विरह के व्याकरण में लोक, साहित्य और सनातन संवेदना नागमती से उर्मिला तक: बारहमासा और नारी चेतना की अजेय शक्ति। वागेश्वरी स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।
प्रिय पाठकों, आज का युग 'क्लिक' और 'ब्लॉक' की तीव्रगामी संस्कृति का है, जहाँ संवेदनाएँ उथली और संबंध 'इंस्टेंट' हो गए हैं। ऐसे में वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह संपादकीय स्तंभ आपको पुनः उस भारतीय वाङ्मय और दर्शन की ओर ले जाने का आह्वान करता है, जहाँ प्रेम केवल प्राप्ति नहीं, बल्कि तपस्या है।
आज की पीढ़ी, जो एक छोटे से 'ब्रेकअप' को जीवन की हार मानकर अवसाद की ओट लेती है, उसे जायसी की नागमती और गुप्त की उर्मिला को सुनने की आवश्यकता है। भारतीय 'बारहमासा' परंपरा सिखाती है कि विरह 'स्व-विनाश' (Self-Destruction) नहीं, बल्कि 'स्व-परिष्कार' (Self-Refinement) की यात्रा है। यहाँ स्त्री बेचारी नहीं, बल्कि प्रकृति के समान विराट है, जो ऋतुओं के प्रहार को सहकर 'कुंदन' बनती है।
मैंने यह अंक अपनी हिंदी की महिला प्रोफेसरों के अवसाद ग्रसित 'वाट्स्टेसऐप स्टेटस' को देख कर प्रतिक्रिया स्वरूप लिखा है। हालांकि आज यहाॅं यह विमर्श सार्वभौमिक हो गया है। युवा लड़के और लड़कियां स्टेटस के माया जाल में फंसे हैं। जिन्हें पुनः भारतीय साहित्य और संस्कार से परिचय करवाना हमारा नैतिक कर्तव्य बन जाता है।
पाश्चात्य फेमिनिज्म जहाँ अधिकारों की बात करता है, वहीं हमारी संस्कृति स्त्री को 'सृजन और धैर्य' की उस पराकाष्ठा पर देखती है जहाँ उसकी पीड़ा वैश्विक (Universal) हो जाती है। आइए, बॉलीवुड के सतही दर्द से ऊपर उठकर साहित्य के उस 'करुणा रस' में डूबें, जो हमें टूटना नहीं, बल्कि तपना सिखाता है। 'वागेश्वरी' का यह अंक नारी चेतना की इसी अजेय शक्ति को समर्पित है।
भारतीय वाङ्मय में संवेदना की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यहाँ केवल मौसम नहीं बदलते, बल्कि उन मौसमों के साथ स्त्री के अंतर्मन की भाव-दशाएँ भी आकार लेती हैं। जब हम हिंदी साहित्य के 'बारहमासा' और 'ऋतु वर्णन' की बात करते हैं, तो यह केवल प्रकृति का चित्रण नहीं, बल्कि स्त्री के हृदय के सूक्ष्म संवेगों का 'साधारणीकरण' है।
आज के तीव्रगामी युग में, जहाँ प्रेम 'क्लिक' पर उपलब्ध है और वियोग एक 'ब्लॉक' बटन तक सीमित हो गया है, वहाँ संवेदना का धरातल अत्यंत पथरीला होता जा रहा है। या कहें कि बॉलीवुड व हॉलीवुड के प्रभाव वाले आज के 'इंस्टेंट रिस्पॉन्स' और 'हुकअप कल्चर' वाले दौर में, जहाँ एक छोटा सा 'ब्रेकअप' कलाई काटने या मोबाइल स्टेटस पर सैड सॉन्ग के रूप में अवसाद (Depression) परोसने का माध्यम बन गया है, वहाँ मलिक मोहम्मद जायसी की नागमती या सूरदास की गोपियाँ एक अलग ही धरातल पर खड़ी दिखाई देती हैं।
बारहमासा: वियोग का वार्षिक इतिहास
भारतीय साहित्य व संस्कृति में विरह का अर्थ 'टूटना' नहीं, बल्कि 'तपना' है। बारहमासा पद्धति में आषाढ़ की पहली गूँज से लेकर जेठ की तपिश तक, नारी संवेदना प्रकृति के साथ एकाकार हो जाती है। भारतीय लोक-चेतना और साहित्य में 'बारहमासा' केवल महीनों की गणना नहीं है, बल्कि यह एक विरहिणी के हृदय का वार्षिक इतिहास है। इसकी जड़ें संस्कृत साहित्य के 'षड्ऋतु वर्णन' (कालिदास का ऋतुसंहार) में निहित हैं, जहाँ छह ऋतुओं के सौंदर्य का चित्रण 'संयोग' के परिप्रेक्ष्य में था। किंतु, समय के साथ जब यह लोक-भाषा और हिंदी साहित्य में उतरा, तो इसने 'विप्रलंभ शृंगार' (विरह) का जामा पहन लिया।
आषाढ़: जब आकाश में बादल उमड़ते हैं, तो वह केवल बारिश नहीं है, बल्कि विरहिणी के हृदय की व्याकुलता है "आषाढ़ लाग, गगन गाजा।"
कार्तिक: जब संसार शरद की चांदनी में नहाता है, तब स्त्री का विरह उसे पवित्रता की अग्नि में कुंदन बनाता है।
यहाँ 'विरह' कोई मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है। पाश्चात्य फेमिनिज्म जहाँ 'अधिकार' और 'अस्तित्व' की लड़ाई लड़ता है, वहीं भारतीय दृष्टिकोण स्त्री को 'सृजन और सहनशीलता' की उस ऊंचाई पर बिठाता है जहाँ वह प्रकृति की नियंता बन जाती है।
नरपति नाल्ह के 'बीसलदेव रासो' से शुरू हुई यह यात्रा मलिक मोहम्मद जायसी के 'पद्मावत' में अपने शिखर पर पहुँचती है। जायसी की नागमती का विरह केवल एक रानी का विरह नहीं है, बल्कि वह समस्त नारी जाति की संवेदना का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रकृति के दर्पण में नारी: एक शोधपरक विश्लेषण
आज आधुनिक बोध बनाम सनातन संवेदना को तलाशने की आवश्यकता है। स्कूलों काॅलेजों में पढ़ने वाले युवा पीढ़ी, जो बॉलीवुड के 'सैड सॉन्ग्स' में अपनी पीड़ा तलाशती है, उसे यह समझने की आवश्यकता है कि भारतीय साहित्य की नारी 'बेचारी' नहीं है।
संवेदना का विस्तार: पाश्चात्य दृष्टि अक्सर देह और व्यक्तिवाद तक सीमित रह जाती है, लेकिन भारतीय नारी संवेदना 'लोक' से जुड़ी है। विरह में जलती हुई नागमती जब कहती है कि उसके धुएँ से सारा संसार काला हो गया है, तो वह अपने दुःख को सार्वभौमिक (Universal) बना देती है।
धैर्य की संस्कृति: 'हुकअप' और 'पैचअप' के इस दौर में हम प्रतीक्षा का आनंद भूल गए हैं। हमारी संस्कृति सिखाती है कि विरह में 'नस काटना' कायरता है, जबकि विरह की आग में स्वयं को तपाकर 'सोना' बन जाना वीरता है।
पाश्चात्य फेमिनिज्म (Western Feminism) अक्सर स्त्री को अधिकारों और देह की स्वायत्तता के चश्मे से देखता है। वह स्त्री को 'पुरुष के समान' खड़ा करने की लड़ाई लड़ता है। किंतु भारतीय दृष्टिकोण, विशेषकर बारहमासा परंपरा में, स्त्री को 'प्रकृति के समान' विराट बताया गया है।
पाश्चात्य फेमिनिज्म और भारतीय दृष्टिकोण
हमें यह स्वीकार करना होगा कि 'फेमिनिज्म' केवल जींस पहनने या संबंधों को नकारने का नाम नहीं है। असली स्त्री-विमर्श तो महादेवी वर्मा की उन पंक्तियों में है "मैं नीर भरी दुख की बदली।" यहाँ दुःख कमजोरी नहीं, बल्कि एक शक्ति है जो दूसरों को शीतलता प्रदान करती है।
जब नागमती कहती है :
"पिउ सों कहेहु संदेसडा हे भौरा! हे काग!
जो घनि बिरहै जरि मुई तेहिक धुवाँ हम्ह लाग॥"
तो यहाँ वह अपने दुःख को व्यक्तिगत नहीं रहने देती। वह भौंरे और कौए से संवाद करती है। उसका विरह इतना प्रखर है कि उसका धुआं आकाश को काला कर देता है। यह विरह की 'उदात्तता' (Sublimation) है।
पाश्चात्य दृष्टि जहाँ दुःख में 'सेल्फ-डिस्ट्रक्शन' (स्वयं का विनाश) देखती है, भारतीय साहित्य वहाँ 'सेल्फ-रिफाइनमेंट' (स्वयं का परिष्कार) देखता है।
ऋतुओं का क्रूर और कोमल जाल
बारहमासा में हर महीना नारी के हृदय पर एक नया प्रहार करता है, जो वास्तव में उसे और अधिक सशक्त बनाता है:
अगहन और पूस की शीत: आधुनिक दौर में जहाँ सर्दी 'फैशन' और 'पार्टी' का पर्याय है, जायसी की विरहिणी के लिए यह काल साक्षात् यमराज है।
"पूस जाड थर-थर तन काँपा" यहाँ शीत केवल बाहर नहीं है, वह भीतर के एकांत का प्रतीक है। चकवा-चकवी रात को बिछड़कर सुबह मिल जाते हैं, पर मानवी विरहिणी दिन-रात विरह की कोकिला बनी रहती है।
माघ और फागुन की व्याकुलता: माघ की पाला गिराती रातें और फागुन के झकोरे ये सब उसे आत्मदाह की सीमा तक ले जाते हैं। पर ध्यान दें, वह मरना नहीं चाहती, वह कहती है "यह तन जारौं छार कै कहौ कि पवन उडाउ। मकु तेहि मारग उडि पैरों कंत धरैं जहँ पाँउ॥" (मैं राख होकर उस मार्ग पर बिछ जाना चाहती हूँ जहाँ प्रिय के पाँव पड़ें)। यह समर्पण ही भारतीय नारी की वह शक्ति है जिसे पाश्चात्य फेमिनिज्म 'कमजोरी' समझने की भूल करता है।
गोपी विरह: बारहमासा और अंतहीन प्रतीक्षा की अनुभूति
भारतीय बारहमासा परंपरा में जहाँ नागमती का विरह 'गार्हस्थिक' (Domestic) है, वहीं सूरदास की गोपियों का विरह 'आध्यात्मिक और दार्शनिक' ऊँचाइयों को छूता है। गोपियों के लिए कृष्ण केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व का केंद्र हैं। जब कृष्ण ब्रज छोड़कर मथुरा चले जाते हैं, तो ब्रज की प्रकृति जो कभी सुखद थी शत्रु बन जाती है।
ऋतुचक्र और संवेदना का विस्तार
गोपियों के विरह में ऋतुओं का प्रभाव केवल शरीर पर नहीं, बल्कि चेतना पर पड़ता है। 'पूस' की रातें उन्हें शीतलता नहीं देतीं, बल्कि विरह की अग्नि को और भड़काती हैं। सूरदास लिखते हैं "निसिदिन बरसत नैन हमारे, सदा रहति पावस ऋतु हम पर, जब ते स्याम सिधारे।" यहाँ गोपियों ने प्रकृति के नियम को ही उलट दिया है। कृष्ण के अभाव में उनके जीवन में केवल एक ही ऋतु शेष रह गई है 'पावस' (वर्षा), जो आँखों से अविरल बहती है।
गोपी-विरह का बारहमासा यह संदेश देता है कि प्रेम में दूरी (Separation) भी एक उत्सव है, यदि उसमें समर्पण हो। यह विरह 'स्व' को मिटाकर 'सर्व' हो जाने की प्रक्रिया है। जहाँ आज का युवा एक संदेश न मिलने पर आपा खो देता है, वहीं गोपियाँ युगों-युगों की प्रतीक्षा को अपना आभूषण बना लेती हैं। उनका विरह नारी चेतना की उस अजेय शक्ति का प्रतीक है, जो ईश्वर को भी अपनी पीड़ा के वश में कर लेती है।
लोक का प्रभाव: कजरी और चैती
भारतीय संवेदना केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, वह लोकगीतों में भी रची-बसी है। कजरी (मिर्जापुर की वर्षा ऋतु की पुकार) और चैती (चैत्र मास का शास्त्रीय राग) इसी विरह और प्रेम के दो छोर हैं। कजरी जहाँ सावन की झड़ी में राधा-कृष्ण के प्रेम और विरह को सजीव करती है, वहीं चैती 'रामा' के संबोधन के साथ लोक और आध्यात्म को जोड़ देती है। ये गीत बताते हैं कि दुःख को साझा करने के लिए किसी 'थेरेपिस्ट' की नहीं, बल्कि सखियों और प्रकृति की आवश्यकता होती है।
आधुनिक हुकअप कल्चर और साहित्य का संदेश
आज की कॉलेज जाने वाली युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि जिसे वे 'ब्रेकअप' के बाद का अवसाद समझकर अपनी नसें काट रही हैं, वह दरअसल भावनाओं का कच्चापन है। बॉलीवुड के 'दर्द भरे गाने' आपको अपनी पीड़ा में सिमटना सिखाते हैं, जबकि बारहमासा आपको अपनी पीड़ा का विस्तार करना सिखाता है। आज की पीढ़ी, जो प्रेम में 'विकल्प' (Options) तलाशती है, उसे गोपियों के 'उद्धव-प्रसंग' को पढ़ना चाहिए। जब उद्धव उन्हें निर्गुण ब्रह्म और योग का संदेश देते हैं, तो गोपियाँ स्पष्ट कहती हैं "ऊधो, मन न भए दस-बीस।" यह एकनिष्ठता ही वह शक्ति है जो विरह को अवसाद (Depression) बनने से रोकती है। गोपियों का विरह उन्हें कुंठित नहीं करता, बल्कि वे अपनी पीड़ा को 'तर्क' और 'भक्ति' में बदल देती हैं।
निष्कर्ष: साधारणीकरण का हृदयस्पर्शी सत्य
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिस 'साधारणीकरण' की बात की थी, वह बारहमासा में पूर्ण रूप से घटित होता है। जब हम नागमती या उर्मिला का विरह पढ़ते हैं, तो वह केवल उनका निजी विलाप नहीं रह जाता, वह पाठक के अपने हृदय की धड़कन बन जाता है। मोबाइल स्टेटस पर उदासी दिखाना सस्ता है, पर उस उदासी को कविता या कला में बदल देना महानता है। विरह का अर्थ स्वयं को खत्म करना नहीं, बल्कि स्वयं को उस 'प्रिय' (चाहे वह व्यक्ति हो, लक्ष्य हो या ईश्वर) के योग्य बनाना है।
भारतीय संस्कृति और साहित्य से जुड़ना 'पुराना' होना नहीं है, बल्कि 'गहरा' होना है। पाश्चात्य जगत जिस मानसिक शांति की तलाश 'योग' में कर रहा है, वह शांति हमारे साहित्य के करुणा रस में पहले से मौजूद है।
आइए, हम 'हुकअप' की सतही दुनिया से निकलकर 'बारहमासा' की उन गहराईयों में उतरें, जहाँ प्रेम का अर्थ केवल पाना नहीं, बल्कि विरह की अग्नि में तपकर स्वयं को 'पवित्र स्वर्ण' बना लेना है। साहित्य ही वह शीतल छाँव है, जहाँ हर थका हुआ हृदय विश्राम पा सकता है।
संपादकीय टिप्पणी: यह आलेख उन सभी युवाओं के नाम, जो प्रेम में हार को जीवन की हार मान लेते हैं। साहित्य की जड़ों की ओर लौटिए, वहाँ आपको जीने का नया व्याकरण मिलेगा। शोधपरक मीमांसा दृष्टि में भारतीय साहित्य में विरह 'डिप्रेशन' नहीं 'उदात्तता' (Sublimation) है। यह वह अवस्था है जहाँ स्त्री अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को त्यागकर समस्त मानवता के लिए करुणा बन जाती है।
नई पीढ़ी से संवाद
प्रिय बहनें, कॉलेज की छात्राएं मोबाइल की स्क्रीन पर दिखने वाला 'स्टेटस' तुम्हारी हस्ती नहीं है। बॉलीवुड के वे गीत जो तुम्हें आत्मघाती रास्तों पर उकसाते हैं, वे सतही हैं। कभी 'पद्मावत' के नागमती वियोग खंड को पढ़कर देखना, कभी मैथिलीशरण गुप्त की 'साकेत' की उर्मिला को समझना। उर्मिला का विरह लक्ष्मण के वनवास से भी बड़ा है, लेकिन वह रोती नहीं, वह सृजन करती है। वह समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को नहीं भूलती। विरह का अर्थ है स्वयं को और अधिक प्रेम करने योग्य बनाना, न कि स्वयं को मिटाना।
आइए, हम अपनी जड़ों की ओर लौटें। 'मीमांसा' का यह अंक उसी भारतीय मनीषा और नारी चेतना के प्रति एक अर्घ्य है।
वागेश्वरी स्तंभ/ संपादकीय आलेख
अमन कुमार होली
© संपादक
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
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निजी विचार: इस स्तंभ 'वागेश्वरी' में व्यक्त विचार लेखक (अमन कुमार होली) के मौलिक और निजी हैं। इनका उद्देश्य भारतीय साहित्य, दर्शन और लोक-चेतना के माध्यम से वर्तमान सामाजिक विसंगतियों पर विमर्श करना है।
सांस्कृतिक संदर्भ: आलेख में प्रयुक्त साहित्यिक उदाहरण (जैसे नागमती वियोग खंड, साकेत आदि) और पाश्चात्य नारीवाद की तुलना विशुद्ध रूप से अकादमिक और विश्लेषणात्मक है। इसका उद्देश्य किसी विचारधारा, संस्कृति या संप्रदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी को जीवन के प्रति एक सकारात्मक और उदात्त दृष्टिकोण प्रदान करना है।
परामर्श की सीमा: लेख में 'अवसाद' (Depression) के संदर्भ में साहित्यिक समाधान की चर्चा की गई है। यह सामग्री शैक्षिक और वैचारिक मार्गदर्शन हेतु है। इसे किसी चिकित्सकीय उपचार या पेशेवर मनोवैज्ञानिक परामर्श (Clinical Therapy) का विकल्प न माना जाए। गंभीर मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह अनिवार्य है।
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