वेब पत्रिका 'मीमांसा विमर्श-स्तंभ : विकलांगता और कलंक का एक प्रतीकात्मक अंतःक्रियावादी विश्लेषण


प्रस्तुत शोध पत्र विकलांगता को केवल एक शारीरिक स्थिति के रूप में नहीं, बल्कि समाज द्वारा निर्मित एक 'कलंक' (Stigma) के रूप में विश्लेषित करता है। जिसे वेब पत्रिका 'मीमांसा' के विमर्श स्तंभ के अंतर्गत जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की एम.ए. समाज शास्त्र छात्रा रोशनी कुमारी ने  प्रस्तुत किया है। इरविंग गोफमैन के प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद को आधार बनाकर, यह लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे समाज 'सामान्य' की संकीर्ण परिभाषाओं के माध्यम से विकलांग व्यक्तियों की पहचान को सीमित कर देता है।
यह विमर्श भारतीय सांस्कृतिक मिथकों को चुनौती देते हुए विकलांगता के 'सामाजिक मॉडल' की वकालत करता है, जहाँ बाधा शरीर में नहीं बल्कि समाज के नजरिए और ढांचे में है। लेख का उद्देश्य एक ऐसी समावेशी दृष्टि विकसित करना है जहाँ शारीरिक भिन्नता 'कलंक' नहीं, बल्कि मानवीय विविधता का हिस्सा बने।

भूमिका :

मानव स्वभाव की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सामाजिक अंतःक्रिया (Social Interaction) है। समाजशास्त्र के भीतर प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद (Symbolic Interactionism) एक ऐसा सूक्ष्म-परिप्रेक्ष्य है जो यह बताता है कि हम अपने आसपास की दुनिया और स्वयं को उन अर्थों और प्रतीकों के माध्यम से समझते हैं जो समाज द्वारा साझा किए जाते हैं।

इरविंग गोफमैन ने अपने प्रसिद्ध कार्य 'Stigma: Notes on the Management of Spoiled Identity' में यह स्पष्ट किया है कि 'कलंक' (Stigma) किसी व्यक्ति का अपना गुण नहीं है, बल्कि यह समाज द्वारा दी गई एक नकारात्मक परिभाषा है। जब किसी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति (जैसे विकलांगता) समाज के 'सामान्य' मानकों से मेल नहीं खाती, तो उसकी पहचान को 'कलंकित' या 'खराब' (Spoiled Identity) मान लिया जाता है।

आज के समय में विकलांगता को समझना क्यों जरूरी है?

आज के आधुनिक और विकासशील समाज में विकलांगता पर चर्चा करना केवल एक अकादमिक विषय नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का मुद्दा है। इसके निम्नलिखित कारण हैं:

वर्चुअल बनाम वास्तविक पहचान का अंतर :

अक्सर समाज विकलांग व्यक्तियों (PwDs) को उनकी क्षमताओं (Actual Identity) के बजाय उनकी विकलांगता (Virtual Identity) के चश्मे से देखता है। उदाहरण के लिए, एक दृष्टिबाधित व्यक्ति को उसकी बौद्धिक क्षमता के बजाय 'बेचारा' या 'आश्रित' मान लिया जाता है। इस रूढ़िवादिता को तोड़ना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) :

यदि हम एक समावेशी समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि विकलांगता शरीर में नहीं, बल्कि समाज की बाधाओं (जैसे- रैंप की कमी, भेदभावपूर्ण रवैया) में होती है।

आर्थिक और संरचनात्मक न्याय : 

आँकड़े बताते हैं कि कार्यस्थलों पर विकलांग व्यक्तियों को अक्सर कम वेतन और कम अवसर मिलते हैं। उन्हें "अनुत्पादक श्रम" मान लिया जाता है। इस मानसिकता को बदलकर ही हम उन्हें मुख्यधारा में ला सकते हैं।

इस विषय पर बात करना क्यों आवश्यक है?

विकलांगता पर बातचीत करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह हमारी संस्कृति और भाषा में गहराई तक बसे पूर्वाग्रहों को उजागर करता है:

सांस्कृतिक मिथकों का खंडन : 
भारतीय संदर्भ में, अक्सर विकलांगता को 'कर्मों के फल' या 'पाप' से जोड़कर देखा जाता है (जैसे महाभारत के धृतराष्ट्र या शकुनि के उदाहरण)। इन धार्मिक और सांस्कृतिक मिथकों पर तर्कसंगत चर्चा करना जरूरी है ताकि विकलांगता से जुड़े 'कलंक' को मिटाया जा सके।

अपनों (The Own) और 'समझदारों' (The Wise) की भूमिका : 

गोफमैन के अनुसार, विकलांग व्यक्तियों को ऐसे समूहों की जरूरत होती है जहाँ वे बिना किसी निर्णय (Judgment) के जी सकें। समाज में 'समझदार' (Allies) लोगों की संख्या बढ़ाना जरूरी है जो विकलांगता को एक 'कमी' के बजाय एक 'भिन्नता' (Diversity) के रूप में देखें।

नीति निर्धारण और सक्रियता : 

अनीता घई जैसे कार्यकर्ताओं का तर्क है कि विकलांगता का चिकित्सा मॉडल (जो इसे एक बीमारी मानता है) गलत है। हमें इसके सामाजिक मॉडल पर बात करनी चाहिए, जो समाज को बदलने पर जोर देता है, व्यक्ति को नहीं।

निष्कर्ष :

विकलांगता का प्रबंधन केवल एक व्यक्ति की चुनौती नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जब तक समाज अपने प्रतीकों और साझा अर्थों को नहीं बदलेगा, तब तक विकलांग व्यक्तियों की 'वास्तविक पहचान' को सम्मान नहीं मिल पाएगा। आज के समय में तकनीक और शिक्षा के माध्यम से हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं जहाँ शारीरिक भिन्नता 'कलंक' न बनकर केवल मानवीय विविधता का एक हिस्सा मात्र रह जाए।

लेखिका परिचय :

रोशनी कुमारी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली में समाजशास्त्र (Sociology) की स्नातकोत्तर (M.A.) छात्रा हैं। उनकी शैक्षणिक रुचि मुख्य रूप से सामाजिक स्तरीकरण, हाशिए के समुदायों के अधिकार और प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद (Symbolic Interactionism) के सिद्धांतों पर केंद्रित है।

संदर्भ :

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डिस्क्लेमर (Disclaimer) :

'मीमांसा' वेब पत्रिका के 'विमर्श' स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित यह शोध पत्र "विकलांगता और कलंक का एक प्रतीकात्मक अंतःक्रियावादी विश्लेषण" केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए साझा किया गया है।
लेखक के विचार: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार और विश्लेषण पूर्णतः लेखिका (एम.ए. समाज शास्त्र छात्रा, JNU) के निजी विचार हैं। इनसे 'मीमांसा' पत्रिका के संपादकीय मंडल या संस्था की नीति का सहमत होना अनिवार्य नहीं है।
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संवेदनशीलता: इस लेख का उद्देश्य विकलांगता से जुड़े सामाजिक पहलुओं पर चर्चा करना है। इसका उद्देश्य किसी भी समुदाय, धर्म या समूह की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

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