राष्ट्र-निर्माण की धुरी और भारतीय मेधा व प्रज्ञा की प्रदिप्त ज्योति भारतीय नारी शक्ति। वागेश्वरी स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख। अमन कुमार होली
सृष्टि के आदि काल से ही भारतीय मेधा ने 'शक्ति' को केवल देह नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना का आधार माना है। आज जब 21वीं सदी का भारत वैश्विक क्षितिज पर अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ उठ खड़ा होने को आतुर है, तब 'राष्ट्र हित' का प्रश्न अनिवार्य रूप से हमारी युवतियों की भूमिका और उनकी वैचारिक दिशा से जाकर जुड़ता है। यह आलेख केवल वर्तमान समय की माँग का विश्लेषण नहीं है, बल्कि यह उस सनातन प्रज्ञा की पुनर्खोज है जो गार्गी और मैत्रेयी के शास्त्रार्थ से लेकर आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों तक अनवरत प्रवाहित है।
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ सूचनाओं का अंबार है, परंतु 'विवेक' की खोज कठिन होती जा रही है। पाश्चात्य दृष्टि से उपजे 'वाद' और 'विमर्श' अक्सर हमें अपनी जड़ों से काटकर एक कृत्रिम पहचान की ओर ले जाते हैं। ऐसे में 'मीमांसा' की यह वैचारिकी 'वागेश्वरी' स्तंभ के माध्यम से यह प्रतिपादित करने का प्रयास है कि युवतियों की भूमिका केवल आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल होना नहीं, बल्कि उस 'अर्धनारीश्वर' भाव को जागृत करना है जहाँ पुरुष और स्त्री संघर्ष में नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण के पावन यज्ञ में एक-दूसरे के पूरक हैं।
प्रस्तुत आलेख भारतीय अस्मिता की उर्वर भूमि पर आयातित विचारधाराओं के 'रासायनिक यूरिया' के प्रभाव को रेखांकित करते हुए, मौलिक चिंतन और नैसर्गिक मर्यादा के साथ भविष्य की एक ऐसी दृष्टि साझा करता है, जो 'शक्ति' के आह्वान पर आधारित है सहानुभूति पर नहीं।
आइए, इस वैचारिक यात्रा के माध्यम से हम समझने का प्रयास करें कि कैसे एक युवती की मेधा राष्ट्र के 'साधारणीकृत' भाव को स्पर्श कर उसे विश्वगुरु की आसंदी तक पहुँचाने का सामर्थ्य रखती है।
राष्ट्र निर्माण की अक्षय ऊर्जा: वर्तमान युवतियों का उत्तरदायित्व और भविष्य-दृष्टि
भारतीय मनीषा में नारी केवल एक इकाई नहीं, बल्कि वह 'शक्ति' का साक्षात् विग्रह है। जब हम 'मीमांसा' की वैचारिकी और ऋषियों की ज्ञान-परंपरा की बात करते हैं, तो हमें यह स्मरण करना होगा कि हमारे वेदों ने जिस 'वाक्' की स्तुति की, वह स्त्री शक्ति का ही बौद्धिक स्वरूप है। आज के संक्रमण काल में, जहाँ वैश्विक विमर्श और सांस्कृतिक द्वंद्व आमने-सामने हैं, वहाँ भारतीय युवतियों की भूमिका केवल भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह 'राष्ट्र के आत्म' (National Soul) को पुनर्जीवित करने वाली होनी चाहिए।
सनातन प्रज्ञा और मेधा का आधुनिक विनियोग
ऋषि-परंपरा में गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों ने जिस 'मेधा' का परिचय दिया, वह केवल किताबी ज्ञान नहीं था; वह 'ऋत' (Universal Order) को समझने की क्षमता थी। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, युवतियों को इसी मेधा का परिचय देना होगा।
बौद्धिक नेतृत्व: आज की युवती को केवल सूचनाओं का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजक बनना है। हमारी ज्ञान-परंपरा 'सा विद्या या विमुक्तये' की बात करती है। राष्ट्र हित में यह आवश्यक है कि आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ युवतियों में अपने मूल संस्कारों और दर्शन के प्रति एक तार्किक गौरव हो।
सांस्कृतिक शुचिता: बाजारीकरण के इस युग में जहाँ स्त्री को प्रायः एक उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने का वैश्विक प्रयास होता है, वहाँ भारतीय युवती को अपनी 'शुचिता' और 'गरिमा' के साथ इस विमर्श को पलटना होगा। यह शुचिता रूढ़िवादिता नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान का वह कवच है जो उसे पथभ्रष्ट होने से बचाता है।
अर्धनारीश्वर: समावेशी अद्वैत बनाम आयातित विखंडन
भारतीय वाङ्मय की सबसे सुंदर परिकल्पना 'अर्धनारीश्वर' है। यह मात्र एक प्रतिमा नहीं, बल्कि हमारे समूचे अस्तित्व का दर्शन है। हमारी संस्कृति कभी भी 'एकल नारी विमर्श' या 'एकल पुरुष विमर्श' की संकुचित गलियों में नहीं भटकी। हमारे यहाँ विमर्श का आधार संघर्ष नहीं, बल्कि सामंजस्य और पूरकता रहा है। आज जब हम राष्ट्र हित की बात करते हैं, तो हमें यह स्वीकारना होगा कि राष्ट्र रूपी रथ के ये दोनों पहिए जब तक एक लय में नहीं चलेंगे, तब तक प्रगति की गति बाधित रहेगी।
दुर्भाग्यवश, आधुनिकता की अंधी दौड़ और पाश्चात्य विचारकों की बिना सोचे-समझे की गई अनुकृति ने हमें दो परस्पर विरोधी धड़ों में बाँट दिया है। जिसे हम आज 'स्त्री विमर्श' कहते हैं, वह अक्सर पाश्चात्य 'लिबरल फेमिनिज्म' का चश्मा पहनकर देखा जाता है, जो पुरुष को शत्रु और स्त्री को पीड़ित के रूप में स्थापित करता है। यह चिंतन भारतीय संस्कृति की उस पावन और उर्वर बीज-भूमि में आयातित रासायनिक यूरिया डालने के समान है, जो तात्कालिक लाभ या उभार तो दिखा सकता है, किंतु अंततः हमारी नैसर्गिक और मौलिक वैचारिक भूमि को बंजर बना रहा है।
हमने सहानुभूति के विदेशी खाद से अपनी जड़ों को सींचना शुरू कर दिया, जबकि हमारी परंपरा नारी को 'सहानुभूति' (Empathy) की पात्र नहीं, बल्कि 'शक्ति' (Power) के जीवंत आह्वान के रूप में देखती थी। हमने 'पितृसत्तात्मक' और 'मातृसत्तात्मक' जैसे शब्दों के कृत्रिम विभाजन को अपनाकर अपने ही समाज के जैविक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर लिया है। यह विभाजन अतार्किक तो है ही, साथ ही यह हमारे उस नैसर्गिक चिंतन का गला घोंटने जैसा है जो मानता है कि पुरुष की मेधा और स्त्री की प्रज्ञा मिलकर ही पूर्णता को प्राप्त होती हैं।
'मीमांसा' की वैचारिकी का ध्येय इसी भटकाव को रोकना है। हमें पुनः उस मूल विचार की ओर लौटना होगा जहाँ नारी केवल अधिकार माँगने वाली इकाई नहीं, बल्कि वह तत्व है जिसके बिना सृष्टि अधूरी है। वर्तमान युवतियों को यह समझना होगा कि उन्हें किसी पुरुष के विरुद्ध खड़ा होकर 'जीत' हासिल नहीं करनी है, बल्कि पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उस 'सांस्कृतिक पारिस्थितिकी' को पुनः जीवित करना है जहाँ परस्पर सम्मान और उत्तरदायित्व प्राथमिक थे।
जब तक हम इस आयातित वैचारिक प्रदूषण से मुक्त नहीं होंगे, तब तक हमारा राष्ट्र-निर्माण का स्वप्न अपनी मौलिक सुगंध नहीं पा सकेगा। भविष्य की दृष्टि यही है हम पुरुष और नारी के अस्तित्व को अलग-अलग द्वीपों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही चेतना के दो प्रवाहों के रूप में देखें। यही 'वागेश्वरी' का सच्चा अर्चन है और यही 'अर्धनारीश्वर' के सिद्धांत की आधुनिक प्रासंगिकता है।
आयातित 'इज़्म' (Ism) बनाम भारतीय मातृत्व: एक मौलिक विमर्श
वर्तमान अकादमिक जगत में एक विचित्र होड़ मची है भारतीय संस्कृति और स्त्री-शक्ति की विराट अस्मिता को पाश्चात्य 'वादों' (Isms) और विमर्शों के संकुचित फार्मूलों में फिट करने की। यह प्रयास न केवल हमारी मौलिक प्रज्ञा पर कुठाराघात है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक गंभीर मानसिक और भावनात्मक अन्याय भी है। जब हम अपनी जीवंत परंपराओं को विदेशी चश्मे से देखते हैं, तो हम अनजाने में अपनी ही शक्ति के स्रोत को प्रदूषित कर देते हैं।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि 'भारतीय मातृत्व' (Indian Motherhood) केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक संपूर्ण दर्शन है, जो पाश्चात्य 'फेमिनिज्म' (Feminism) के एक सशक्त और मौलिक विकल्प के रूप में खड़ा है। जहाँ पाश्चात्य विमर्श अक्सर 'स्व' (Self) और 'अधिकार' (Rights) के इर्द-गिर्द घूमता है, वहीं भारतीय चिंतन 'त्याग', 'सृजन' और 'सामूहिकता' की बात करता है। संभव है कि वर्तमान में पाश्चात्य विमर्श से वैचारिक गलबाही कर रहे तथाकथित 'कागजी बुद्धिजीवी' और महिला अधिकार कार्यकर्ता इस बात से असहमत हों, किंतु सत्य यही है कि आयातित विचार हमारी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं दे सकते।
इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि हम शेष विश्व के प्रति अनुदार हैं। भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव ही 'आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वतः' (हमें सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार प्राप्त हों) का है। हम समावेशी भाव और वैचारिक भिन्नता को विमर्श का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। सामाजिक उन्नति और सार्वभौमिक मानवता के हित में हमारी संस्कृति खुले मन से अन्य विचारों का स्वागत करती है। पाश्चात्य दृष्टिकोण में भी कुछ ऐसे पक्ष हो सकते हैं जो तर्कसंगत हों, और हम उनका तिरस्कार नहीं करते।
परंतु, यह स्वागत एक शर्त पर है वे विचार हमारी भारतीय मूल्यों, मर्यादा और मौलिक चिंतन धारा के प्रवाह को अवरुद्ध न करते हों। हमें ऐसी 'यूरियाई' बौद्धिकता से बचना होगा जो मिट्टी की स्वाभाविक उर्वरता को नष्ट कर उसे बाहरी रसायनों पर निर्भर बना देती है। युवतियों को 'शक्ति' के रूप में आह्वान करने का अर्थ है उन्हें यह बोध कराना कि वे किसी आयातित परिभाषा की मोहताज नहीं हैं। उनकी अस्मिता उस सनातन परंपरा में निहित है जो मर्यादा के भीतर आकाश छूने का सामर्थ्य रखती है।
अतः, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता इसी में है कि हम अपनी 'मेधा' को विदेशी बौद्धिक गुलामी से मुक्त करें और एक ऐसे भविष्य की नींव रखें जहाँ स्त्री-शक्ति का उत्कर्ष उसकी अपनी जड़ों से प्राप्त रस से हो, न कि किसी उधार लिए गए 'वाद' से।
समावेशी भाव और राष्ट्रवाद
राष्ट्र निर्माण में समावेशी भाव का अर्थ है समाज के अंतिम छोर पर खड़ी संवेदना को समझना। युवतियों की भूमिका इस दिशा में क्रांतिकारी हो सकती है:
समरसता का सेतु: परिवार और समाज को जोड़ने का कार्य सदैव स्त्रियों ने किया है। युवतियों को जाति, पंथ और क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर एक 'अखंड भारत' की चेतना को अपनी जीवनशैली में उतारना होगा।
अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता: राष्ट्र हित तब तक संभव नहीं जब तक आर्थिक स्वावलंबन न हो। स्टार्टअप्स से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक, और कुटीर उद्योगों से लेकर कॉर्पोरेट जगत तक, युवतियों की मेधा भारत को 'विश्वगुरु' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा निवेश है।
वर्तमान चुनौतियां और भविष्य दृष्टि
वर्तमान समय में तकनीक और सूचना के विस्फोट ने भटकाव के अनेक द्वार खोले हैं। यहाँ 'वागेश्वरी' की कृपा और विवेक की परम आवश्यकता है।
डिजिटल राष्ट्रवाद: सोशल मीडिया के इस युग में युवतियों को 'सांस्कृतिक योद्धा' की भूमिका निभानी होगी। फेक नैरेटिव्स (भ्रामक विमर्श) को तर्कपूर्ण ढंग से काटकर सत्य की स्थापना करना राष्ट्र सेवा का ही एक रूप है।
पारिस्थितिक और आध्यात्मिक संतुलन: सनातन परंपरा ने प्रकृति को 'माता' माना है। भविष्य की दृष्टि यह होनी चाहिए कि विकास की अंधी दौड़ में हम अपनी जड़ों को न भूलें। युवतियां अपने सहज मृदुल स्वभाव और धैर्य के माध्यम से समाज में एक 'इकोलॉजिकल बैलेंस' और मानसिक शांति की स्थापना कर सकती हैं।
साधारणीकृत भाव: एक हृदयस्पर्शी निष्कर्ष
जब एक युवती शिक्षित और संस्कारित होती है, तो वह केवल एक परिवार का भविष्य नहीं संवारती, बल्कि वह कुल, परिवार, समाज, संस्कृति व देश के कालचक्र को मोड़ने का सामर्थ्य रखती है। राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा यदि सैनिक करते हैं, तो राष्ट्र की 'चेतना' की रक्षा उसकी बेटियाँ करती हैं। आज काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की मौलिक ज्ञान परंपरा में दीक्षित प्रो. डॉ. श्वेता मिश्रा जी का यह आह्वान केवल एक आलेख लिखने का आग्रह नहीं है, बल्कि यह एक पीढ़ी को उसकी सोई हुई शक्तियों के प्रति जगाने का शंखनाद है।
निश्चित रूप में मैं यह गर्व से कह सकता हूॅं कि 'मीमांसा' के माध्यम से प्रेषित यह विचार जब पाठकों, हमारी बहनों, माताओं और समस्त देश के स्कूलों, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रही छात्राओं तथा सहृदय साहित्यिक सत्संगियों के हृदय में उतरेगा, तो वह निश्चित ही एक ऐसी ऊर्जा में परिवर्तित होगा जो भविष्य के भारत को अधिक सशक्त, अधिक मानवीय और अधिक सनातन बनाएगा, तब हमारी संस्कृति की वह ब्रह्म वाणी "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक उन्नत राष्ट्र का मेनिफेस्टो (घोषणापत्र) बन जाएगा।
जयतु वागेश्वरी, जयतु साहित्यं
वागेश्वरी स्तंभ/ संपादकीय आलेख
अमन कुमार होली
© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
प्रस्तुत आलख काशी हिंदू विश्वविद्यालय से संबद्ध डीएवी पीजी कॉलेज की हिंदी विभाग की प्रो डाॅ॰ श्वेता मिश्रा के आह्वान पर संपादकीय आलेख के रूप में वागेश्वरी स्तंभ हेतु तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी और मौलिक शोध-चिंतन पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी विचारधारा, संप्रदाय या वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्र-हित के संदर्भ में एक स्वस्थ अकादमिक और वैचारिक विमर्श को प्रोत्साहन देना है। आलेख में प्रयुक्त उदाहरण और तुलनाएं (जैसे 'रासायनिक यूरिया' और 'आयातित वाद') प्रतीकात्मक हैं, जिन्हें वैचारिक गंभीरता के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जाना चाहिए। हम समावेशी तर्क और वैचारिक भिन्नता का स्वागत करते हैं बशर्ते वह चरमपंथी मानसिकता और मानसिक कड़वाहट की दायरे में ना आती हो।
हम साहित्यिक शुचिता समावेशी भाव और सनातन विमर्श के प्रति प्रतिबद्धता की उद्घोषणा करते हैं।
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