साहित्य के 'आंचलिक शिल्पी' और आंतरिक शुचिता के साधक: आचार्य शिवपूजन सहाय। पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख

भारतीय वाङ्मय के आकाश में जब हम उन नक्षत्रों को खोजते हैं जिन्होंने अपनी आभा से न केवल साहित्य को आलोकित किया, बल्कि समाज को संस्कारित भी किया, तो आचार्य शिवपूजन सहाय का नाम अग्रिम पंक्ति में उभरता है। वेब पत्रिका 'मीमांसा', जो सदैव साहित्य की शुचिता, समावेशी भाव और हमारे सनातन ऋषियों-मुनियों की प्रज्ञा-मेधा की ध्वजवाहक रही है, आज इस महान विभूति की पुण्यतिथि पर अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

आज का युग बाजारवादी संस्कृति का युग है, जहाँ भोग और विलास की अंधी दौड़ में मानवीय संवेदनाएँ दम तोड़ रही हैं। ऐसे समय में आचार्य शिवपूजन सहाय जैसे 'सरल हृदय' और 'गाॅंधीवादी' रचनाकार का स्मरण करना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का एक संकल्प है।

व्यक्तित्व: सरलता की जीवंत प्रतिमा

आचार्य शिवपूजन सहाय का व्यक्तित्व उस गंगा की तरह था जो शांत, गंभीर और निर्मल होती है। 9 अगस्त 1893 को बिहार के भोजपुर जिले के उनवाँस गाँव में जन्मे 'भोलानाथ' (बचपन का नाम) सचमुच भोलेपन और विद्वत्ता के अद्भुत संगम थे। उनकी जीवन यात्रा बनारस की अदालत में नकलनवीस से शुरू होकर 'पद्म भूषण' और 'डॉक्टर ऑफ लेटर्स' (भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा) तक पहुंची, लेकिन उनके भीतर का वह ग्रामीण सरल हृदय कभी नहीं बदला। प्रारम्भिक शिक्षा आरा (बिहार) में हुई। फिर 1921 से कलकत्ता में पत्रकारिता आरम्भ की। 1924 में लखनऊ में प्रेमचंद के साथ 'माधुरी' का सम्पादन किया। 1926 से 1933 तक काशी में प्रवास और पत्रकारिता तथा लेखन। 1934 से 1939 तक पुस्तक भंडार, लहेरिया सराय में सम्पादन-कार्य किया। 1939 से 1949 तक राजेंद्र कॉलेज, छपरा में हिंदी के प्राध्यापक रहे। राजेंद्र कॉलेज छपरा में 10 सालों तक वह हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष थें इस दौरान उनकी कई रचनाएं प्रकाशित होती रही। छपरा में रहते हुए वे इतने दिनों तक पूरी तन्मयता से अध्यापन कार्यों के साथ-साथ साहित्यिक कर्म में लगे रहें। अतः छपरा की धरती से उन्हें खास लगाव हो गया था।

वे गाॅंधीवादी मूल्यों के सच्चे संवाहक थे। असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी नौकरी का त्याग करना उनके भीतर के प्रखर राष्ट्रवाद का परिचायक था। उन्होंने सदैव साहित्य को साधना माना, व्यवसाय नहीं। उनकी मृदुलता ऐसी थी कि प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और निराला जैसे दिग्गज साहित्यकार उन्हें अपना आत्मीय मानते थे।
इनके लिखे हुए प्रारम्भिक लेख 'लक्ष्मी', 'मनोरंजन' तथा 'पाटलीपुत्र' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। शिवपूजन सहाय ने 1934 ई. में 'लहेरियासराय' (दरभंगा) जाकर मासिक पत्र 'बालक' का सम्पादन किया। स्वतंत्रता के बाद शिवपूजन सहाय बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के संचालक तथा बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से प्रकाशित 'साहित्य' नामक शोध-समीक्षाप्रधान त्रैमासिक पत्र के सम्पादक थे


कृतित्व और रचना शैली: 

आंचलिकता के आदि-पुरोधा जब हम हिंदी उपन्यास विधा साहित्य की बात करते हैं, तो 'देहाती दुनिया' (1926) का नाम लिए बिना चर्चा अधूरी है। आचार्य शिवपूजन सहाय को आंचलिक उपन्यास परंपरा का 'पुरोधा' माना जाता है। फणीश्वरनाथ रेणु से बहुत पहले, शिवपूजन जी ने ग्रामीण जीवन की धड़कनों को जिस जीवंतता के साथ कागज़ पर उतारा, वह विस्मयकारी है।

आचार्य शिवपूजन सहाय की लेखनी का जादू देखना हो, तो 'माता का आँचल' से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। यह कहानी केवल एक बालक की क्रीड़ाओं का वर्णन नहीं है, बल्कि तत्कालीन ग्रामीण समाज, संस्कृति और पिता-पुत्र के संबंधों की एक भावुक यात्रा है।
बचपन की निश्छलता और लोक-जीवन, पिता का सान्निध्य बनाम माता का संरक्षण इसका मुख्य प्लाट है।
इस रचना में लेखक ने 'भोलानाथ' के माध्यम से ग्रामीण बचपन का जो सजीव चित्रण किया है, वह आज के 'डिजिटल बचपन' के दौर में एक सुखद स्वप्न जैसा लगता है। मिट्टी के घरौंदे बनाना, बारात निकालना, खेती-बारी का खेल खेलना ये सब दृश्य पाठक को अपनी जड़ों की ओर खींच ले जाते हैं। इसमें ग्रामीण शब्दावली और मुहावरों का ऐसा सहज प्रयोग है जो आंचलिकता को जीवंत कर देता है।

कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष पिता और पुत्र का गहरा लगाव है। बालक भोलानाथ का अधिकतम समय अपने पिता (बाबूजी) के साथ बीतता है साथ नहाना, पूजा में बैठना और गंगा किनारे मछलियों को खिलाने जाना। लेकिन, रचना का चरम तब आता है जब बालक अचानक डर जाता है। उस समय वह पिता की गोद को छोड़कर 'माता के अंचल' में छिप जाता है।

देहाती दुनिया: यह केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवेश का शब्द-चित्र है। इसमें लोकभाषा, मुहावरे और ग्रामीण जीवन के अंतर्विरोधों को जिस बेबाकी से रखा गया है, वह आज भी लेखकों के लिए मार्गदर्शक है।

कहानी का प्लॉट: उनकी यह कहानी हिंदी साहित्य की कालजयी रचनाओं में गिनी जाती है, जो सामाजिक विसंगतियों पर गहरा प्रहार करती है।

स्मृति और रेखाचित्र: 'वे दिन वे लोग' और 'विभूति' जैसी कृतियों के माध्यम से उन्होंने अपने समय के इतिहास और समाज को सहेजने का महती कार्य किया।

पत्रकारिता और संपादन: हिंदी के अनन्य 'शिव'
शिवपूजन सहाय जी केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक महान संपादक और 'लेखकों के लेखक' थे। उन्होंने 'मतवाला', 'माधुरी', 'जागरण', और 'हिमालय' जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता के स्वर्ण युग का निर्माण किया।

उनकी संपादन कला की विशिष्टता यह थी कि वे दूसरों की पांडुलिपियों को इस तरह संवारते थे जैसे कोई शिल्पी पत्थर को तराशकर प्रतिमा बना देता है। मुंशी प्रेमचंद की 'रंगभूमि' हो या डॉ. राजेंद्र प्रसाद की 'आत्मकथा', सहाय जी के संपादन ने इन्हें भाषाई परिपक्वता प्रदान की। उनकी मृत्यु 21 जनवरी 1963 को पटना में हुई।

कथा एवं उपन्यास

तूती-मैना
देहाती दुनिया - 1926
विभूति - 1935
वे दिन वे लोग - 1965
बिम्ब:प्रतिबिम्ब - 1967
मेरा जीवन - 1985
स्मृतिशेष - 1994
हिन्दी भाषा और साहित्य - 1996 में
ग्राम सुधार - 2007
शिवपूजन सहाय साहित्य समग्र (१० खंड) - 2011
शिवपूजन रचनावली (४ खंड) 1956- 59
कहानी का प्लॉट

सम्पादन कार्य

द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ - 1933
जयन्ती स्मारक ग्रन्थ - 1942
अनुग्रह अभिनन्दन ग्रन्थ - 1946
राजेन्द्र अभिननदन ग्रन्थ - 1950
हिंदी साहित्य और बिहार (खंड १-२, 1960,1963)
अयोध्या प्रसाद खत्री स्मारक ग्रन्थ -1960
बिहार की महिलाएं -1962
आत्मकथा ( ले. डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद) - 1947
रंगभूमि - 1925

संपादित पत्र-पत्रिकाएं

मारवाड़ी सुधार - 1921
मतवाला - 1923
माधुरी - 1924
समन्वय - 1925
मौजी - 1925
गोलमाल - 1925
जागरण - 1932
गंगा - 1931
बालक - 1934
हिमालय - 1946-47
साहित्य - 1950-62

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के सचिव और निदेशक के रूप में उन्होंने 50 से अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन कर हिंदी भाषा की जो सेवा की, वह आने वाली शताब्दियों तक याद रखी जाएगी।

बाजारवादी संस्कृति में साहित्यिक मर्म की सुरक्षा
आज जब साहित्य 'उत्पाद' बनता जा रहा है और लेखक 'ब्रांड' बनने की होड़ में हैं, तब शिवपूजन सहाय का आदर्श हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर करता है। 'मीमांसा' पत्रिका मानती है कि आज के भोग-विलास और प्रदर्शन के दौर में उनके साहित्यिक मर्म को सुरक्षित रखने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं:

शुचिता का संरक्षण: 

साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आत्मा का परिष्कार है। सहाय जी ने सदैव लेखन में मर्यादा और शुचिता को प्रधानता दी।

लोक से जुड़ाव: 

आंचलिकता का अर्थ केवल ग्रामीण परिवेश नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ाव है। हमें वैश्विक होने के साथ-साथ अपनी मिट्टी की गंध को बचाए रखना होगा।
 
ज्ञान परंपरा का सम्मान 

उन्होंने 'हिंदी साहित्य और बिहार' के माध्यम से जिस ज्ञान परंपरा को संकलित किया, वह हमारे ऋषियों की प्रज्ञा मेधा का ही आधुनिक विस्तार है।

उपसंहार: 'मीमांसा' का संकल्प

आचार्य शिवपूजन सहाय का जीवन और साहित्य हमें सिखाता है कि महानता तामझाम में नहीं, बल्कि तपस्या में है। वे हिंदी के ऐसे 'भागीरथ' थे जिन्होंने शब्दों की गंगा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

वेब पत्रिका 'मीमांसा' उनके इस अजेय योगदान को नमन करती है। हमारा यह विशेषांक उस ऋषिकल्य प्रज्ञा को समर्पित है, जिसने हिंदी को 'बिंब-प्रतिबिंब' के माध्यम से समाज का आईना दिखाया। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम यह प्रण लेते हैं कि उनकी भाषाई शुचिता और मानवीय करुणा के संदेश को हम अपनी पीढ़ी तक निरंतर पहुँचाते रहेंगे।

श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ पंक्तियाँ:

"लेखनी जिसकी सादगी का साज थी,
वाणी जिसकी लोक की आवाज़ थी।
संवारा जिसने साहित्य का हर आंगन,
उस शिव के चरणों में, मीमांसा का वंदन।"

पुण्यतिथि विशेषांक/संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
© संपादक, 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

वेब पत्रिका 'मीमांसा' पर प्रकाशित यह विशेष लेख आचार्य शिवपूजन सहाय की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप तैयार किया गया है।

तथ्यात्मक जानकारी: इस आलेख में प्रयुक्त ऐतिहासिक तथ्य और जीवन परिचय सार्वजनिक डोमेन (विकिपीडिया एवं अन्य प्रामाणिक साहित्यिक स्रोतों) से साभार लिए गए हैं।

विचार: लेख में व्यक्त समीक्षात्मक विचार 'मीमांसा' संपादकीय टीम के मौलिक विश्लेषण पर आधारित हैं, जिसका उद्देश्य साहित्य के प्रति जन-जागरूकता फैलाना है।

त्रुटि सुधार: यदि किसी तथ्य या तिथि में कोई अनचाही त्रुटि पाई जाती है, तो उसे मानवीय भूल माना जाए। सुधार हेतु सुझाव सदैव आमंत्रित हैं।

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