"कुरुत-कुरुत... ई काशी है गुरु!" काशीज। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादक : अमन कुमार होली

अरे महादेव!
अगर आप सोच रहे हैं कि यह कोई किताबी ज्ञान का भारी-भरकम 'डोज' है, तो मूंछों पर ताव दीजिए और दिमाग की खिड़की खोल लीजिए। हम 'पांडित्य' के उस भारी बोझ को गंगा जी में विसर्जित करके आए हैं, जहाँ शब्द तो बड़े-बड़े थे, पर रूह कहीं गायब थी। हम लेकर आए हैं 'काशीज'।

'काशीज' यानी जो काशी की इसी मिट्टी से जन्मा है। जैसे गंगा की लहरों से उछलती ठंडी फुहार, जैसे सुबह-ए-बनारस की पहली किरण और जैसे अस्सी की अड़ी पर कुल्हड़ से उठती सोंधी खुशबू।
पान, पुड़ी और परसाद का भूगोल

भाईयों, बनारस कोई नक्शा नहीं है कि पन्ने पर उतार लिया। यहाँ तो मोक्ष भी 'मग्घई' के बीड़े में लिपटकर मिलता है। जब तक जीभ पर कत्थे का लाल रंग और इलायची की महक न तैरे, तब तक यहाँ की बात अधूरी है। और वो कचौड़ी-जलेबी? साहब, वो केवल नाश्ता नहीं है, वो बनारसी आदमी का 'पावर-बूस्टर' है।

"काशीज" में हम उन भारी-भरकम पांडुलिपियों की बात नहीं करेंगे जो अलमारियों में धूल फांक रही हैं। हम बात करेंगे उस अक्खड़पन की, जो घाट की सीढ़ियों पर बैठकर सांडों से बतियाता है। हम बात करेंगे उस प्रसाद की, जो बाबा विश्वनाथ की चौखट से लेकर संकटमोचन के बेसन के लड्डू तक में एक जैसा सुकून देता है।

विद्वत्ता का 'विद्यार्थी संस्करण'

लोग कहते हैं काशी पंडितों की है। हम कहते हैं काशी उनकी है जो जिज्ञासु हैं। 'काशीज' उस प्रज्ञा का उत्सव है जो विद्वत्ता के ऊंचे सिंहासन से उतरकर आपके साथ घाट किनारे गप्प लड़ाने आई है। यहाँ कबीर की फटकार भी है और तुलसी का समर्पण भी, पर सब कुछ एकदम 'फ्रेश', एकदम मौलिक।

क्यों पढ़ें 'काशीज'?

क्योंकि यह स्तंभ आपको बनारस घुमाएगा नहीं, आपको 'बनारस' बना देगा। यहाँ 'काशीज प्रज्ञा' में विचार होंगे, पर बोझिल नहीं। 'काशीज किस्सा' में गलियों की वो गूँज होगी जो इतिहास की किताबों में दर्ज होना भूल गई और 'काशीज विरासत' में उन मनीषियों का ज़िक्र होगा जिनकी विद्वत्ता हिमालय जैसी थी, पर मिज़ाज एकदम फकीराना।

तो तैयार हो जाइए! अपनी 'मीमांसा' का यह पन्ना खोलते ही आपको अस्सी की सुबह और मणिकर्णिका की वैराग्य-ज्वाला का एक साथ अहसास होगा। यह लेखनी नहीं है, यह बनारस की गलियों में आपकी 'मानसिक पदयात्रा' है।

बोलिए... नमः पार्वती पतये हर-हर महादेव!

स्तंभ : काशीज (Kashiz)
अमन कुमार होली 
© संपादक 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

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यह स्तंभ न तो अकादमिक शोध-पत्र होने का दावा करता है और न ही शास्त्रीय निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। यहाँ प्रस्तुत कथ्य काशी की लोक-संस्कृति, जीवन-बोध, मिथक, स्मृति और समकालीन अनुभवों का साहित्यिक पुनर्पाठ हैं। यह स्तंभ काशी की लोक-प्रज्ञा, सांस्कृतिक स्मृति और जीवंत साहित्यिक परंपरा को समर्पित है।

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