शब्दों के अजेय साधक: रांगेय राघव का कालजयी संसार। जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख
साहित्य जब केवल शब्दों का जाल न रहकर 'मनुष्यता की पुकार' बन जाता है, तब रांगेय राघव जैसे रचनाकार का जन्म होता है। आगरा की गलियों से लेकर तिरुपति की सांस्कृतिक जड़ों तक फैला उनका व्यक्तित्व, हिंदी साहित्य के आकाश में उस धूमकेतु की भांति है, जिसने अपनी अल्पायु में ही अपनी मेधा से युगों को आलोकित कर दिया।
रांगेय राघव केवल एक लेखक नहीं थे, बल्कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा के उस आधुनिक सेतु थे, जिन्होंने एक ओर सनातन ऋषियों-मुनियों की 'मौलिक प्रज्ञा' को समझा, तो दूसरी ओर समकालीन समाज के 'विषाद मठों' को भी निर्भीकता से उकेरा। आज जब हम 'मीमांसा' के इस विशेषांक के माध्यम से उनकी स्मृति को नमन कर रहे हैं, तो हमारा ध्येय केवल उनके कृतित्व का गान करना नहीं, बल्कि उस 'साहित्यिक शुचिता' को पुनर्जीवित करना है, जिसके वे प्रबल पक्षधर थे।
उनका साहित्य समावेशी भाव का जीवंत दस्तावेज़ है, जहाँ 'मुरदों का टीला' जैसी ऐतिहासिक दृष्टि है, तो 'तूफ़ानों के बीच' जैसा अकाल की विभीषिका का कारुणिक रिपोर्ताज भी। इस अंक में हम उनकी उसी विलक्षण प्रज्ञा और नये विमर्शों की पड़ताल करेंगे।
रांगेय राघव: एक संक्षिप्त परिचय
रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी, 1923 को आगरा में हुआ था। वे बहुत कम आयु (39 वर्ष) तक जीवित रहे, लेकिन इतनी छोटी अवधि में उन्होंने जितना साहित्य रचा, वह किसी विस्मय से कम नहीं है।
व्यक्तिगत पृष्ठभूमि
मूल नाम: तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य।
जन्म: 17 जनवरी, 1923 (आगरा)।
निधन: 12 सितंबर, 1962 (कैंसर के कारण)।
मूल स्थान: उनका परिवार मूलतः तिरुपति (आंध्र प्रदेश) का रहने वाला था, लेकिन उन्होंने हिंदी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
साहित्यिक योगदान एवं विशेषताएं
रांगेय राघव को हिंदी साहित्य में उनकी बहुमुखी प्रतिभा के लिए जाना जाता है। वे एक साथ उपन्यासकार, कहानीकार, आलोचक, नाटककार और कवि थे।
मार्क्सवादी दृष्टि: वे प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित थे, लेकिन वे किसी 'वाद' की कट्टरता में नहीं बँधे। उनके लिए 'मनुष्य की पीड़ा' सर्वोपरि थी।
तेज लेखन: उनके बारे में कहा जाता था कि वे जितनी देर में कोई पुस्तक पढ़ता था, उतनी देर में वे उसे लिख देते थे।
ऐतिहासिक जीवनीपरक उपन्यास: उन्होंने महापुरुषों के जीवन पर आधारित उपन्यासों की एक लंबी श्रृंखला रची (जैसे- देवकी का बेटा, लोई का ताना, रत्ना की बात)।
वैचारिक संवाद: उन्होंने प्रसिद्ध कृतियों के 'उत्तर' में अपनी कृतियां लिखीं, जैसे भगवतीचरण वर्मा के 'टेढ़े-मेढ़े रास्ते' के जवाब में 'सीधा-सादा रास्ता'।
प्रमुख कृतियाँ
| विधा | प्रमुख रचनाएँ |
| उपन्यास | कब तक पुकारूँ, घरौंदा, मुरदों का टीला, विषाद मठ, चीवर, आख़िरी आवाज़। |
| कहानी संग्रह | गदल, पंच परमेश्वर, देवदासी, इंसान पैदा हुआ। |
| रिपोर्ताज | तूफ़ानों के बीच (अकाल पर आधारित अत्यंत प्रभावशाली रचना)। |
| आलोचना | प्रगतिशील साहित्य के मानदंड, संगम और संघर्ष। |
| काव्य | अजेय, पिघलते पत्थर, राह के दीपक। |
प्रमुख सम्मान
हिन्दुस्तान अकादमी पुरस्कार (1951)
राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961)
मरणोपरांत महात्मा गांधी पुरस्कार (1966)
निष्कर्ष: परंपरा का नूतन विमर्श
रांगेय राघव का अवसान महज 39 वर्ष की आयु में हो गया, किंतु उन्होंने जो शब्द-संपदा छोड़ी, वह सहस्रों वर्षों के अनुभव का निचोड़ जान पड़ती है। उन्होंने सिद्ध किया कि प्रगतिशीलता का अर्थ अपनी जड़ों से कटना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों (सनातन परंपरा) की ऊर्जा से भविष्य का मार्ग प्रशस्त करना है।
आज के इस संक्रमण काल में, जहाँ विमर्शों में कट्टरता और संकीर्णता बढ़ रही है, रांगेय राघव की 'सीधा-सादा रास्ता' वाली दृष्टि हमें संतुलन सिखाती है। उनका लेखन हमें प्रेरणा देता है कि हम अपनी मौलिक प्रज्ञा को विस्मृत न करें और ज्ञान की उस ऋषिवत परंपरा को आधुनिक संदर्भों में ढालकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाएँ। 'मीमांसा' का यह विशेषांक उनके इसी समावेशी और मानवीय पक्ष को समर्पित है। उनके शब्दों में कहें तो साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, वह तो अजेय मनुष्य की विजयगाथा है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
उद्देश्य: 'मीमांसा' वेब पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित सामग्री (लेख, विश्लेषण और जीवन परिचय) का मुख्य उद्देश्य साहित्यकार रांगेय राघव के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शैक्षिक एवं सूचनात्मक प्रकाश डालना है।
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