभ
सृष्टि के कण-कण में एक संगीत है, एक आकर्षण है और एक मिलन की तड़प है। जब एक बीज धरती की कोख से मिलता है, तो अंकुर फूटता है; जब किरणें सागर से मिलती हैं, तो बादल बनते हैं। मनुष्य के जीवन में भी 'काम' (Desire) इसी सृजनशीलता का आदि-बिंदु है। किंतु आज के कोलाहल भरे युग में, जहाँ प्रेम केवल 'कैफे और कसीनो' की चकाचौंध तक सीमित हो गया है और शरीर मात्र एक उपभोग की वस्तु बन गया है, 'मीमांसा' एक नया विमर्श लेकर आपके सम्मुख उपस्थित है।
हमारा यह स्तंभ उन युवा हृदय को संबोधित है जो आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों को भूल रहे हैं। हम यहाँ 'काम' की निंदा करने नहीं, बल्कि उसे 'वंदना' और 'विवेक' में बदलने की बात करने आए हैं। यह लेख उस शाश्वत यात्रा का मार्ग है जो कामुकता की संकीर्ण गलियों से शुरू होकर सहस्रार के अनंत विस्तार तक जाती है।
इस विमर्श की पवित्रता को समझने के लिए हमें स्वामी विवेकानंद के उस अलौकिक प्रसंग का स्मरण करना चाहिए, जब एक विदेशी महिला ने उनके ओजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। उस महिला की इच्छा थी कि उसे विवेकानंद जैसा ही दिव्य पुत्र प्राप्त हो। स्वामी जी ने अगाध करुणा और वात्सल्य से भरकर उत्तर दिया "माते! विवाह की क्या आवश्यकता? यदि आपको मुझ जैसा ही पुत्र चाहिए, तो आप आज से मुझे ही अपना पुत्र मान लीजिए। इस प्रकार आपकी इच्छा भी पूर्ण हो जाएगी और मेरा ब्रह्मचर्य भी खंडित नहीं होगा।"
यह उत्तर केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि काम-ऊर्जा के रूपांतरण (Transformation of Energy) का उच्चतम शिखर था। विवेकानंद ने दिखाया कि शरीर के आकर्षण को 'मातृत्व' और 'आध्यात्मिक ओज' में कैसे बदला जाता है। आज की युवा पीढ़ी को इसी 'चारित्रिक बल' की आवश्यकता है, ताकि वे कसीनो की क्षणिक जीत के बजाय अपनी आत्मा की शाश्वत विजय का उत्सव मना सकें।
आइए, वात्स्यायन के शास्त्र, ओशो के बोध और तंत्र की रहस्यमयी ऊर्जा के माध्यम से 'पुरुषार्थ चतुष्टय' को पुनः समझें।
(राजा रवि वर्मा द्वारा चित्रित दुष्यंत शकुंतला )
आज का युग संक्रमण का युग है। महानगरों की चकाचौंध, नियॉन लाइटों से जगमगाते कसीनो, कैफे और बार की संस्कृति ने आधुनिक युवा पीढ़ी को एक ऐसी 'वस्तु-भोगी' मानसिकता में धकेल दिया है, जहाँ शरीर केवल एक उपभोग की वस्तु बनकर रह गया है। 'मीमांसा' का यह विमर्श आज की युवा पीढ़ी को शरीर की लोलुपता से निकालकर उस शाश्वत दार्शनिक ऊंचाई की ओर ले जाने का प्रयास है, जहाँ काम केवल वासना नहीं, बल्कि सहस्रार तक पहुँचने की सीढ़ी है।
1. वात्स्यायन से ओशो तक: काम का पावन व्याकरण
महर्षि वात्स्यायन ने जब 'कामसूत्र' की रचना की, तो उनका उद्देश्य वासना को भड़काना नहीं, बल्कि उसे 'अनुशासन' देना था। उन्होंने काम को एक 'कला' और 'विज्ञान' के रूप में प्रतिष्ठित किया। वात्स्यायन का दर्शन स्पष्ट करता है कि जब तक काम का सम्यक ज्ञान नहीं होगा, तब तक मनुष्य उससे मुक्त नहीं हो पाएगा।
इसी विचार की आधुनिक व्याख्या ओशो ने अपनी विवादित किंतु क्रांतिकारी पुस्तक 'संभोग से समाधि की ओर' में की। ओशो कहते हैं कि काम ऊर्जा का ही रूपांतरण है। यदि हम काम को दबाएंगे, तो वह विकृति बन जाएगा; यदि हम उसे स्वीकार करेंगे और उसमें 'होश' (Awareness) लाएंगे, तो वही ऊर्जा आध्यात्मिक बन जाएगी। ओशो के अनुसार, संभोग के क्षण में जब विचार शून्य हो जाते हैं और समय ठहर जाता है, वही झलक समाधि की पहली अनुभूति है।
2. पंच मकार और तंत्र की गहराई
तंत्र शास्त्र में 'पंच मकार' (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन) की अवधारणा को अक्सर गलत समझा गया है। 'मीमांसा' का दृष्टिकोण यहाँ स्पष्ट है: मैथुन (संभोग) यहाँ अंतिम 'म' है। यह प्रतीक है शिव और शक्ति के मिलन का। तंत्र मानता है कि शरीर के भीतर स्थित 'कुंडलिनी' शक्ति जो मूलाधार (काम केंद्र) में सोई हुई है, उसे जाग्रत कर सहस्रार (ब्रह्मरंध्र) तक ले जाना ही जीवन की सार्थकता है।
यह क्रिया शरीर का तिरस्कार नहीं, बल्कि शरीर के माध्यम से शरीर से पार जाने की प्रक्रिया है। आधुनिक युवा जिसे 'कैजुअल सेक्स' या 'हुकअप कल्चर' कहते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा का अपव्यय है, जबकि तंत्र उसे ऊर्जा का संचय और ऊर्ध्वगमन (Ascension) सिखाता है।
3. कसीनो, कैफे और बार: खोता हुआ चारित्रिक बल
आज के युवाओं के लिए प्रेम का अर्थ 'डेटिंग एप्स' और 'नाइट क्लब्स' तक सिमट गया है। कसीनो की मेज पर दांव लगाना और बार के धुएं में होश खोना; यह उस रिक्तता का प्रमाण है जो आज के युवाओं के भीतर है। जब जीवन का कोई शाश्वत लक्ष्य (मोक्ष) नहीं होता, तो मनुष्य तात्कालिक उत्तेजनाओं (Instant Gratification) की शरण लेता है।
यहीं स्वामी विवेकानंद का दर्शन एक प्रकाश पुंज की तरह खड़ा होता है। विवेकानंद ने 'ब्रह्मचर्य' और 'चारित्रिक बल' (Character Power) पर बल दिया। उनके लिए ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल दमन नहीं, बल्कि 'वीर्य' और 'रज' का 'ओज' में परिवर्तन था। विवेकानंद कहते थे:
"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"
युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि कसीनो की क्षणिक जीत या बार का नशा आपके 'ओज' को क्षीण करता है। वास्तविक आनंद 'वस्तु भोग' में नहीं, बल्कि 'आत्म-विजय' में है। चरित्र की शुद्धि ही वह नींव है जिस पर सहस्रार का महल खड़ा होता है।
4. आधुनिक पीढ़ी और वस्तु-भोगी दृष्टिकोण
आज का उपभोक्तावाद शरीर को एक 'प्रोडक्ट' की तरह पेश करता है। लड़की हो या लड़का, दोनों ही विज्ञापन और सोशल मीडिया के दबाव में अपने आत्म-सम्मान को 'लाइक' और 'कमेंट' की तराजू पर तौल रहे हैं। यह 'वस्तु-भोग' की पराकाष्ठा है।
'मीमांसा' का निष्कर्ष यह है कि जब तक हम शरीर को केवल चमड़ी और मांस का लोथड़ा मानेंगे, हम लोलुप बने रहेंगे। जिस दिन हम शरीर को 'यंत्र' और चेतना को उसका 'यंत्री' मान लेंगे, उस दिन कसीनो के आकर्षण फीके पड़ जाएंगे।
5. सहस्रार चक्र जागृति: अंतिम विमर्श
संभोग की परिणति संतानोत्पत्ति या केवल सुख नहीं है। इसका दार्शनिक पक्ष यह है कि यह 'द्वैत' के अहंकार को मिटा देता है। संभोग के उस चरम क्षण में 'मैं' और 'तू' का भेद मिट जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ से एक साधक को अपनी यात्रा शुरू करनी चाहिए।
* मूलाधार: जहाँ वासना है।
* हृदय: जहाँ प्रेम है।
* सहस्रार: जहाँ पूर्ण बोध (Enlightenment) है।
युवाओं को अपनी ऊर्जा को नीचे के केंद्रों से उठाकर ऊपर की ओर ले जाना होगा। इसके लिए संयम, ध्यान और विवेक की आवश्यकता है। विवेकानंद का 'आत्म-संयम' और वात्स्यायन का 'जीवन-कौशल' मिलकर ही एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं जो आधुनिक भी हो और शाश्वत भी।
मीमांसा का निष्कर्ष
संभोग कोई वर्जना (Taboo) नहीं है, बल्कि एक महान संभावना है। 'मीमांसा' का आह्वान है कि अपनी ऊर्जा को व्यर्थ के कैफे और बार की क्षणिक उत्तेजनाओं में नष्ट न करें। अपनी ऊर्जा को संजोएं, उसे प्रेम में बदलें और अंततः उसे उस 'महा-आनंद' (Ecstasy) में रूपांतरित करें जो सहस्रार के खिलने पर प्राप्त होता है।
सच्चा 'पुरुषार्थ' वही है जहाँ 'काम' धर्म के अनुशासन में रहे, ताकि 'मोक्ष' की प्राप्ति सहज हो सके।
समय की देह में सनातन चेतना मीमांसा की दूरदृष्टि व युवा पीढ़ी में नैतिक और अनैतिक के बीच सुचिता के चुनाव को लेकर है।
प्रस्तुत आलेख की प्रासंगिकता केवल एक दार्शनिक विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आज के संक्रमणशील समय की एक अनिवार्य नैतिक आवश्यकता बन चुकी है। जिस युग में देह को विज्ञापन, एल्गोरिद्म और उपभोक्तावाद ने एक “वस्तु” में बदल दिया है, उस युग में ‘संभोग से समाधि’ जैसे विमर्श का पुनर्पाठ करना सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य है। वेब पत्रिका मीमांसा की दूरदृष्टि इसी बिंदु पर प्रकट होती है वह न तो काम को निषिद्ध ठहराती है और न ही उसे बाजार की हवाओं में बह जाने देती है; वह उसे सनातन पुरुषार्थ की मर्यादा में पुनर्स्थापित करती है।
आज की युवा पीढ़ी एक ओर आधुनिक स्वतंत्रता की आकांक्षा से भरी है, तो दूसरी ओर भीतर से गहरे असंतोष और रिक्तता से ग्रस्त है। डेटिंग संस्कृति, हुकअप कल्चर और तात्कालिक सुख के साधन इस रिक्तता को भरने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। ऐसे में मीमांसा का यह विमर्श काम को “भोग” से उठाकर “बोध” तक ले जाने का मार्ग सुझाता है। यह आलेख स्पष्ट करता है कि समस्या काम में नहीं, बल्कि उसके अविवेकी उपयोग में है।
विमर्श -स्तंभ/ संपादकीय आलेख
© अमन कुमार होली
संपादक,
वेब पत्रिका मीमांसा
ई-मेल editorwebmimansa@gmail.com
वैधानिक चेतावनी एवं डिस्क्लेमर (Disclaimer):
उद्देश्य: इस विमर्श स्तंभ का उद्देश्य केवल दार्शनिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विमर्श को बढ़ावा देना है। यह किसी भी प्रकार की अश्लीलता या अनैतिकता का समर्थन नहीं करता।
निजी विचार: इस लेख में प्रस्तुत विचार महान दार्शनिकों, धर्मग्रंथों और तंत्र शास्त्र के संदर्भों पर आधारित हैं। पाठक इसे अपनी व्यक्तिगत आस्था और विवेक के आधार पर ग्रहण करें।
आयु सीमा: यह सामग्री गंभीर दार्शनिक विषयों पर आधारित है, अतः परिपक्व पाठकों के लिए अनुशंसित है।
चिकित्सीय सलाह: तंत्र या योग से जुड़ी किसी भी क्रिया को बिना योग्य गुरु या विशेषज्ञ के मार्गदर्शन के न करें।
कॉपीराइट एवं बौद्धिक संपदा नीति (Copyright Policy)
सर्वाधिकार सुरक्षित: इस लेख के समस्त सर्वाधिकार वेब पत्रिका 'मीमांसा' के पास सुरक्षित हैं।
पुनरुत्पादन निषेध: इस सामग्री के किसी भी अंश (पाठ, विचार या संरचना) को बिना संपादक की लिखित अनुमति के किसी अन्य वेबसाइट, पत्रिका, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या डिजिटल माध्यम पर प्रकाशित, प्रसारित या कॉपी-पेस्ट करना कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।
उद्धरण: यदि आप इस लेख के किसी अंश को साझा करना चाहते हैं, तो 'मीमांसा' पत्रिका का नाम और मूल लेख का लिंक (URL) देना अनिवार्य है।
कानूनी कार्रवाई: कॉपीराइट नियमों का उल्लंघन करने पर बौद्धिक संपदा कानून (Intellectual Property Law) के अंतर्गत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
©2026, वेब पत्रिका 'मीमांसा'। सर्वाधिकार सुरक्षित
Comments
Post a Comment