वेब पत्रिका 'मीमांसा' संपादकीय वागेश्वरी स्तंभ विशेषांक में आज संघर्ष से स्वतंत्रता तक: महिलाएं, पुरुष जीवन की धुरी
समुद्र की अनंत लहरों के बीच, ढलते सूरज की उस सुनहरी आभा को देखिए। पैरों के नीचे गीली रेत की वह सिहरन और हवा के झोंकों के साथ अठखेलियाँ करता वह सुर्ख लाल पल्लू... यह केवल एक दृश्य नहीं है। यह एक 'मेटाफर' है उस यात्रा का जो एक स्त्री अपनी कोख से शुरू करती है और अंततः अपनी चेतना के विस्तार तक ले जाती है।
भोगे हुए यथार्थ की जमीनी परतें
अक्सर कहा जाता है कि स्त्री शक्ति है, पर क्या हमने कभी उस शक्ति के पीछे के 'थकान' को महसूस किया है? भारतीय समाज में स्त्री का 'भोगे हुए यथार्थ' का अर्थ केवल आर्थिक तंगी या शारीरिक श्रम नहीं है। वह यथार्थ है अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर दूसरों की थाली में रोटी परोसना।
बचपन में 'पराया धन' के ठप्पे से लेकर, ससुराल में 'कुल की मर्यादा' के भारी बोझ तक, स्त्री का संघर्ष मौन रहा है। वह पुरुष जीवन की धुरी इसलिए बनी क्योंकि उसने स्वयं को धुरी की तरह घिसना स्वीकार किया। वह धुरी जो पूरे परिवार की गाड़ी को खींचती है, पर खुद कभी आगे नहीं बढ़ पाती।
मातृत्व: वात्सल्य और विसर्जन का संगम
स्त्री के अस्तित्व का सबसे गहरा रंग 'मातृत्व' है। लेकिन यहाँ मातृत्व का अर्थ केवल संतानोत्पत्ति नहीं है। यह वह 'मदरिंग इंस्टिंक्ट' है जो उसे हर रिश्ते में एक रक्षक बनाती है।
जब एक माॅं अपनी संतान को देखती है, तो वह केवल एक बच्चा नहीं देखती, वह अपना भविष्य और अपना बीता हुआ कल दोनों देखती है। वह वात्सल्य ही है जो उसे रात-रात भर जगाए रखता है, लेकिन विडंबना देखिए कि इसी वात्सल्य को उसकी 'कमजोरी' मान लिया गया। असल में, मातृत्व उसका त्याग नहीं, उसका विस्तार है। वह अपने भीतर से एक नया ब्रह्मांड रचने की क्षमता रखती है।
पुरुष जीवन की धुरी: एक अनिवार्य जुड़ाव
समाज अक्सर तर्क देता है कि पुरुष प्रधान है। लेकिन गहराई से सोचें तो पुरुष का पूरा अस्तित्व, उसका बचपन माॅं की उंगली पकड़े, उसकी जवानी जीवन संगिनी के सहयोग पर और उसका बुढ़ापा बेटी की ममता पर टिका है।
"स्त्री वह केंद्र है जिसके बिना पुरुष का समाज बिखर जाएगा। वह केवल घर नहीं बनाती, वह सभ्यता का निर्माण करती है।"
महिलाएं जब संघर्ष करती हैं, तो वे केवल अपने लिए नहीं लड़तीं। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नया आकाश बनाती हैं। इस चित्र की तरह, जब वह समुद्र की लहरों (चुनौतियों) के बीच नृत्य करती है, तो वह संदेश देती है कि 'स्वतंत्रता' किसी से मांगकर नहीं ली जाती, वह भीतर से पैदा होती है।
संघर्ष से स्वतंत्रता का मार्ग
आज की स्त्री 'धुरी' बने रहने के साथ-साथ अपनी 'परिधि' भी खुद तय कर रही है। वह अब केवल दूसरों के जीवन का आधार नहीं है, वह अपने जीवन का नायक भी है। संघर्ष का वह दौर जहाँ उसे 'मूक' समझा जाता था, अब पीछे छूट रहा है। अब वह बोलती है, वह सवाल करती है और वह अपनी देह और आत्मा पर अपना अधिकार मांगती है।
वह लाल साड़ी जिसे अक्सर सुहाग या परंपरा का प्रतीक माना गया, इस चित्र में वह 'क्रांति' का रंग है। वह रंग जो बताता है कि स्त्री अब लहरों से डरती नहीं, वह लहरों के साथ बहना और उनके विरुद्ध खड़ा होना सीख गई है।
प्राचीन ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति में स्त्री, विशेषकर 'माता' और 'गुरु माता' का स्थान केवल सम्मानीय ही नहीं, बल्कि सर्वोच्च रहा है। '
मातृ देवो भव: प्रथम गुरु के रूप में माँ
वैदिक ऋषियों ने उद्घोष किया था "मातृ देवो भव"। प्राचीन काल में माँ को ही बालक का प्रथम गुरु माना जाता था। तैत्तिरीय उपनिषद में शिक्षा की समाप्ति पर गुरु अपने शिष्य को जो पहला उपदेश देते थे, उसमें माता का स्थान पिता और स्वयं गुरु से भी ऊपर रखा गया था।
गर्भ संस्कार: ऋषियों का मानना था कि शिक्षा गर्भ से ही प्रारंभ हो जाती है। जिस प्रकार अभिमन्यु ने गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदन सीखा, वह माँ की चेतना की ही शक्ति थी।
धुरी के रूप में: एक माँ केवल जन्म नहीं देती, बल्कि वह बालक के चरित्र और नैतिकता का निर्माण करती है।
गुरु माता: गुरुकुल की वात्सल्यमयी शक्ति
प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था में गुरु जितने कठोर और अनुशासित थे, 'गुरु माता' उतनी ही वात्सल्यमयी और कोमल थीं।
आध्यात्मिक लंगर: गुरु माता केवल गुरु की पत्नी नहीं, बल्कि पूरे गुरुकुल की 'माँ' होती थीं। वे शिष्यों के भोजन, स्वास्थ्य और भावनात्मक जुड़ाव का ध्यान रखती थीं।
संतुलन: जहाँ गुरु ज्ञान और अनुशासन का प्रतीक थे, वहीं गुरु माता प्रेम और सेवा की धुरी थीं। उनके बिना कोई भी गुरुकुल पूर्ण नहीं था।
मातृ प्रधानता और ऋषिकाओं का योगदान
प्राचीन भारत में केवल पुरुष ऋषि ही नहीं थे, बल्कि कई महान ऋषिकाएं (महिला ऋषि) भी हुईं जिन्होंने वेदों के मंत्रों की रचना की।
ब्रह्मवादिनी: गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा और घोषा जैसी विदुषियों ने बड़े-बड़े शास्त्रार्थों में अपनी विद्वता सिद्ध की।
शास्त्रों का मत: मनुस्मृति में उल्लेख है कि:
"उपाध्यायान् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता। सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते॥"
(अर्थात: दस उपाध्यायों से बढ़कर एक आचार्य होता है, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता होता है, लेकिन एक माता अपने गौरव में हजार पिताओं से भी श्रेष्ठ होती है।)
स्वतंत्रता और गरिमा का संगम
आज की आधुनिक स्त्री जब 'स्वतंत्रता' की बात करती है, तो उसे यह समझना होगा कि यह स्वतंत्रता उसे किसी 'पुरुष' ने नहीं दी, बल्कि यह उसकी अपनी प्राचीन विरासत है। प्राचीन परंपरा में स्त्री कभी अबला नहीं थी; वह 'शक्ति' का पर्याय थी। संघर्ष से स्वतंत्रता तक की उसकी यह यात्रा असल में अपनी खोई हुई उसी 'ऋषि परंपरा' की गरिमा को वापस पाने की यात्रा है। आज की महिलाएं जब दफ्तरों या समाज के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व करती हैं, तो वे असल में उसी प्राचीन 'गुरु माता' और 'ऋषिका' के उत्तरदायित्व को नए स्वरूप में निभा रही हैं।
मीमांसा का विश्लेषण: 'लाल रंग' परंपरा से क्रांति तक
इस आलेख का गहरा विश्लेषण करने पर आपने जाना होगा कि यहाँ 'लाल रंग' के अर्थ में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है। पारंपरिक रूप से लाल रंग को केवल सुहाग या एक बंधी-बंधाई मर्यादा का प्रतीक माना जाता था। लेकिन इस 'मीमांसा' में, वह लाल रंग 'चेतना की अग्नि' और 'क्रांति' का प्रतीक बनकर उभरा है। जब तक भारती नारी आत्मसाक्षात्कार नहीं करेंगी और पुराने ऋषि परंपरा की मौलिक मीमांसा कर अपने निजित्व का विलय नहीं करेंगी तब तक बाह्य कारणों से आक्रांत बनी रहेंगी।
धुरी से परिधि तक: स्त्री अब केवल केंद्र (धुरी) बनकर स्थिर रहने को मजबूर नहीं है। वह स्वयं अपनी परिधि (सीमाएं) तय कर रही है। यह उसकी स्वायत्तता की घोषणा है।
थकान की स्वीकृति: यह आलेख पहली बार स्त्री की 'थकान' को स्वीकार करता है। यह स्वीकारोक्ति ही उसे 'मशीन' से 'मनुष्य' बनाने की दिशा में पहला कदम है।
विरासत का पुनरागमन: आधुनिक स्वतंत्रता कोई पश्चिमी उधार नहीं है, बल्कि हमारी अपनी 'वैदिक ऋषिका परंपरा' की वापसी है।
निष्कर्ष
बहनों, आपकी थकान में ही आपकी जीत छिपी है। आपका मातृत्व आपकी कमजोरी नहीं, ईश्वरीय अंश है। आप केवल किसी की बेटी, पत्नी या मां नहीं हैं; आप वह ऊर्जा हैं जिससे यह सृष्टि स्पंदित होती है। संघर्ष लंबा है, पर उस ढलते सूरज के बाद की चांदनी आपकी स्वतंत्रता की गवाह बनेगी।
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