टॉप-जींस एवं साड़ी : स्त्री पहनावे में सांस्कृतिक बदलाव का एक दृष्टिकोण। वागेश्वरी। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। स्तंभ। ऑंचल कुमारी।

वस्त्र केवल धागों का ताना-बना नहीं होते, वे समय के कैनवास पर खिंची हुई वे लकीरें हैं जो किसी समाज की सभ्यता, उसकी सोच और उसके बदलाव की कहानी बयां करती हैं। जब हम भारतीय स्त्री के संदर्भ में 'पहनावे' की चर्चा करते हैं, तो यह विमर्श केवल फैशन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह परंपरा, आधुनिकता, पितृसत्ता और वैश्विक पहचान के चौराहों पर खड़ा नजर आता है। आज के दौर में साड़ी के पल्लू से निकलकर जींस की जेबों तक का सफर, भारतीय नारी के मानसिक और सामाजिक रूपांतरण का जीवंत दस्तावेज है।

परंपरा की विरासत और साड़ी का संदूक

सदियों से भारतीय नारीत्व की परिभाषा साड़ी की परतों में लिपटी रही है। ऋग्वेद के 'सुवस्त्रा' संदर्भो से लेकर अजंता-एलोरा की मूर्तियों तक, भारतीय परिधान हमेशा से ही यहाँ की जलवायु और संस्कृति के पूरक रहे। साड़ी महज एक वस्त्र नहीं, बल्कि एक गरिमा थी, जिसने क्षेत्र-दर-क्षेत्र अपनी बुनावट बदली कहीं वह बंगाल की 'तांत' बनी तो कहीं दक्षिण की 'कांजीवरम'। लेकिन समय के साथ, जब स्त्री की भूमिका घर की चौखट लांघकर दफ्तरों, कारखानों और अंतरिक्ष तक पहुँची, तो परिधानों की सहजता (Comfort) और उपयोगिता (Functionality) पर सवाल उठने लाजिमी थे।

जींस का आगमन: विद्रोह या विकास?

जींस, जिसका जन्म अमेरिकी खदानों में एक मजबूत कार्य-वस्त्र के रूप में हुआ था, भारत आते-आते 'विद्रोही आधुनिकता' का प्रतीक बन गया। 70 और 80 के दशक में जब फिल्मों के माध्यम से जींस ने भारतीय समाज में दस्तक दी, तो इसे 'पश्चिमी सभ्यता का आक्रमण' माना गया। मध्यमवर्गीय परिवारों में जींस पहनना एक तरह की 'सांस्कृतिक बगावत' समझी जाती थी। समाज का एक बड़ा वर्ग यह तर्क देता था कि जींस और टॉप भारतीय स्त्री की कोमलता और मर्यादा के विरुद्ध हैं।
किंतु, 90 के दशक के उदारीकरण ने इस सोच की दीवारें ढहा दीं। जब वैश्विक ब्रांड भारतीय बाजारों में आए और सूचना क्रांति (IT Revolution) ने युवतियों के लिए नौकरियों के द्वार खोले, तब जींस-टॉप केवल एक 'स्टाइल स्टेटमेंट' नहीं, बल्कि 'जरूरत' बन गया।
साथ में बालीवुड विज्ञापन और ब्रांड एवं बजट स्टेटस ने भी पहनावे और चुनाव को लेकर लोगों का दृष्टिकोण बदला। 

सांस्कृतिक संश्लेषण: 'इंडो-वेस्टर्न' का उदय

भारतीय संस्कृति की खूबसूरती उसकी 'समावेशिता' में है। हमने विदेशी पहनावे को पूरी तरह अपनाने के बजाय, उसे अपनी शर्तों पर ढाला। यहीं से जन्म हुआ 'इंडो-वेस्टर्न' संस्कृति का। आज जींस के ऊपर लंबा कुर्ता पहनना या टॉप के साथ एथनिक जैकेट का प्रयोग करना यह दर्शाता है कि भारतीय स्त्री अपनी जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक होना जानती है। यह बदलाव एक संतुलन है जहाँ एक तरफ जींस की मजबूती और भाग-दौड़ के लिए उसकी उपयुक्तता है, वहीं दूसरी तरफ कुर्ते या टॉप की भारतीय नक्काशी और रंग हमारी विरासत को जीवित रखते हैं।

पितृसत्तात्मक नजरिया और विरोधाभास

यह विडंबना ही है कि हमारे समाज में अक्सर स्त्री के चरित्र का पैमाना उसके पहनावे को बनाया गया। एक तरफ साड़ी, जो पेट और कमर के हिस्से को अनावृत रखती है, उसे 'संस्कारी' माना गया, वहीं पूरी तरह से ढकी हुई जींस और टी-शर्ट को 'अमर्यादित' और 'उत्तेजक' करार दिया गया। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि आपत्ति कपड़ों से नहीं, बल्कि उस 'आत्मविश्वास' और 'आजादी' से थी जो जींस पहनने वाली लड़की के हाव-भाव में झलकती थी। जींस पहनना इस बात का ऐलान था कि स्त्री अब केवल 'देखने की वस्तु' नहीं, बल्कि 'काम करने वाली शक्ति' (Workforce) है।

डिजिटल युग और ग्रामीण परिदृश्य

आज इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ई-कॉमर्स की लहर ने शहरी और ग्रामीण पहनावे के अंतर को लगभग समाप्त कर दिया है। सुदूर गाँवों की लड़कियाँ भी आज जींस-टॉप में उतनी ही सहज हैं जितनी महानगरों की स्त्रियाँ। यह बदलाव केवल बाहरी नहीं है; यह इस बात का प्रतीक है कि सूचना के अधिकार और फैशन की सुलभता ने स्त्री को अपने 'चुनाव' (Choice) का हक दिया है। अब वह तय करती है कि उसे खेत में काम करते समय क्या पहनना है और कॉलेज जाते समय क्या।

निष्कर्ष: पहचान का नया आकाश

अंततः, वस्त्र मनुष्य की निजता का हिस्सा हैं। 'टॉप-जींस' का बढ़ता चलन किसी संस्कृति का पतन नहीं, बल्कि उसके विस्तार का प्रतीक है। आज की भारतीय स्त्री 'मल्टी-टास्कर' है। वह साड़ी में 'लज्जा' भी है और जींस में 'रफ़्तार' भी। वह पूजा की थाली भी पकड़ती है और लैपटॉप का की-बोर्ड भी।
सांस्कृतिक बदलाव एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। हमें यह समझना होगा कि संस्कृति कपड़ों की सिलाई में नहीं, बल्कि विचारों की गहराई में बसती है। विदेशी पहनावे और भारतीय आत्मा का यह संगम एक नई, सशक्त और स्वतंत्र नारी की छवि गढ़ रहा है, जो अपनी पसंद के आकाश में उड़ना जानती है।

लेखिका परिचय

ऑंचल कुमारी भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून एवं 'नमामि गंगे' बर्ड गाइड (वॉटर वारियर)।
यह आलेख विशेष रूप से वेब पत्रिका 'मीमांसा' के स्त्री विशेषांक 'वागेश्वरी' स्तंभ हेतु तैयार किया गया है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखिका के निजी विचार हैं। संस्थान या पत्रिका का इनसे पूर्णतः सहमत होना अनिवार्य नहीं है। लेख में ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों का उपयोग विषय की स्पष्टता के लिए किया गया है।

कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा चेतावनी नीति

प्रतिबंध: इस आलेख का कोई भी अंश, विचार या चित्र लेखिका अथवा 'मीमांसा' पत्रिका की लिखित अनुमति के बिना पुनरुत्पादित (Reproduce), संकलित, या किसी अन्य डिजिटल/प्रिंट प्लेटफॉर्म पर साझा नहीं किया जा सकता।

उल्लंघन: साहित्यिक चोरी (Plagiarism) या अनधिकृत उपयोग की स्थिति में 'बौद्धिक संपदा अधिकार' (Intellectual Property Rights) और 'कॉपीराइट अधिनियम, 1957' के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

संदर्भ: शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु उद्धरण देते समय लेखिका और मूल स्रोत ('मीमांसा' पत्रिका) का उल्लेख करना अनिवार्य है।

आधिकारिक फूटर
स्त्री विमर्श एवं सांस्कृतिक शोध हेतु समर्पित | वेब पत्रिका 'मीमांसा' | वागेश्वरी स्तंभ - जनवरी 2026

© 2026, वेब पत्रिका 'मीमांसा'। सर्वाधिकार सुरक्षित 

Comments

Popular posts from this blog

भारतीय साहित्यों में नायिका भेद और वर्तमान नारी अस्मिता - वेब पत्रिका 'मीमांसा' का वागेश्वरी स्तंभ विशेषांक।

व्यवस्था की विसंगतियों का दरबारी चितेरा : श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी की शाश्वत गूँज

संपादकीय : साहित्यिक शुचिता की मीमांसा और 'दिनकर' के नाम पर "ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं" के छद्म प्रसार का सत्य