बंगाली साहित्य व आदिवासी विमर्श की प्रमुख हस्ताक्षर, शब्द और संघर्ष की संबोधि : महाश्वेता देवी । जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। स्वदेश-स्वर स्तंभ । संपादकीय आलेख
साहित्य जब केवल मनोरंजन का साधन न रहकर समाज के अंतिम व्यक्ति की लड़ाई का हथियार बन जाए, तो वह कालजयी हो जाता है। 'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक में हम एक ऐसी ही चेतना का आह्वान कर रहे हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से भारतीय साहित्य के मानचित्र पर 'अरण्य' (जंगल) और 'अधुनातन संघर्ष' को एक नई पहचान दी वो हस्ताक्षर हैं महाश्वेता देवी।
हिंदी पाठकों के लिए महाश्वेता देवी का नाम अपरिचित नहीं है, किंतु उन्हें केवल एक 'बंगाली लेखिका' के रूप में देखना उनकी विराटता के साथ न्याय नहीं होगा। वे उन विरल रचनाकारों में से थीं, जिन्होंने शांतिनिकेतन की बौद्धिक विरासत को जंगलों की धूल और आदिवासियों के आंसुओं के साथ एकाकार कर दिया।
आज 14 जनवरी है। भारतीय काल गणना में सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व, प्रकाश की ओर बढ़ने का संकल्प। इसी पावन तिथि को वर्ष 1926 में 'ढाका' की मिट्टी में एक ऐसी चेतना ने जन्म लिया था, जिसने आगे चलकर भारतीय साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में एक 'महाश्वेता' (नर्मदा का एक नाम, जो निरंतर प्रवाहमान और शुद्ध है) की भाँति अपनी धवल आभा बिखेरी।
'मीमांसा' का यह अंक मात्र एक स्मरण नहीं है, बल्कि एक ऋषि-तुल्य साधिका के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का विनम्र प्रयास है। बंगाली साहित्य की महान लेखिका महाश्वेता देवी का जीवन और उनका कृतित्व आज की पीढ़ी के लिए एक ऐसा सेतु है, जो हमें मुख्यधारा के साहित्य से इतर उन वनवासियों, दलितों और उपेक्षितों के दुःख-दर्द से जोड़ता है, जिन्हें इतिहास ने अक्सर हाशिए पर धकेल दिया है। हिंदी जगत के लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम भाषाई सीमाओं को लांघकर उन रचनाकारों की विशिष्टता को समझें, जिन्होंने मानवता के कल्याण हेतु अपनी कलम को 'शस्त्र' और 'शास्त्र' दोनों बनाया।
जीवन दर्शन: ज्ञान परंपरा और पारिवारिक विरासत
महाश्वेता देवी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ साहित्य और कला रगों में बहती थी। उनके पिता, मनीष घटक, 'कल्लोल' आंदोलन के प्रखर कवि और उपन्यासकार थे, जिन्हें साहित्य जगत में 'युवनाश्व' के नाम से जाना जाता था। उनकी माता, धरित्री देवी, न केवल एक सुविख्यात लेखिका थीं, बल्कि समाज सेवा के प्रति भी पूर्णतः समर्पित थीं।
भारतीय ऋषि परंपरा में कहा गया है कि संस्कार ही मनुष्य के व्यक्तित्व की नींव होते हैं। महाश्वेता जी के चाचा प्रसिद्ध फिल्मकार ऋत्विक घटक थे और उनके मामा 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' के संस्थापक सचिन चौधरी थे।
उनकी शिक्षा की यात्रा शांतिनिकेतन की तपोभूमि से लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय तक विस्तृत रही। विश्वभारती विश्वविद्यालय में रवींद्रनाथ टैगोर के सानिध्य और वहाँ की प्रकृति-सुलभ शिक्षा ने उनके भीतर उस 'लोक' के प्रति संवेदना जाग्रत की, जो आगे चलकर उनके लेखन का आधार बना।
साहित्यिक दीक्षा: इतिहास से वर्तमान तक
महाश्वेता देवी की लेखनी ने 1956 में 'झाँसी रानी' (Jhansir Rani) के साथ दस्तक दी। यह मात्र एक जीवनी नहीं थी, बल्कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन का वह पुनर्निर्माण था, जिसके लिए उन्होंने झाँसी के चप्पे-चप्पे की यात्रा की, लोकगीतों को संकलित किया और ऐतिहासिक तथ्यों को जनश्रुतियों के साथ पिरोया।
उन्होंने 100 से अधिक उपन्यास और 20 से अधिक लघु कथा संग्रह रचे। उनके साहित्य की मूल विशिष्टता 'आदिवासी, दलित और उपेक्षित जन' थे। वे मानती थीं कि:
"असली इतिहास आम लोगों द्वारा बनाया जाता है। लोककथाएँ, गाथाएँ और मिथक ही पीढ़ियों की असली थाती हैं। मेरा लेखन इन्हीं शोषित, पीड़ित लेकिन कभी हार न मानने वाले मनुष्यों का ऋणी है।"
कृतित्व का विस्तृत विश्लेषण: मौलिक चिंतन के प्रतिमान
महाश्वेता देवी की रचनाएँ मात्र कागज़ पर उकेरे गए शब्द नहीं हैं, वे समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की चीख और चुनौती हैं। उनकी कृतियों में बंगाली नामों की मिठास और उन अंचलों की गंध रची-बसी है।
1. हजार चुराशिर मा (Hajar Churashir Maa - 1084 की माँ)
यह उपन्यास न केवल महाश्वेता जी की पहचान बना, बल्कि यह नक्सलवादी आंदोलन के दौर में एक माँ की वेदना और उसके सामाजिक बोध का जीवंत दस्तावेज है। लाश संख्या 1084 (उनका पुत्र व्रती) के माध्यम से वे व्यवस्था की क्रूरता को बेनकाब करती हैं। यह उपन्यास हमें सिखाता है कि वैचारिक मतभेदों से परे मानवीय संवेदना का स्थान सर्वोपरि है।
2. अरण्येर अधिकार (Aranyer Adhikar - जंगल का अधिकार)
भगवान बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित यह उपन्यास आदिवासी चेतना का महाकाव्य है। उन्होंने इस कृति के माध्यम से सिद्ध किया कि जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों का अधिकार उनके अस्तित्व का प्रश्न है। यह उपन्यास भारतीय ऋषि परंपरा के 'प्रकृति-प्रेम' और 'स्वाभिमान' का आधुनिक आख्यान है।
3. चोटी मुंडा एवं तार तीर (Chotti Munda Ebong Tar Tir)
इसमें चोटी मुंडा के माध्यम से उन्होंने आदिवासी संघर्ष और उनकी अपराजेय जिजीविषा का चित्रण किया है। उनके पात्र काल्पनिक नहीं, बल्कि वे हाड़-मांस के मनुष्य हैं जिन्हें उन्होंने बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वनांचलों में साथ रहकर समझा था।
4. रुदाली (Rudali)
स्त्री विमर्श और सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करता यह उपन्यास बताता है कि कैसे गरीबी और व्यवस्था स्त्री के आंसुओं तक का व्यापार करती है। यह कहानी भारतीय समाज के सामंती चेहरे पर एक करारा प्रहार है।
5. अग्निगर्भ (Agnigarbha)
यह लघुकथाओं का संग्रह है जो सत्ता और शोषितों के बीच के द्वंद्व को सूक्ष्मता से उकेरता है।
मीमांसा का विश्लेषण: साहित्य और सक्रियता का अद्वैत
महाश्वेता देवी केवल 'लेखक' नहीं थीं, वे एक 'एक्टिविस्ट' (कार्यकर्ता) भी थीं। उनके लिए साहित्य और कर्म में कोई भेद नहीं था। उन्होंने 'लोधा' और 'शबर' जैसी जनजातियों के अधिकारों के लिए वर्षों तक संघर्ष किया। मीमांसा के दृष्टिकोण से, महाश्वेता जी का चिंतन भारत की प्राचीन 'ऋषि परंपरा' के उस सूत्र को पुष्ट करता है जहाँ "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" की भावना निहित होती है। उन्होंने नंदीग्राम आंदोलन में अपनी आवाज बुलंद की और ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए सत्ता परिवर्तन में एक बौद्धिक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। उनके लिए लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति की सम्मानजनक भागीदारी थी।
उनका प्रसिद्ध उद्धरण, जो उन्होंने फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में दिया था, उनकी राष्ट्रभक्ति का परिचायक है:
"जूता जापानी, पतलून इंग्लिशतानी, टोपी रूसी, पर दिल... दिल हमेशा हिंदुस्तानी। मेरा देश... जर्जर, कटा-फटा, गर्वीला, सुंदर, गर्म, ठंडा, चमकता हुआ भारत। मेरा देश।"
पुरस्कार और सम्मान: राष्ट्र की कृतज्ञता
उनकी साधना को न केवल भारतवर्ष ने, बल्कि संपूर्ण विश्व ने सराहा। उनके प्रमुख सम्मानों की सूची निम्नलिखित है:
सम्मान–यात्रा
साहित्य अकादमी पुरस्कार (1979)
उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ हेतु
पद्म श्री (1986)
समाज सेवा के लिए
ज्ञानपीठ पुरस्कार (1996)
साहित्य का सर्वोच्च भारतीय सम्मान
रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (1997)
पत्रकारिता और सृजनात्मक संवाद हेतु
ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स (2003)
फ्रांस सरकार द्वारा प्रदत्त सम्मान
पद्म विभूषण (2006)
भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
बंग विभूषण (2011)
पश्चिम बंगाल सरकार का सर्वोच्च सम्मान
उपसंहार: 'मीमांसा' की श्रद्धांजलि
28 जुलाई 2016 को 90 वर्ष की आयु में महाश्वेता देवी का भौतिक शरीर शांत हो गया, किंतु उनकी लेखनी आज भी मशाल की तरह जल रही है। उन्होंने बिजन भट्टाचार्य जैसे महान नाटककार के साथ जीवन साझा किया और अपने पुत्र नबरुण भट्टाचार्य के रूप में एक प्रखर साहित्यकार देश को दिया।
आज जब हम 14 जनवरी को उनकी जयंती मना रहे हैं, तो हमें यह समझना होगा कि 'मीमांसा' के पाठकों के लिए महाश्वेता देवी केवल एक बंगाली लेखिका नहीं हैं, बल्कि वे उस 'ज्ञान परंपरा' की संवाहक हैं जो सच बोलने का साहस देती है। उन्होंने सिखाया कि साहित्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज के 'शव' में 'शिव' जगाने के लिए होता है।
महाश्वेता देवी को शत-शत नमन!
जयंती विशेषांक/संपादकीय आलेख
स्वदेश-स्वर स्तंभ
©अमन कुमार होली
संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
एडिटर ई-मेल editorwebmimansa@gmail.com
ई-मेल webmimansa@gmail.com
अस्वीकरण (Disclaimer)
उद्देश्य: यह आलेख महाश्वेता देवी की जन्मशती/जयंती के अवसर पर केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है।
तथ्य स्रोत: लेख में प्रयुक्त जीवनवृत्त, तिथियाँ और ऐतिहासिक संदर्भ सार्वजनिक डोमेन (विकिपीडिया व अन्य अभिलेखागारों) से संकलित हैं। मानवीय त्रुटि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
निजी विचार: आलेख में प्रस्तुत 'मीमांसा विश्लेषण' और मौलिक चिंतन पत्रिका के संपादकीय दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। इसे किसी भी राजनीतिक या कानूनी साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता।
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