संघर्ष से शिखर तक महामहिम द्रौपदी मुर्मू की प्रेरणादायी गाथा । जोहार - स्तंभ । वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

एक नए अध्याय का शंखनाद

आज 'मीमांसा' पत्रिका के 'जोहार' स्तंभ का शुभारंभ करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। 'जोहार' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और अस्तित्व के प्रति सम्मान की एक गूँज है। आदिवासी और मूलवासी समाज की वह आवाज़, जो मुख्यधारा के शोर में कहीं पीछे छूट गई थी, उसे पुनर्जीवित करने और विमर्श के केंद्र में लाने का हमारा यह पुनीत संकल्प है। इस नए अध्याय की शुरुआत हम एक ऐसी विभूति के जीवन-वृत्त से कर रहे हैं, जिन्होंने न केवल इतिहास रचा है, बल्कि अभावों की कोख से निकलकर भारतीय गणराज्य के सर्वोच्च पद तक पहुँचकर करोड़ों वंचितों के सपनों को पंख दिए हैं। वे हैं भारतीय गणराज्य की 15वीं राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी।

जन्म और माटी का संस्कार

ओडिशा के मयूरभंज जिले के बैदापोसी गाँव के एक छोटे से मिट्टी के घर में 20 जून 1958 को जब एक बालिका ने जन्म लिया, तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि वह एक दिन 'रायसीना हिल्स' की भव्यता को सुशोभित करेगी। एक संथाल परिवार में जन्मीं द्रौपदी जी के पिता बिरंचि नारायण टुडु और उनके दादा गाँव के प्रधान थे। मिट्टी से जुड़ाव और समाज सेवा के संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे। उनकी आँखों में बचपन से ही कुछ कर गुजरने की ललक थी, जो उन्हें रायरंगपुर के अभावग्रस्त जीवन से निकालकर भुवनेश्वर के 'रमा देवी महिला विश्वविद्यालय' तक ले गई। वे अपने गाँव की उन चुनिंदा लड़कियों में से थीं, जिन्होंने उच्च शिक्षा का सपना देखा और उसे पूरा किया।

संघर्षों की अग्निपरीक्षा और अटूट जिजीविषा

       महामहिम मूर्मू (दाएं ) की बचपन की तस्वीर 

महामहिम का जीवन किसी महाकाव्य से कम नहीं है, जहाँ पग-पग पर चुनौतियाँ थीं। उन्होंने एक अध्यापिका के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की, जहाँ वे केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि बच्चों में बेहतर भविष्य की उम्मीदें भी जगाती थीं। लेकिन नियति ने उनकी कड़ी परीक्षा ली। जीवन के एक मोड़ पर उन्होंने अपने दोनों बेटों और पति श्याम चरण मुर्मू को खो दिया। एक माँ और पत्नी के रूप में उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। कोई भी सामान्य व्यक्ति इस वज्रपात से टूट सकता था, लेकिन द्रौपदी मुर्मू जी ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को जनसेवा की शक्ति में बदल दिया। उन्होंने अध्यात्म और ध्यान का सहारा लिया और स्वयं को समाज के लिए समर्पित कर दिया। उनका यह स्वरूप 'मृदु स्वर' और 'विराट मातृत्व' का संगम है, जो आज पूरे राष्ट्र को अभिसिंचित कर रहा है।

राजनीतिक सफर: जनसेवा से राजभवन तक

उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को राखी बांधती महामहिम मर्मू। (वर्ष 2000)

 श्रीमती मुर्मू का राजनीतिक सफर जमीनी स्तर से शुरू हुआ। साल 1997 में वे रायरंगपुर नगर पंचायत की पार्षद चुनी गईं। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा के उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के रूप में उन्होंने आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। ओडिशा विधानसभा में दो बार (2000 और 2009) विधायक के रूप में उनकी सक्रियता ने उन्हें एक कुशल प्रशासक के रूप में स्थापित किया। बीजू जनता दल और भाजपा गठबंधन की सरकार में उन्होंने वाणिज्य, परिवहन और मत्स्य पालन जैसे विभागों को कुशलता से संभाला।
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करतीं महामहिम मूर्मू 

उनकी निष्ठा और कार्यक्षमता का ही परिणाम था कि 2015 में वे झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनीं। किसी भी भारतीय राज्य की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल बनने का गौरव हासिल कर उन्होंने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया। 2021 तक के उनके कार्यकाल को उनकी संवेदनशीलता और संवैधानिक मर्यादाओं के पालन के लिए सदैव याद किया जाएगा।

ऐतिहासिक क्षण: गणतंत्र का गौरव

राष्ट्रपति के रूप में पहली बार शपथ ग्रहण के पश्चात् प्रेसिडेंट गार्डों के साथ

25 जुलाई 2022 का दिन भारतीय लोकतंत्र के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया, जब द्रौपदी मुर्मू जी ने भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। वे स्वतंत्र भारत में पैदा होने वाली पहली राष्ट्रपति और देश की सबसे कम उम्र की राष्ट्रपति बनीं। उनका राष्ट्रपति चुना जाना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र की उस समावेशी शक्ति का परिचायक था, जहाँ सुदूर अंचल की एक आदिवासी बेटी भी देश के प्रथम नागरिक का पद संभाल सकती है।

तीनों सैन्य इकाईयों की सर्वोच्च कमांडर के रूप में तेजस जेट के साथ महामहिम मूर्मू 

आदिवासी विमर्श और मुख्यधारा की नई परिभाषा
आज जब 'जोहार' के माध्यम से हम आदिवासी अस्तित्व की बात कर रहे हैं, तो महामहिम मुर्मू जी उस विमर्श का सबसे सशक्त चेहरा हैं। उन्होंने सिद्ध किया है कि जनजातीय समाज केवल 'कल्याणकारी योजनाओं' का पात्र नहीं है, बल्कि वह नेतृत्व करने में सक्षम है। उनका जीवन अभावों से जूझ रहे युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। विशेष रूप से आदिवासी बच्चों के लिए वे एक ऐसी मार्गदर्शक हैं, जो बताती हैं कि शिक्षा और संकल्प के बल पर दुनिया की कोई भी बाधा आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।

निष्कर्ष

श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी का व्यक्तित्व वात्सल्य और अनुशासन का अनूठा मिश्रण है। उनका संघर्ष हमें सिखाता है कि हार मान लेना विकल्प नहीं है। 'जोहार' स्तंभ के इस प्रथम अंक के माध्यम से हम उनकी इस संघर्ष गाथा को नमन करते हैं। उन्होंने जनजातीय जीविता में नए प्राण फूँके हैं और मुख्यधारा को यह सोचने पर मजबूर किया है कि विकास का मार्ग जंगल की उन पगडंडियों से होकर भी गुजरता है, जहाँ संघर्ष और सत्य आज भी जीवित हैं।
महामहिम की यह यात्रा करोड़ों भारतीयों के हृदय में आशा की एक नई किरण जगाती है। उनके नेतृत्व में भारत गणराज्य और अधिक समावेशी और सशक्त बनेगा, ऐसी हमारी मंगलकामना है।

जोहार! जय हिंद!

जोहार -स्तंभ/ संपादकीय आलेख 
© अमन कुमार होली 
संपादक 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

आह्वान: "कलम उठाओ, पहचान बचाओ"

साथियों,
इतिहास गवाह है कि जिनकी गाथाएँ खुद नहीं लिखी जातीं, समय उनकी कहानियों को बदल देता है। हमारे आदिवासी-मूलवासी समाज के पास लोकगीतों की मिठास है, लोककथाओं का दर्शन है और प्रकृति से प्रेम करने का वह विज्ञान है जिसे आज दुनिया 'सस्टेनेबिलिटी' कह रही है। पर क्या यह सब मुख्यधारा तक पहुँच पा रहा है?
'जोहार' स्तंभ आपको आमंत्रित करता है। यदि आपके पास अपने पुरखों की कोई अनकही कहानी है, यदि आप अपनी परंपराओं के लुप्त होने से चिंतित हैं, या आपके पास जल-जंगल-जमीन के संरक्षण का कोई मौलिक विचार है तो अपनी कलम उठाइए।
यह मंच आपका है। अपनी संस्कृति की महक को शब्दों के जरिए पूरी दुनिया तक पहुँचाइए। आइए, मिलकर एक ऐसा विमर्श छेड़ें कि आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से कह सकें कि हमने अपनी जड़ों को सूखने नहीं दिया। 

जुड़िए 'जोहार' से, जुड़िए अपनी आत्मा से।

संपादक 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):

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