वेब पत्रिका 'मीमांसा' विश्व क्षितिज स्तंभ पुण्यतिथि स्मृति विशेषांक : भारत का वह छोटे कद के बड़े नायक जिसने दुनिया को झुका दिया। स्तंभकार अभिषेक यादव
वेब पत्रिका 'मीमांसा' पुण्यतिथि विशेषांक विश्व क्षितिज स्तंभ में लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन, उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता, 1965 के युद्ध की गाथा और ताशकंद की उस काली रात के अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। जिसे स्तंभकार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र अभिषेक यादव ने प्रस्तुत किया है।
सादगी के महासागर में छिपी शौर्य की लहरें
इतिहास के पन्ने अक्सर उन्हीं के नाम सुनहरे अक्षरों में लिखते हैं, जिनके पास विशाल सेनाएं या ऊंची कद-काठी होती है। लेकिन भारतीय राजनीति के क्षितिज पर एक ऐसा सितारा चमका, जिसने अपनी सादगी से सत्ता के अहंकार को और अपने छोटे से कद से वैश्विक ताकतों के गुरूर को बौना कर दिया। वह थे लाल बहादुर शास्त्री। आज उनकी पुण्यतिथि पर, 'मीमांसा' का यह विशेष आलेख उस महान आत्मा को समर्पित है, जिनकी मृत्यु आज भी भारतीय जनमानस के लिए एक गहरा घाव और उससे भी गहरा रहस्य बनी हुई है।
जय जवान, जय किसान : एक नारे में सिमटा राष्ट्र का स्वाभिमान
शास्त्री जी के कार्यकाल को समझने के लिए उस दौर की चुनौतियों को समझना होगा। नेहरू के बाद देश नेतृत्व के संकट से जूझ रहा था, ऊपर से अकाल और पाकिस्तान की गिद्ध दृष्टि। जब अमेरिका ने PL-480 समझौते के तहत गेहूं की आपूर्ति रोकने की धमकी देकर भारत को ब्लैकमेल करना चाहा, तब शास्त्री जी ने हाथ फैलाने के बजाय देश को स्वावलंबन का मार्ग दिखाया।
उन्होंने देशवासियों से अपील की "सप्ताह में एक समय का भोजन त्याग दें।" उन्होंने खुद अपने घर से इसकी शुरुआत की। इसी संकल्प से जन्म हुआ 'जय जवान, जय किसान' के कालजयी नारे का। यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि भारत के दो सबसे मजबूत स्तंभों, खेत की मिट्टी में पसीना बहाने वाले किसान और सीमा पर लहू बहाने वाले जवान के बीच एक अटूट सेतु था। शास्त्री जी जानते थे कि जब तक भारत पेट और सीमा, दोनों मोर्चों पर आत्मनिर्भर नहीं होगा, वैश्विक शक्तियां हमें दबाती रहेंगी।
अयूब खान का अहंकार और 1965 की रणभेरी
1965 का युद्ध केवल दो देशों का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह दो विचारधाराओं की भिड़ंत थी। एक तरफ पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह अयूब खान थे, जिन्हें अपनी अमेरिकी 'पैटन टैंक' और 'सेबर जेट्स' पर अटूट विश्वास था। अयूब खान शास्त्री जी के विनम्र स्वभाव और छोटे कद को देखकर अक्सर उनका उपहास उड़ाते थे। उन्हें लगता था कि एक साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति पाकिस्तान की सैन्य ताकत का सामना नहीं कर पाएगा।
लेकिन जब पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' के जरिए कश्मीर में घुसपैठ की, तब शास्त्री जी ने वह किया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी उन्होंने सेना को खुली छूट दी और युद्ध का मोर्चा लाहौर की तरफ मोड़ दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि "अगर पाकिस्तान दिल्ली तक आने की सोचता है, तो उसे यह याद रखना चाहिए कि हम लाहौर में नाश्ता करने की कूवत रखते हैं"।
भारतीय जांबाज सैनिकों ने असल उताड़ (Asal Uttar) के युद्ध में पाकिस्तानी टैंकों का कब्रिस्तान बना दिया। अयूब खान का वह अहंकार, जो कहते थे कि वे दिल्ली तक पैदल पहुंच जाएंगे, शास्त्री जी की दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने मिट्टी में मिल गया।
कला और संस्कृति का संगम: मनोज कुमार और 'उपकार'
शास्त्री जी की दूरदर्शिता केवल राजनीति तक सीमित नहीं थी। वे जानते थे कि राष्ट्र के मनोबल को बढ़ाने के लिए कला एक सशक्त माध्यम है। 1965 के युद्ध के बाद, जब उन्होंने फिल्म अभिनेता मनोज कुमार से मुलाकात की, तो उन्होंने उनसे 'जय जवान, जय किसान' के मूल मंत्र पर एक फिल्म बनाने का आग्रह किया।
यही वह बीज था जिससे फिल्म 'उपकार' का जन्म हुआ। मनोज कुमार 'भारत कुमार' कहलाए और "मेरे देश की धरती सोना उगले..." जैसे गीतों ने पूरे राष्ट्र में देशभक्ति का संचार कर दिया। यह शास्त्री जी की वह कोमल शक्ति (Soft Power) थी, जिसने सिनेमा को राष्ट्र निर्माण के साधन के रूप में इस्तेमाल किया।
ताशकंद समझौता: भू-राजनीति और सोवियत संघ की चालें
युद्ध के मैदान में जीतने के बाद, कूटनीति की मेज पर भारत को घेरने की तैयारी शुरू हुई। सोवियत संघ ने मध्यस्थता की पेशकश की और शास्त्री जी को ताशकंद (वर्तमान उज्बेकिस्तान) आमंत्रित किया गया। यहाँ पर भू-राजनीतिक समीकरण बदल रहे थे। अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों ही नहीं चाहते थे कि भारत इस युद्ध में दक्षिण एशिया का निर्विवाद विजेता बने।
10 जनवरी 1966 को भारी दबाव के बीच ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर हुए। भारत ने वह जमीन (जैसे हाजी पीर दर्रा और लाहौर का उपनगरीय इलाका) वापस करने पर सहमति दी, जिसे सैनिकों ने अपना खून बहाकर जीता था। कहा जाता है कि इस समझौते ने शास्त्री जी के हृदय को भीतर से तोड़ दिया था। जब उन्होंने अपनी पत्नी ललिता देवी को फोन किया, तो उन्होंने भी नाराजगी जताई, जिसने शास्त्री जी को और अधिक व्यथित कर दिया।
मृत्यु का रहस्य: वह काली रात और अनसुलझे सवाल
ताशकंद समझौते के महज 12 घंटे बाद, 11 जनवरी 1966 की रात 1:32 बजे खबर आई कि भारत के प्रधानमंत्री नहीं रहे। आधिकारिक तौर पर इसे दिल का दौरा बताया गया, लेकिन इसके पीछे के तथ्य रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं:
शरीर का नीला पड़ना: शास्त्री जी के पार्थिव शरीर को जब भारत लाया गया, तो उनका रंग गहरा नीला और चेहरा सूजा हुआ था। उनकी पत्नी ललिता देवी और पुत्र सुनील शास्त्री ने शरीर पर कट के निशान और नीले धब्बे देखे थे, जो जहर के लक्षणों की ओर इशारा करते हैं।
पोस्टमार्टम का न होना: सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े राष्ट्राध्यक्ष की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु होने के बावजूद पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया गया?
लापता साक्ष्य: शास्त्री जी की वह 'लाल डायरी' और उनका 'थर्मस' जिसमें वे पानी या दूध पीते थे, ताशकंद से कभी वापस ही नहीं आए।
के.जी.बी. और विदेशी हाथ: 'मित्रोखिन आर्काइव' (Mitrokhin Archive) जैसे दस्तावेजों ने बाद में इशारा किया कि भारतीय राजनीति में सोवियत जासूसी एजेंसी केजीबी की पैठ कितनी गहरी थी। क्या शास्त्री जी को रास्ते से हटाकर किसी ऐसी शक्ति को लाने की कोशिश थी जो सोवियत हितों के प्रति अधिक लचीली हो?
निष्कर्ष: एक अधूरा इंसाफ
लाल बहादुर शास्त्री जी केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थे; वे भारत की आत्मा के प्रतीक थे। उनकी मृत्यु का रहस्य केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के साथ हुआ विश्वासघात है। 'ताशकंद फाइल्स' जैसे प्रयासों ने इस बहस को दोबारा जीवित किया है, लेकिन जब तक सरकारें इन फाइलों को सार्वजनिक नहीं करतीं, यह रहस्य काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गलियारों से लेकर दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक गूंजता रहेगा।
शास्त्री जी ने कहा था, "देश की ताकत उसकी सेना और किसानों में है।" आज उनकी पुण्यतिथि पर हम केवल उन्हें याद न करें, बल्कि उनके सिद्धांतों पर चलने का संकल्प लें और उस सत्य की खोज जारी रखें जो छह दशकों से दबा हुआ है।
मीमांसा का तर्क (Editorial Note)
वेब पत्रिका 'मीमांसा' का मानना है कि इतिहास केवल अतीत का विवरण नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक सबक है। शास्त्री जी की मृत्यु की जांच न होना भारतीय लोकतंत्र के माथे पर एक ऐसा कलंक है जिसे केवल सत्य की रोशनी ही मिटा सकती है। हम तथ्यों की तार्किकता और साक्ष्यों की गंभीरता पर विश्वास करते हैं।
विश्व -क्षितिज/ स्तंभ
स्तंभकार: अभिषेक यादव
(पूर्व छात्र हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय)
लेखक परिचय:
अभिषेक यादव हिंदी साहित्य और समकालीन विमर्श के क्षेत्र में एक उभरते हुए गंभीर लेखक एवं विश्लेषक हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग के पूर्व छात्र रहे अभिषेक के लेखन में महामना की बगिया के वैचारिक संस्कार और अकादमिक गहराई स्पष्ट रूप से झलकती है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह आलेख ऐतिहासिक दस्तावेजों, साक्षात्कारों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित है। आलेख का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत करना है। इसमें व्यक्त विचार विभिन्न शोधकर्ताओं और लेखकों के व्यक्तिगत निष्कर्षों से प्रेरित हो सकते हैं।
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